<?xml version='1.0' encoding='UTF-8'?><?xml-stylesheet href="http://www.blogger.com/styles/atom.css" type="text/css"?><feed xmlns='http://www.w3.org/2005/Atom' xmlns:openSearch='http://a9.com/-/spec/opensearchrss/1.0/' xmlns:georss='http://www.georss.org/georss' xmlns:gd='http://schemas.google.com/g/2005' xmlns:thr='http://purl.org/syndication/thread/1.0'><id>tag:blogger.com,1999:blog-3558267468781846487</id><updated>2011-07-28T23:52:16.990-07:00</updated><title type='text'>भारत का इतिहास</title><subtitle type='html'>&amp;quot;साउथ एशियन हिस्ट्री&amp;quot; के जालस्थल : http://india_resource.tripod.com/Hindi-Essays.html शिशिर थडानी, संपादक, साउथ एशियन हिस्ट्री, बी ४४, डिफेंस कालोनी, नई दिल्ली ११००२४, ईमेलः kalakriti@mindspring.com से साभार लेकर कृतिदेव_१० ==&amp;gt; यूनिकोड परिवर्तक द्वारा फॉण्ट बदलकर संकलित।</subtitle><link rel='http://schemas.google.com/g/2005#feed' type='application/atom+xml' href='http://itihaasam.blogspot.com/feeds/posts/default'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3558267468781846487/posts/default?max-results=100'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://itihaasam.blogspot.com/'/><link rel='hub' href='http://pubsubhubbub.appspot.com/'/><author><name>अनुनाद सिंह</name><uri>http://www.blogger.com/profile/05634421007709892634</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><generator version='7.00' uri='http://www.blogger.com'>Blogger</generator><openSearch:totalResults>34</openSearch:totalResults><openSearch:startIndex>1</openSearch:startIndex><openSearch:itemsPerPage>100</openSearch:itemsPerPage><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3558267468781846487.post-5150947096149713112</id><published>2009-01-15T19:22:00.000-08:00</published><updated>2010-07-23T06:01:30.645-07:00</updated><title type='text'>अनुक्रमाणिका</title><content type='html'>&lt;ul class="posts"&gt;&lt;li&gt;&lt;a href="http://itihaasam.blogspot.com/2009/01/blog-post.html"&gt;आर्य आक्रमणः सिद्धांत, विपरीत सिद्धांत और ऐतिहासिक...&lt;/a&gt;&lt;/li&gt;&lt;li&gt;&lt;a href="http://itihaasam.blogspot.com/2009/01/blog-post_5323.html"&gt;उपनिषादिक तत्व मीमांसा से वैज्ञानिक यथार्थवादः दार...&lt;/a&gt;&lt;/li&gt;&lt;li&gt;&lt;a href="http://itihaasam.blogspot.com/2009/01/blog-post_4303.html"&gt;भारत में सामाजिक संबंधों का इतिहास&lt;/a&gt;&lt;/li&gt;&lt;li&gt;&lt;a href="http://itihaasam.blogspot.com/2009/01/blog-post_8758.html"&gt;भारत में गणित का इतिहास&lt;/a&gt;&lt;/li&gt;&lt;li&gt;&lt;a href="http://itihaasam.blogspot.com/2009/01/blog-post_7307.html"&gt;भारत में भौतिक विज्ञानों का इतिहास&lt;/a&gt;&lt;/li&gt;&lt;li&gt;&lt;a href="http://itihaasam.blogspot.com/2009/01/blog-post_8118.html"&gt;भारत में तकनीकी खोजें और उनके उपयोग&lt;/a&gt;&lt;/li&gt;&lt;li&gt;&lt;a href="http://itihaasam.blogspot.com/2009/01/blog-post_5302.html"&gt;भारतीय कला और वास्तुशिल्प  में प्रगति&lt;/a&gt;&lt;/li&gt;&lt;li&gt;&lt;a href="http://itihaasam.blogspot.com/2009/01/blog-post_5688.html"&gt;भारत में हस्तकौशल और व्यापार के ऐतिहासिक स्वरूप&lt;/a&gt;&lt;/li&gt;&lt;li&gt;&lt;a href="http://itihaasam.blogspot.com/2009/01/blog-post_1228.html"&gt;भारतीय लोक चित्रकला&lt;/a&gt;&lt;/li&gt;&lt;li&gt;&lt;a href="http://itihaasam.blogspot.com/2009/01/blog-post_4412.html"&gt;बौद्ध नीतिशास्त्र और सामाजिक समीक्षा&lt;/a&gt;&lt;/li&gt;&lt;li&gt;&lt;a href="http://itihaasam.blogspot.com/2009/01/blog-post_2379.html"&gt;हिंदू और जैन परंपराओं के साथ प्रादेशिक सल्तनतों का...&lt;/a&gt;&lt;/li&gt;&lt;li&gt;&lt;a href="http://itihaasam.blogspot.com/2009/01/blog-post_8265.html"&gt;प्राचीन भारत में दार्शनिक विचार और वैज्ञानिक तौर त...&lt;/a&gt;&lt;/li&gt;&lt;li&gt;&lt;a href="http://itihaasam.blogspot.com/2009/01/blog-post_3640.html"&gt;उड़ीसा का इतिहासः एक परिचय&lt;/a&gt;&lt;/li&gt;&lt;li&gt;&lt;a href="http://itihaasam.blogspot.com/2009/01/blog-post_2379.html"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/li&gt;&lt;li&gt;&lt;a href="http://itihaasam.blogspot.com/2009/01/blog-post_6234.html"&gt;सिंध की अरब विजय एवं इस्लामीकरण&lt;/a&gt;&lt;/li&gt;&lt;li&gt;&lt;a href="http://itihaasam.blogspot.com/2009/01/blog-post_1522.html"&gt;पंजाब और गजनी एवं गौर आक्रमण&lt;/a&gt;&lt;/li&gt;&lt;li&gt;&lt;a href="http://itihaasam.blogspot.com/2009/01/blog-post_4165.html"&gt;मुगलों का उत्थान और पतन&lt;/a&gt;&lt;/li&gt;&lt;li&gt;&lt;a href="http://itihaasam.blogspot.com/2009/01/blog-post_15.html"&gt;इस्लाम और उपमहाद्वीपः उसके संघात का मूल्यांकन&lt;/a&gt;&lt;/li&gt;&lt;li&gt;&lt;a href="http://itihaasam.blogspot.com/2009/01/blog-post_463.html"&gt;सूफी धारायें और इस्लामी राजदरबारों में सभ्यता&lt;/a&gt;&lt;/li&gt;&lt;li&gt;&lt;a href="http://itihaasam.blogspot.com/2009/01/16-19.html"&gt;भारतीय चित्रकला ( 16वीं से 19वीं सदी तक )&lt;/a&gt;&lt;/li&gt;&lt;li&gt;&lt;br /&gt;&lt;/li&gt;&lt;li&gt;&lt;a href="http://itihaasam.blogspot.com/2009/01/blog-post_6170.html"&gt;व्यापार से उपनिवेशः ईस्ट इंडिया कंपनियों की ऐतिहास...&lt;/a&gt;&lt;/li&gt;&lt;li&gt;&lt;a href="http://itihaasam.blogspot.com/2009/01/blog-post_1030.html"&gt;भारतीय सामुद्रिक व्यापार पर यूरोपियन प्रभुत्व&lt;/a&gt;&lt;/li&gt;&lt;li&gt;&lt;a href="http://itihaasam.blogspot.com/2009/01/blog-post_4651.html"&gt;ब्रिटिश शासन में राजभक्ति पर दबाव - भाग एक&lt;/a&gt;&lt;/li&gt;&lt;li&gt;&lt;a href="http://itihaasam.blogspot.com/2009/01/blog-post_1418.html"&gt;ब्रिटिश शासन में राजभक्ति पर दबाव - भाग दो&lt;/a&gt;&lt;/li&gt;&lt;li&gt;&lt;a href="http://itihaasam.blogspot.com/2009/01/1857.html"&gt;1857 का क्रांतिकारी उभार&lt;/a&gt;&lt;/li&gt;&lt;li&gt;&lt;a href="http://itihaasam.blogspot.com/2009/01/blog-post_1818.html"&gt;गदर आंदोलन के महत्वपूर्ण दस्तावेज&lt;/a&gt;&lt;/li&gt;&lt;li&gt;&lt;a href="http://itihaasam.blogspot.com/2009/01/blog-post_2938.html"&gt;भारतीय स्वतंत्राता संग्राम में मूल युगांतरकारी घटन...&lt;/a&gt;&lt;/li&gt;&lt;li&gt;&lt;a href="http://itihaasam.blogspot.com/2009/01/blog-post_3753.html"&gt;भारतीय स्वतंत्राता संग्राम के दौरान की क्रान्तिकार...&lt;/a&gt;&lt;/li&gt;&lt;li&gt;&lt;a href="http://itihaasam.blogspot.com/2009/01/blog-post_7910.html"&gt;भारत में ब्रिटिश शिक्षा&lt;/a&gt;&lt;/li&gt;&lt;li&gt;&lt;a href="http://itihaasam.blogspot.com/2009/01/blog-post_8232.html"&gt;ब्रिटिश उपनिवेशिक बपौती : भ्रान्तियां और जनसामान्य ...&lt;/a&gt;&lt;/li&gt;&lt;li&gt;&lt;a href="http://itihaasam.blogspot.com/2009/01/blog-post_6881.html"&gt;भारतीय संस्कृति एवं सभ्यता के लिए आदिवासी योगदान&lt;/a&gt;&lt;/li&gt;&lt;li&gt;&lt;a href="http://itihaasam.blogspot.com/2009/01/blog-post_2396.html"&gt;तिलक के इतिहास का मूल्यांकन&lt;/a&gt;&lt;/li&gt;&lt;li&gt;&lt;a href="http://itihaasam.blogspot.com/2009/01/blog-post_9506.html"&gt;दो राष्ट्र नीति और विभाजन, ऐतिहासिक नजर&lt;/a&gt;&lt;/li&gt;&lt;li&gt;&lt;a href="http://itihaasam.blogspot.com/2009/01/blog-post_9282.html"&gt;जम्मू और कश्मीरः स्व निर्णय, जनमत संग्रह की मांग औ...&lt;/a&gt;&lt;/li&gt;&lt;/ul&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3558267468781846487-5150947096149713112?l=itihaasam.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://itihaasam.blogspot.com/feeds/5150947096149713112/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://itihaasam.blogspot.com/2009/01/blog-post_9889.html#comment-form' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3558267468781846487/posts/default/5150947096149713112'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3558267468781846487/posts/default/5150947096149713112'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://itihaasam.blogspot.com/2009/01/blog-post_9889.html' title='अनुक्रमाणिका'/><author><name>अनुनाद सिंह</name><uri>http://www.blogger.com/profile/05634421007709892634</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3558267468781846487.post-7425766036314669958</id><published>2009-01-15T05:43:00.001-08:00</published><updated>2009-01-15T05:43:53.308-08:00</updated><title type='text'>हिंदू और जैन परंपराओं के साथ प्रादेशिक सल्तनतों का अनुकूलन और समझौता</title><content type='html'>इस्लामी शासकों के भारतीय अनुभव के संबंध में यद्यपि कुछ इतिहासकार सामान्यीकरण का प्रयास करते हैं, परंतुु ऐतिहासिक अभिलेखों को देखने से भारत के इस्लामी दरबारों के रवैयों में काफी भिन्नता प्रगट होती है। दिल्ली में स्थापित  सबसे पहले की सल्तनतें, हिंदू और भारतीय मूल के मुसलमानों के प्रति भेदभावपूर्ण थीं। जबकि भारत में ही पैदा और बढ़े शासकों द्वारा स्थापित कुछ सल्तनतें व्यवहार में ज्यादा उदारवादी थीं और राजपूत तथा हिंदूओं की सहकारिता के ज्यादा इच्छुक थे।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;विदेशी विजेताओं द्वारा स्थापित दिल्ली सल्तनत मध्य एशिया के अप्रवासी एवं तुर्क कुलीनवंशी मुस्लिमों की ओर विशेष झुकाव रखते थे। बाद में, अफगान कुलीन और अबीसिनियन हपसी वंश के दास योद्धा भी उभर कर आये। ईरानी शियाओं ने सुन्नी तुर्को एवं अफगानों के विरूद्ध एक धड़ा संगठित किया और परशियन नमूने को पेश करते हुए शक्ति के लिए स्पद्र्धा भी की। जो भी हो, अल्पसंख्यक और सीमित अधिकार प्राप्त इन सल्तनतों को हिंदू मध्यस्थों और परिवर्तित मुसलमानों पर करों की वसूली तथा कानून व्यवस्था के लिए आश्रित रहना पड़ता था। इस तरह ब्राहमण, कायस्थ, खत्राी और अन्य जातियों से हिंदू और मुसलमान जमीनदार एवं प्रशासक इस्लामी दरबारों के अपरिहार्य औजार बने और कभी कभी वे उंचे पदों पर भी पहुंचे। ये दरबार विदेशी व्यापारियांे, वाणिज्यिकों और सभी जातियों के साहूकारों यथा हिंदू, जैन और परिवर्तित मुसलमानों यथा खोजा, बोहरा, और गुजरात के मैमन पर भी आश्रित हुआ करते थे।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इन सल्तनतों की स्थिरता कमाबेश हिंदू और स्थानीय जन्मे मुसलमानों के मध्यस्थों की मौन सम्मति और राजभक्ति पर टिकी  हुआ करती थी। जब कभी इनको उकसाया जाता ये प्रमुख सल्तनत के खिलाफ सत्ता पलट और राजद्रोह में सहयोगी बनते और भड़क जाते। 14 वीं सदी में दिल्ली सल्तनत प्रादेशिक विद्रोहों के कारण बिखर गयी थी। इस बात की पूरी संभावना थी कि यह सब मुहम्मद इब्न तुगलक, 1325-51, के निरंकुश शासन के भड़काने से हुआ था जिसकी कट्टर और विस्तारवादी नीतियों ने बड़े पैमाने पर बैरभाव और आक्रोश फैलाया था। दिल्ली की सल्तनत के पतन के फलस्वरूप बहुत से प्रादेशिक कुलीनों ने अपनी स्वतंत्राता घोषित की और स्थानीय सल्तनतों की स्थापना कर ली। जौनपुर की शारकी सल्तनत और अहमदाबाद की गुजरात सल्तनत दोनों को भारत में जन्में मुसलमानों ने स्थापित किया था। अहमदनगर और बंगाल अबीसिनियन दास योद्धाओं की पीढ़ियों ने और खानदेश को एक शासक जो अपने को अरब मूल का पीढ़ी का कहता था, ने स्थापित किया था। भारत मूल के मुसलमान शेरशाह सूरी ने गंगा के दुआब में कुछ समय के लिए वैकल्पिक राज्य की स्थापना की चुनौति मुगल साम्राज्य को दी थी।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ये प्रादेशिक सल्तनतें न केवल हिंदू राजनैतिक और सैन्य सहयोगियों पर विश्वास करतीं थीं वरन् वे भारतीय रिवाजों को अपनाने अथवा देशी परंपराओं को छूटें देने में ज्यादा उदारवादी थीं। उदाहरण के लिए, न केवल गुजरात के मुसलमान कुलीन परिवारों ने एवं कुछ अन्य सल्तनतों ने हिंदू कुलीन परिवारों से समानता एवं आदर का व्यवहार किया वरन् मुस्लिम राजकुमारियों का ब्याह हिंदू सहयोगी परिवारों में उसी प्रकार से किया जिस प्रकार से हिंदू राजकुमारियां मुस्लिम राजसी घरानों में आईं थीं। यह मुगलों के रिवाजों के विपरीत था। मुगलों ने हिंदू राजकुमारियां वधु की तरह स्वीकार तो कीं परंतु अपनी राजकुमारियांे की शादी हिंदू परिवारों में नहीं की।  मुगलों ने राजपूत भागीदारी को निम्न स्तरीय ढंग से स्वीकारा था जबकि प्रादेशिक सल्तनतों ने संभवतया, अपने हिंदू सहयोगियों को समान स्तर पर व्यवहार दिया।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हिंदू और मुसलमान कुलीनों के आपसी संबंधों को शादी ब्याह के द्वारा पक्का किया गया। आम जनता के स्तर पर, भक्ति और सूफी रहस्यमय समानतावादी पंथों के द्वारा एक दूसरे के प्रति अभिमुखता पैदा हुई। दोनों ने मिलकर सामाजिक जाति विभाजन और धार्मिक कठोरता के प्रति अवज्ञा पैदा की। सामाजिक शांति और स्थाईत्व को बनाये रखने के लिए प्रादेशिक सल्तनतों ने कुरान की निरंकुशता पर सूफिया लचीलेपन को पालापोसा और दिल्ली के विपरीत, अनेक प्रादेशिक सल्तनतों ने स्थानीय भाषा का समर्थन किया। मातृभाषा के साहित्य को सक्रियता से प्रोत्साहित किया। साथ ही साथ, पारंपरिक कलाओं एवं हस्तकौशल को बढ़ावा दिया। बंगाल, गुजरात और कश्मीर में उर्दू की अपेक्षा मातृभाषा में काव्य और साहित्य की रचना शुरू हुई तथा खानदेश, बुरहानपुर एवं अहमदनगर में संस्कृत एवं मराठी साहित्य को उर्दू साहित्य के साथ अनुग्रह मिला। पारंपरिक पौराणिक विषयों को जौनपुर के लघुचित्रों में जगह मिली और गीत गोविंद के चित्राण तो जौनपुर दरबार में विशेष आकर्षण रखते थे।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;दक्खिन के दरबार विभिन्न भारतीय मूल के मुस्लिमों एवं विदेशी मूल के राजवंशों की आपसी दुश्मनी से विदीर्ण हो गये थे। उन्होंने हिंदुओं से संबंध सुधारने की कोशिश की। नतीजतन, हिंदुओं को इस्लामी शासन में सर्वोच्च पदों पर पहुंचने की अनुमति प्राप्त हुई। खासकर, ये राजदरबार देशज हिंदू कलात्मक प्रभावों के लिए खुल गए थे और सबसे सुंदर लघुचित्रों में विभिन्न भारतीय रागों की व्याख्यायें हुईं। फिर चाहे वे अहमदनगर, औरंगाबाद, बीजापुर या हैदराबाद में क्यों न उत्पन्न हुईं हों। ये लघुचित्रा पूना के मराठा राजदरबारों के और कोल्हापुर और सांवतवाड़ी के लघुचित्रों से बहुत समानतायें रखते हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इस प्रकार से इन राजदरबारों ने एक विशेष भारतीय-मुस्लिम संस्कृति को विकसित किया जिसने उन्हें उत्तर पश्चिम के विदेशी आक्रमणकारियों द्वारा स्थापित संस्कृति से भिन्न पहिचान दी। इन दरबारों ने इस्लाम में परिवर्तित भारतीयांे के समग्र चरित्रा को प्रतिबिंबित किया,उन्होंने अपनी पूर्ववर्ती परंपराओं से अनेक तत्वों को बचा रखा था - सामाजिक रीतिरिवाज, भाषा, साहित्य, संगीत, कला और वास्तुशिल्प से।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इन सल्तनतों में से सबसे समृद्ध गुजरात सल्तनत थी। पहले अहमदाबाद में स्थापित और बाद में चंपानेर में। वहां पहले से ही औद्योगीकरण पूर्व के उन्नत उत्पादों का आधार था और 13 वीं शताब्दी तक, विस्तार में फैले हुए बंदरगाहों एवं वाणिज्यक शहरों का जाल था। अहमदशाह 1, 1410-42 के शासनकाल में और बहादुरशाह, 1526-37 तक के अन्य सुलतानों के शासनकाल में ये उन्नत और विकसित होते रहे थे। 18 वीं सदी के ’’मिराते ए अहमदी’’ ने देखा कि ’’तजकिरात उल मुल्क’’ का लेखक बतलाता है कि ’’अहमदाबाद के उपनगर उस्मानपुर में लगभग 1000 दुकानें हैं और सभी में हिंदू और मुस्लिम  व्यापारी, दस्तकार, कलाकार, सरकारी मुलाजिम और सैनिक लोग थे।’’ अन्य यात्रियों ने भी अहमदाबाद के शहर के खुशनुमा विवरण छोड़े हैं कि किस प्रकार से बगीचों और कृत्रिम तालाबों के बीच अनेक महल और रिहायसी प्रतिवास चैड़ी सड़कों एवं बाजारों से युक्त हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;गुजरात के शहर वस्त्रा उद्योग और अन्य वस्तुओं के निर्माण के न केवल महत्वपूर्ण केंद्र थे वरन् गुजरात के बंदरगाह अन्य वस्तुओं के साथ मसालों एवं इमारती लकड़ी के व्यापार में उन्नत थे जिन्हें आगे दक्षिण पूर्व एशिया एवं मलाबार तट के बंदरगाहों को और पूर्वी अफ्रीका, मध्य पूर्व तथा यूरोप को भेजा जाता था। देश के भीतरी भागों के उत्पाद भी गुजरात के बंदरगाहों से बाहर भेजे जाते थे। 15 वीं और 16 वीं सदी में दुनियां के सबसे उन्नत शहरों में गुजरात के शहरों की गणना होने लगी और सल्तनत के शासकों ने अपनी राजधानियों को सर्वोत्कृष्ट भारतीय वास्तुशिल्पों से सजाया था।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पहले की दोनों राजधानियां अहमदाबाद और चंपानेर आकर्षक स्मारक समूहों के लिए प्रसिद्ध थे। कुछ मायने में ये स्मारक मुगलों से भी आगे थे। हिंदू और जैन स्थापत्यशिल्प से लिए त्रियामी अलंकृत और विस्मयकारी स्मारक अपने में परंपरागत शुभ संकेतों को संजोये हैं। जैन चिन्हों में ’’ज्ञान द्वीप’’, ’’कल्पलता’’ और ’’कल्पवृक्ष’’ क्रमशः इच्छापूर्ति, प्रगति एवं समृद्धि के सूचक हैं। अहमदाबाद की सबसे कलात्मक मस्जिदें वे हैं जिन्हें अहमदाबाद के मुस्लिम शासकों की हिंदू रानियों ने बनवाया था। रानी सिप्री और रानी रूपमति को इसका श्रेय प्राप्त है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बंगाल दूसरा राज्य था जहां सल्तनतों के स्मारकों ने देशज रीतिरिवाजों से प्रचुर मात्रा में उधार लिया था। खासकर यह उधार हिंदू और बौद्ध से है। 14 वीं सदी में पंडुआ की राजधानी में एवं वारंगल की राजधानी काकतिया में क्रियाशील रहे कलाकारों को नौकरियां मिलीं और साथ में पाल और सेना शासकों की सेवा में रहे बुर्जुग कलाकारों की नई पीढ़ियों को भी काम मिला। इस प्रकार से गुजरात के समान, बंगाल के हिंदू और बौद्ध रीतिरिवाजों के अनेक चिन्हों को पंडुआ और गौर राजदरबारों के महलों इत्यादि और धार्मिक स्थापत्यशिल्प में समाहित किया गया। ऐसा कुछ हद तक बिना किसी पूर्व निर्णय के भी होता रहा है क्योंकि अनेक मस्जिदें पहले से बने मठों अथवा मंदिर परिसरों के उपर बनाईं गई थीं। तब भी, बंगाल की सल्तनत ने मध्य एशिया या परशियन धाराओं से बिना प्रभावित हुए अपने वास्तु सिद्धांतों को बंगाल के रीतिरिवाजों में से अनेक बातों को स्वीकारते और उनका नवीनीकरण करते हुए, गढ़ा था। बंगाल के मुस्लिम रहस्यवादी कवि और गीतकारों ने भी भक्तिधारा के सहपक्षी के सदृश्य ही लोक परंपराओं में से बहुत कुछ अपने में आत्मसात् किया।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उत्तरी दक्खिन में मुस्लिम किसानों ने कन्नड़ बोलना जारी रखा और ईद और दूसरे मुस्लिम त्यौहार सूफीयों द्वारा मान्य पारंपरिक गानों एवं उच्चकोटि के लोकनृत्यों के साथ अवसर के अनुसार मनाते रहेे। अनेक मौकों पर हिंदू और मुसलमानों के  त्यौहार दोनों समुदाय मिलजुलकर मनाते थे।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इस प्रकार से मुगलों के हाथों पराजित होने के पहले प्रादेशिक सल्तनतें आम तौर पर दिल्ली सल्तनत के आधीन अनुभूत विनाशकारी अतिक्रमण और अभिघात से बचने की कोशिश करतीं थीं और भारतीय राज्यों के भौतिक और सांस्कृतिक जीवन में ज्यादा उपयोगी योगदान देतीं थीं। व्यापार एवं वाणिज्य शहरों और बंदरगाहों में उन्नत हुआ था। अस्तु इन सल्तनतों द्वारा ललित कलाओं और वास्तुशिल्प के निर्माण को भारतीय सांस्कृतिक धरोहरों के महत्वपूर्ण अंग की तरह से देखा जाना चाहिए और उन्हें भारत की कलात्मक उत्पाद का सर्वोत्तम दर्जा देना चाहिए।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3558267468781846487-7425766036314669958?l=itihaasam.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://itihaasam.blogspot.com/feeds/7425766036314669958/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://itihaasam.blogspot.com/2009/01/blog-post_2379.html#comment-form' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3558267468781846487/posts/default/7425766036314669958'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3558267468781846487/posts/default/7425766036314669958'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://itihaasam.blogspot.com/2009/01/blog-post_2379.html' title='हिंदू और जैन परंपराओं के साथ प्रादेशिक सल्तनतों का अनुकूलन और समझौता'/><author><name>अनुनाद सिंह</name><uri>http://www.blogger.com/profile/05634421007709892634</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3558267468781846487.post-9018710204930637923</id><published>2009-01-15T05:41:00.000-08:00</published><updated>2009-01-15T05:43:05.774-08:00</updated><title type='text'>सूफी धारायें और इस्लामी राजदरबारों में सभ्यता</title><content type='html'>इस्लामी दरबारों में समृद्ध होती सभ्यताओं का सही आंकलन सूफी धाराओं को समझे बिना संभव नहीं। सूफी धाराओं ने महान् इस्लामी साम्राज्यों की सांस्कृतिक धरोहरों के निर्धारण में मौलिक और निर्णयकारी भूमिका अदा की थी। विश्व इतिहास का कोई भी विद्यार्थी जानता है कि जब भी धार्मिक सर्वोच्चता का बोलबाला चलता है सभ्यता बुरी तरह से रुक जाती है। किसी भी सभ्यता के विकास के लिए दकियानूसी परंपराओं एवं मतांधताओं से मुक्त बौद्धिक एवं सांस्कृतिक विस्तार की  आवश्यकता होती है। पूर्ववर्ती इस्लामी राजदरबार के उदाहरणों में खासकर बगदाद के अब्बाशिद के शासनकाल में चर्च और राज्य में अनौपचारिक विभाजन था। अरब सभ्यतायें, भारतीय और मेडीटरेरियन सभ्यताओं की तरह से विभिन्नदर्शनग्राही स्त्रोतों से आवक पाकर महत्वपूर्ण उपलब्धियां प्राप्त कर सकीं, फिर चाहे वे आवक देशज हों या विदेशी।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;परंतु एकबार कुरान और शरीयत नियमों को कठोरता से लागू करना शुरू हुआ तो नये इस्लामी समाजों को, जैसा कि मध्यकालीन यूरोप में ईसाई राज्यों में भी हुआ था, अंधेरे युगों में गिरने से बचाने के लिए इस्लामी दरबारों को वैकल्पिक धाराओं की आवश्यकता हुई। प्रोटेस्टेंटों के सदृश्य सूफीवाद और कई उदारवादी मत उत्पन्न हुए और इस्लामी राजाओं द्वारा शासित समाजों में बौद्धिक उन्नति और सांस्कृतिक प्रसार के वे आधारभूत वाहक बने।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इस्लाम की विजयों के पहले से ही विद्यमान हिंदू, बौद्ध, जूडिक, मैनीचियन और जोरोस्ट्र्नियन समाज के संक्रमण को सरल करने के लिए सूफी धारायें आवश्यक थीं। इन सांस्कृतिक और धार्मिक पद्धतियों के बीच सामंजस्य के लिए सूफीवाद ने रास्ता तैयार किया। सूफी विद्वानों ने जूडिक, ईसाई एवं इस्लाम के बीच विकास एवं निरंतरता को बनाये रखने के लिए बहुत काम किया। सूफीवाद ने एक ओर, ईसाई, मैनीचियन्स, यहूदी एवं मुस्लिमों के विरोधी विश्वासों के बीच सामंजस्य में मदद की और दूसरी ओर, राजनैतिक तनाव कम करने तथा सामाजिक शांति व स्थाईत्व के लिए सहुलियतें पैदा कीं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इस प्रकार के कार्य इस्लामी विजेताओं के हितों के प्रतिकूल नहीं थे और प्रायः बर्दास्त कर लिए जाते थे। यद्यपि सूफी विद्वान  रूढ़िवादी उलेमाओं को यह विश्वास दिलाने में भारी कष्ट उठाते थे कि उनके बौद्धिक नियम इस्लाम के दुनियावी नजरिये के खिलाफ नहीं पड़ते। 10 वीं सदी में, कलवादी, बुखारा ’’तारूफ’’ के लेखक और 11 वीं शताब्दी के परशियन विद्वान, हजबुरी ’’काशिफ’’ के रचनाकार ने अपने कार्य को इस्लामी परंपराओं के बड़े दायरे के भीतर रखने की कोशिश की थी। हजबुरी का कहना था कि धार्मिक कानूनों के मानने के अलावा उच्च सांस्कृतिक एवं आध्यात्मिक उन्नति के लिए इस्लाम में स्थान था। उसने इस बात पर जोर दिया कि कुरान में जो कुछ था उसे वह चुनौति नहीं दे रहा था या उसके खिलाफ नहीं था।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अनेक सूफी विद्वानों ने कुरान एवं शरीयत की अपनी ईमानदार प्रतिबद्धता की पुष्टि के लिए और कुछ दूसरों ने सूफीवाद को इस्लाम के पैतृक वजन और अधिकार से बच निकलने के साधन की तरह से उपयोग किया। शुरूआती सूफी विद्वानों में कुछ महिलायें जैसे रबिया 9 वीं सदी और नूरी 10 वीं सदी में हुईं थीं।  उन दोनों ने दुनियावी त्याग पर जोर दिया और बतलाया कि&lt;br /&gt;आध्यात्मिक उपलब्धि ’’ईश्वर’’ को अपने भीतर ही खोज लेने में है। पुराणपंथी महात्माओं के प्रभुत्व और रुढ़िगत रीतिरिवाजों के नकारने में पूर्ववर्ती हिंदुओं और बौद्धों दोनों की कुछ समानताओं को अंगीकार किया था।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जैसा कि सूफी साहित्य और व्यवहार में सन्नहित है कि भारतवासियों पर न केवल उपनिषदों के कुछ रचियताओं या बौद्ध अनुयायियों का प्रभाव है वरन् भारतीय लोक और भक्तिमय साधुओं का भी है। मुगल शाहजादे दाराशिकोह ने अपने ’’दो सागरों का संगम’’ में ऐसी ही विशेष टिप्पणी की थी।&lt;br /&gt;वास्तव में, सूफी मत और व्यवहार के समानतर पक्ष भारतीय दर्शन साहित्य में उपलब्ध थे परंतु प्रायः सूफी विचार की अधिक समानांतरकारी धाराओं के मध्य उन पक्षों को इस्लामी राजनैतिक सहनशीलता के बीच ही परखा देखा जा सकता था। यहां तक कि अधिकांश सूफी वेदांतियों के समान ही तात्विक धर्म को एक खोल की तरह मानते थे। वे इस बात का खंडन नहीं करते कि एक औसत अनुयायी के लिए प्रतिदिन की क्रियायें और पारंपरिक धार्मिक रिवाज महत्वपूर्ण भूमिका अदा कर सकते थे। अधिकांश एकदम विद्रोही नहीं थे वरन् धर्म की मुख्य धारा के प्रभाव को स्वीकार करते थे। परंतु कुरान की शाब्दिक व्याख्या और जड़ता को वे कम स्वीकार करते प्रतीत होते हैं। ’’शब्दों का उपयोग धार्मिक सत्य के लिए नहीं किया जा सकता, सिवाय समतुल्यता के।’’ हकीम सनाई का यह भाव उनकी ’’दी वाॅल्ड गार्डन आॅफ ट्र्ूथ’’ में व्यक्त किया गया है जो लगभग केना और चंदोग्य उपनिषदों में प्रगट है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;समय बीतते बीतते विभिन्न सूफी धारायें विकसित हुईं। ज्यादा अग्रगामी सूफी विद्वान कुरान की संगतता पर कम और एक ऐसे आध्यात्मिक सत्य पर ज्यादा जोर देते थे जो धर्मशास्त्रों से इक्ट्ठा किए जाने वाले से श्रेष्ठ था। व्यवहारिक अनुभव, सहजज्ञान के उन्नत और दुनिया के सापेक्ष महत्व के द्वारा सांस्कृतिक उत्थान और आध्यात्मिक अन्वेषण पर ज्यादा बल दिया जाता था बजाय धर्म सिद्धांतो को दुहराते रहने के। सूफियों ने आकर्षित करने वाले पुराने मतों और दार्शनिक रिवाजों का समावेशन किया। उन्होंने अपनी अतुल एवं कुशाग्र बुद्धि की अंतरदृष्टि से आगे बढ़कर ये समावेशन किए थे।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इनमें से ’’इल्युमिनिस्ट’’ धारा के स्पेनिश सूफी सर्वाधिक रुचिकर रहे और उनमें से अनेक भारतीय सभ्यता के प्रशंसक थे। उनके पास भारत के दार्शनिक और वैज्ञानिक शास्त्रों के अनुवाद की सुविधायें थीं। स्पेनिश सूफी दार्शनिक और वैज्ञानिक ज्ञान को आगे बढ़ाने तथा उसके संरक्षण करने में भी रुचि रखते थे। वे फ्राॅसिस्कान धर्मगुरूओं जैसे रोगर बेकाॅन 1268 सदी, पर बहुत प्रभाव रखते थे। फ्राॅसिस्कान धर्मगुरूओं ने दुनियां के दृष्टिकोण को इस तरह बतायाः ’’ज्ञान के दो स्वरूप हैं तर्क और अनुभव। तर्क निष्कर्ष लाता है और उसे स्वीकार करने के लिए हमें मजबूर करता है परंतु वह निश्चितता पैदा नहीं करता और न ही शंकाओं का निवारण कि मन सत्य में रम सके, जब तक कि वह अनुभव द्वारा प्राप्त न किया गया हो।’’&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बीरबल की तरह मुल्ला नसिरुद्दीन मजाकिया नीतिकथाओं के द्वारा ’’दी सटलीज् आॅफ दी इंकम्पैरेबल नसिरुद्दीन’’ अमर हो गए और सूफी व्यंग के जाने माने उदाहरण सामने आये। भारत में सूफी कवि कबीर कटु हास्य और लोक ज्ञान को अपने दोहों में लाये। भारतीय भक्ति साधुओं या बर्मी या जापानी बौद्ध भिक्षुओं की नीति और काल्पनिक कथायें मानवीय परिस्थितियों एवं जीवन की विषमताओं पर प्रहार करने में समर्थ थीं। ये कथायें चारित्रिक एवं नैतिक संकटों पर प्रकाश डालतीं और साथ ही अपने ज्ञान को बताने की महत्वपूर्ण भूमिका अदा करतीं। यद्यपि ज्यादा जोर तो आध्यात्मिक ’’सत्य’’ की खोज पर होता था परंतु उनकी रचनाओं में व्यापकरूप से असरकारक पक्ष धर्मनिरपेक्षता का ही हुआ करता था। इस मायने में ऐसी सूफी कथाओं में ठीक पंचतंत्रा या एसपस फेबलस् की तरह दुनियां की सभ्यताओं के लोक साहित्य का बंधुत्व मिलता था।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सूफी साहित्य और काव्य का कुछ भाग रोमानी प्रेम के मनोविज्ञान से संबंधित रहा। संभवतया एक संयोग की तरह से कि कैसे  रूढ़िगत एवं परिशुद्धवादी समाज में प्रेम और काम भावनाओं को एक दूसरे से मिलाया जा सके। प्रायः भावनात्मक उद्गारों को अनैतिक या गैरकानूनी माना जाता था, जैसा कि समलैंगिक प्यार में। उसे दैनिक एवं रहस्यमय आध्यात्मिक आवरण में संजोकर और राजनैतिक एवं सामाजिक प्रतिबंधों की पकड़ से बचाकर प्रस्तुत किया जाता था। फरिउद्दीन अतर 13 वीं सदी, निशापुर, ईरान और जलालुद्दीन रूमी ब्लक्ख, अफगानिस्तान 13 वीं सदी की रचनाओं में प्रेम कथाओं का संदेश होता था।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;दोनों मानव विकास के विभिन्न स्तरों के बारे में कहते थे। आध्यात्मिक उन्नति के इन शब्दों में अतर ने ध्यान दिया थाः ’’क्योंकि किसी ने कुछ का दुरोपयोग किया इसलिए उसे छोड़ देना मूर्खतापूर्ण होगा, सूफी सत्य को कानूनों और कायदों में नहीं बांधा जा सकता, सूत्रों और रीतिरिवाजों में भी नहीं क्योंकि वह तब भी आंशिक रूप से इन सभी चीजों में उपस्थित रहता था।’’&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;रूमी ने सामाजिक विकास के सिद्धांत का अनुमोदन किया प्रतीत होता है। वह भारत के पूर्ववर्ती आध्यात्मिक सिद्धांतों से मेल खाता भी प्रतीत होता हैः ’’मैं एक जड़वत् तत्व की तरह मरा और एक पौधा बना; और, एक पौधे की तरह मरा और एक पशु की तरह बना; और, एक पशु की तरह मरा और एक आदमी बना - इसलिए मुझे मनुष्य रूप छोड़ने में क्यों डरना चाहिए ? मैं आदमी की तरह मरूंगा, एक दैविक रूप में पैदा होने के लिए।’’ मथनवी कहानी में - 17।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अनेक दूसरे सूफियों की तरह जो धार्मिक और दार्शनिक कूटचिक्तिसकों जैसे संशयवादी थे, जैसा कि बाद के कबीर भी थे, रूमी ने लिखाः ’’वह जो भाग्यवश प्रबुद्ध है जानता है कि कुतर्क शैतान और प्रेम आदिम से मिलता है’’ - मथनवी में। यही बातें नूरूद्दीन जामी, खुरासान 15 वीं शताब्दी, ने प्रगट कीं थीं ’’सूखा बादल, पानी रहित में वर्षा देने की शक्ति नहीं होती’’ पुराने धार्मिक रीतिरिवाजों और पर्वों को आदतन या बिना सोच विचार के मनाते रहने के संदर्भ में।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;रूमी सारगर्भित कहावतों के लिए प्रसिद्ध हुआः ’’एक आदमी जिसने कभी पानी न जाना हो को आंखों पर पट्टी बांधकर पानी में फेंक दिया जाये, वह उसे अनुभव करता है। जब पट्टी हटा दी जाती है वह जान जाता है कि वह क्या है। तब तक वह उसे उसके प्रभाव से ही जानता है।’’- फीही मा फीही में। नकल के लिए बोलते हुए वह कहता हैः ’’नहर खुद नहीं पीती, परंतु वह प्यासे तक पानी पहुंचाने का काम करती है।’’ सत्य को एक की अपेक्षा अनेक तरीकोें से बताया जा सकता है। इस बात को रेखांकित करते हुए उसने लिखाः ’’एक मिथ्या या विपरीत कथा, सत्य को उजागर करती है।’’&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;रूमी के अवलोकनों में सबसे खास बात एक ऐसे नियम के होने की थी जिसकी यूरोपियन लोग संभवतया हीगेल से तुलना करेंः ’’विपरीत चीजें एक साथ काम करतीं हैं, यहां तक कि सामान्यतः विरोधी भी।’’ - फीही मा फीही में।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;शेख सादी सिराज, 13 वीं सदी, और रूमी का समकालीन ’’गुलिस्तान’’ गुलाब का बगीचा और ’’बुशतान’’ फलोद्यान और  मानवीय विचारों की अंतरदृष्टि के लिए प्रसिद्ध हुआ। वह बगदाद में शिक्षित, अनेक स्थानों पर घूमा और भारत भ्रमण भी किया हुआ था। रूमी के समान ही सादी ने भारत की सूफी सूक्तियों पर और डिमास्कस से काबुल तथा मध्य पूर्व तक प्रभाव डाला था। वह सत्तावादी और अन्यायी राजा और कंजूस धनाढ्यों की कटुउक्तियों के लिए प्रसिद्ध हुआ था। इस विधा को कबीर ने आगे बढ़ाया था।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यद्यपि भारत एवं मध्य पूर्व में अधिकांश सूफी संघ मूलरूप से ’’आत्मिक’’ उन्नति से संबंधित थे और वे मुख्यतया दुनियावी जीवन की ओर संशयवाद या उसे त्याग देने के बारे में ज्यादा झुकाव रखते थे। सूफियों के प्रशंसक, 20 वीं सदी के भारतीय टिप्पणीकार शेख इदरीस जैसे आदर्श सूफियों ने परित्याग को जीवन की पहिचान से बदला और जोर दियाः ’’वैदांति और बौद्ध मतों के द्वारा प्रतिपादित वास्तविक दुनियां के पूर्ण त्याग के विपरीत, सूफी दुनियां से पूर्ण विमुखता को नहीं स्वीकारते। वे उसमें भागीदारिता को बढ़ावा देने की वकालत करते थे, यद्यपि वे दुनियां से विमुख होने की पूरी क्षमता रखते थे। आदर्श सूफी से त्याग और भागीदारिता के बीच संतुलन कायम करने की अपेक्षा होती है - तर्क और रहस्यवादिता के बीच संतुलन’’ ’’दी सूफीज् डबल प्ले’’ में।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इदरीज शाह भी कहते हैं कि सूफी नजरिये से मनुष्य असीम तौर से पूर्णता योग्य है, कि पूर्णता दुनियां के साथ समन्वय से प्राप्त होती है और उसके लिए भौतिक और आध्यात्मिक संतुलन की आवश्यकता होती है। वह सूफियों में सामन्जस्यता के लिए विश्वव्यापकताएं पाने और जो आदर्श धर्म का पालन करते हैं उनमें उंची चेतना की जागृति के लिए सूफियों की भूमिका के तौर पर संदर्भित करता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;17 वीं सदी में, सिराजुद्दीन अब्बासी जन्म 1649 कश्मीर, सूफियों के बारे में लिखता हैः ’’यदि तुम उनका संतो के समान आदर करो, तुम उनके साधुत्व से लाभांवित होओगे, परंतु यदि तुम उनके साथ सहयोगी की तरह काम करोगे तो उनके संसर्ग से लाभ प्राप्त करोगे।’’ सूफी सिद्धांतों के प्रचार कार्य के अपने अनुयायियों से संलग्न होते हुए अब्बासी ने अपने ’’सफरनामा’’ में लिखा थाः ’’फूलों में फूल बनो, कांटों में कांटा।’’&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अब्बासी सूफियों के प्रशंसकों में अकेला नहीं था। भारत में, कमोबेश, सूफियों के प्रालेख को बड़े आदर के साथ देखा और आंका जाता रहा, खासकर इस्लामी सभ्यता के प्रशंसक विद्वानों द्वारा। भारत की समन्वयात्मक संस्कृति के विकास में सूफियों की अहम भूमिका को चिह्नित किया गया। सूफियों को उनके सार्थक काव्य एवं साहित्य के लिए विशेषतया जाना जाता है; साथ ही, ललित कलाओं में उनके योगदान के लिए भी। कुछ विद्वानों ने तो सूफियों में समन्वय की पुनस्र्थापना के प्रयास को भी देखा जिसे एक समय, उत्तरवर्ती बौद्धों ने त्याग दिया था, जो ज्ञान और गुणगान के कारण पुराना पड़ चुका था और यहां तक कि परजीवी और जनसामान्य द्वारा परित्यक्त हो चुका था। कुछ अन्य इस बात को कुछ कुछ आधुनिक स्पर्श के साथ और सुख भोगी प्रवृतियों पर बंदिशों के साथ पुनस्र्थापना मानते हैं क्योंकि वे प्रवृतियां भारत में इस्लामी शासन आने के पहले से ही प्रबल हो गईं थीं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जो भी हो, इस प्रकार के मूल्यांकनों का सावधानीपूर्वक परीक्षण किया जाना चाहिए। एक बार इस्लामी विजयों ने हिंदू और जैन संस्कृतियों को पराजित और क्षीण किया, सूफी इस्लाम, आसानी और तुलनात्मक रूप से ज्यादा गंभीर और उर्वरक दिखलाई दिया। ज्यादा कल्पनाशीलता मेें हमेशा खतरा बना रहता है। उदाहरण के लिए कुछ सूफी मतों में, सूफियों को जीवन के सभी सांस्कृतिक पक्षों में योगदान करने के लिए प्रोत्साहित किया जाता था यथा चित्राकारिता, स्थापत्यशिल्प और अलंकरण के साथ व्यवसायिक कला, नृत्य और संगीत तथा ज्योतिष एवं गणितशास्त्रा में भी। परंतु इस बात को सभी सूफियों ने मन से स्वीकार नहीं किया और अधिकांश सूफी भक्तिवादी प्रतिपक्षियों के समान ही, दानशीलता और आध्यात्मिक व्याख्यान देने में लगे रहते थे। भारत में सूफी प्रार्थनागृह लोकप्रिय हुए समानपक्षी मुस्लमानों की तरह से इच्छापूर्ति के मंदिर जहां भक्तगण साधुओं से आर्शीर्वाद पाने की आशा से आते थे कि उन्हें अच्छा भाग्य या पुण्य मिलेगा या संभवतया उनकी कष्टदायी परिस्थितियों का निवारण हो जायेगा।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इस्लामी आक्रमणों के विरोधी बतलाते हैं कि सूफी विद्वानों ने जासूसी के कार्य किये थे और उन्होंने हिंदू विरोधी तीखे तथा भ्रामक लेख भी लिखे थे और आक्रमणकारियों एवं विजयेताओं की प्रशंसायुक्त प्रशस्ति अपने लेखों में देते थे। इस आलोचना में कुछ सत्यता है क्योंकि सूफी द्वारा ’’मूर्ति’’ विनाश का प्रतिरोध नहीं किया गया; खासकर उन सूफियों द्वारा जो आक्रमणकारियों के साथ आये थे। अलगजली मसहद, ईरान जैसों ने अपने काम के सार को इस्लाम का बुद्धिवाद के साथ समन्वय करने में समझा और अन्य सूफियों को इसका समर्थन करते भी देखा गया। यहां तक कि इस्लाम की रूढ़िवादिता को मजबूत करते हुए अधिकांश सूफियों ने इस्लाम को मानवीय चेहरा प्रदान करने की कोशिश की परंतु उसके विरुद्ध न बोलते हुए अथवा विजयेताओं के अमानवीय सैन्य कृत्यों और इस्लाम के नाम पर खूनी अभियानों को रोकने का प्रयास नहीं करते हुए। तब भी सूफी संघों ने इस्लाम के प्रति भक्ति रखते हुए प्रेम और भाईचारे को बढ़ावा दिया। इस प्रकार के आदर्शवादी सिद्धांत बढ़कर हमेशा ’’मूर्ति पूजकों’’ को समाहित नहीं करते थे। और, कुछ सूफियों में, दुनियावी नजरिये के लिए खासकर कुलीन वर्ग होता था। नारी की आश्रित स्थिति को कम ही चुनौति दी जाती यद्यपि कुछ सूफी समुदाय जैसे कि इल्युमिनिस्ट में महिलायें शिक्षिका या विदुषी भी हुआ करतीं थीं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;परंतु इन परिसीमाओं के बाबजूद, एक बार इस्लाम की स्थापना हुई और वह स्थाई हुआ, कि उन भूभागों में सूफी बिना नागा रंगीनता और सौंदर्य का स्पर्श देते जिसके बिना वह भूभाग निस्तेज और सौंदर्यविहीन था। अफगानिस्तान में सूफियों ने महत्वपूर्ण भूमिका अदा की। खासकर हेरात में, जो लघुचित्रों के लिए प्रसिद्ध बनकर उभरा था। पश्चिमी पंजाब में, मध्यकालीन पंजाबी वास्तुशिल्प के सूफी प्रार्थनागृह होते थे जैसे कि मुलतान, उच्छ, डेरागजनी खान, डेराआडिल, डेरादीन पनाह, डेरा इस्माइल खान में। इन स्मारकों में, ऐसा लगता है मानों तक्षशिला की आत्मा पुनः जीवित हो गई हो। सूफियों ने प्रादेशिक सल्तनतों में जैसे जौनपुर, सिंध, गुजरात, बंगाल, और दक्खिन में पुराने भारतीय रीतिरिवाजों को नये वास्तुशिल्प में  प्रभावशाली ढंग से समायोजित करने के लिए एक अहम भूमिका अदा की थी।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सूफी धारायें जो राजनैतिक तौर पर रूढ़िगतता के साथ थीं के विपरीत, सूफी रहस्यमयवादी पंथ ने ज्यादा ही अस्पष्ट स्थिति को अपनाया था, गुप्त सूत्रों और रहस्यवाद को असहमति के माध्यम की तरह से उपयोग करते हुए। रूढ़िवादियों की धार्मिक पुलिस से रहस्यवाद कुछ सुरक्षा प्रदान करता था - क्योंकि प्रायः रहस्यवादी पागल होने का या जब उन पर विधर्मियों का समर्थन करने का दोषारोपण किया जाता था वे रहस्यवादी अर्धचेनावस्था में होने का बहाना बना लेते थे। सूफी इस बात का दावा कर सकते थे कि उनके असंगत कथन पूरे होशोहवास या चेतनावस्था के नहीं थे या कि उन्होंने स्वेच्छिकता से ईश निंदा नहीं की।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इस ढंग से सूफी धारायें निश्चितरूप से आधीनस्थ चरित्रा की होतीं थीं और जीवित रह पा सकीं। वे सामाजिक आलोचना की अभिव्यक्ति का माध्यम बनीं। टर्की और परशिया में इन आधीनस्थ धाराओं ने खासकर ललित कलाओं और हस्तकौशल के संघों में बहुत से समर्थकों को आकर्षित किया। इसने एक दूरी तक कारीगरों के लिए राजनैतिक संरक्षण दिया और राजशाही द्वारा उनके शोषण पर सीमा लगाने में कदम उठाया।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;परंतु मौलिक सूफियों के बढ़ते प्रभाव ने पुराणपंथी प्रतिक्षेप को उकसा दिया और ईरान में सबसे मौलिक संघों जैसे निम्मुत्तुल्ला को वहां से भागने के लिए मजबूर होना पड़ा और भारत में शरण लेना पड़ी। तब भी, ज्यादा आज्ञाकारी संघों को रहने दिया गया और वे शकाविद ईरान पर महत्वपूर्ण सांस्कृतिक प्र्रभाव डाल सके, खासकर कला और स्थापत्यशिल्प के क्षेत्रा में। सूफी संुदर आकृतियांे और महान प्रभावशाली स्मारकों के निर्माण में कारक बने जिन्होंने इस्कान और तबरेज जैसे शहरों को सज्जित किया और शिराज की कला में योगदान दिया।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;भारत के कारीगरों के समुदायों में से बहुतों को सूफी पंथ ने आकर्षित किया, विशेषतया बुनकरों को परंतु क्योंकि भारत में इस्लाम परिवर्तन आंशिक था, सूफीवाद के अनेक विकल्प भक्ति और तांत्रिक पंथों में उपलब्ध हो गये थे और समानरूप से निकास का काम किया। आधीनस्थ आंदोलनों में से सबसे शक्तिशाली सिखवाद उभरकर निकला जो एक हिस्से के लिए सूफीवादी रहस्यवाद की मौलिक प्रेरणा का ऋणी रहा और सूफी विचार का प्रभाव सिख गुरूओं पर जारी रहा था। इसको आदर और गर्व से स्वीकारा जाना चाहिए। जो भी हो, जैसे ही एक सिख राज्य का एक हिस्सा शासक वर्ग में उपर उठा, सिखों का मौलिक चरित्रा शनैः शनैः क्षीण हो गया और ऐसा ही अन्य सूफियों के साथ भी ऐसा ही हुआ जब वे शासक साम्राज्यशाहियों के करीब हुए, तब।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अपने सर्वोत्तम में, सूफी धारायंे ढोंगी और दमनकारी धार्मिक हठधर्मिताओं के लिए कटु आलोचक बनीं थीं। उन धाराओं ने बौद्धिक उन्नति और सांस्कृतिक क्षेत्रा में सृजनात्मकता को आगे बढ़ाया। भारत में सूफियों ने देश के रीतिरिवाजों और इस्लाम के बीच की दूरी को कम करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने का विशेष काम किया। और संभवतया, यह भी कहा जा सकता है कि उनके प्रभाव ही भारत में हिंदू और इस्लामी राजदरबारों के लिए सजावटी कला और औद्योगिक पूर्व के उत्पादों के कारक बने थे।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यद्यपि इस बात को नकारा नहीं जा सकता कि जहां तक सूफी आंदोलन इस्लाम से अभिन्नरूप से गुथा हुआ था उनका विश्व दृष्टिकोण तदानुसार ही सीमित था। परंतु सूफी साहित्य में विश्वव्यापकता एवं धर्मनिरपेक्षता के तत्व हैं। और भारत में उसने हिंदुओं, सिखों और जैनों को मुस्लिमों से कम प्रेरणा नहीं दी। इदरीज शाह ने यूरोपियन साहित्य पर भी सूफी प्रभाव को आंका है; चासर ने किस ढंग से अतर और रूमी के कार्य का मूल्यांकान किया था और जर्मनों ने सादी के कार्य को कैसे पंक्ति बद्ध किया था, जाहिर है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इस औद्योगिक क्रांति के बाद के काल में, जिसने कुछ नए प्रतिमान स्थापित किये, जहां आधुनिक सामाजिक, आर्थिक और राजनैतिक संगठन और प्रक्रियायें खासकर आवश्यक हो गईं हैं मानवीय परिस्थितियों के मूल्यांकन के लिए सूफी विचार के पक्ष संदर्भित और समीचीन हैं। मनोवैज्ञानिक सहायता के साथ मानवीय स्वभाव की वैचारिक और मननशील अंतरदृष्टि, सूफी साहित्य की सूक्तियों के स्वर्ण सदृश्य सत्य को कोई भी सहज प्राप्त कर सकता है - ये वे हैं जो, समय और स्थान की परिसीमाओं को फलांगती हैं। वे आज भी मार्ग दर्शन कर सकतीं हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color: rgb(153, 51, 153);"&gt;संदर्भः&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;    वैदिक और उपनिषद साहित्य से दृष्टांत,&lt;br /&gt;    दी सटल्टीज आॅफ इनकम्पैरेबिल नसुरूद्दीन,&lt;br /&gt;    मथनवी, फीही मा फीही, रूमी,&lt;br /&gt;    गुलशन एवं बुश्तान - शेख सादी,&lt;br /&gt;    कंफ्लुऐंस आॅफ दी टू सिटीज - दाराशिकोह,&lt;br /&gt;    दी सूफीज - इदरीज शाह,&lt;br /&gt;    कबीर के दोहे,&lt;br /&gt;    भारत के प्रादेशिक सल्तनतों में सूफी प्रभावः हिंदू और जैन परंपराओं के साथ प्रादेशिक सल्तनतों का अनुकूलन एवं समझौता,&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color: rgb(153, 51, 153);"&gt;टिप्पणीः&lt;/span&gt;   &lt;br /&gt;इदरीज शाह कहते हैं कि सूफी नजरिये से मनुष्य असीम तौर से पूर्णता योग्य है, कि पूर्णता दुनियां के साथ समन्वय से प्राप्त होती है और उसके लिए भौतिक और आध्यात्मिक संतुलन की आवश्यकता होती है। वह सूफियों में सामन्जस्यता के लिए विश्वव्यापकताएं पाने और जो आदर्श धर्म का पालन करते हैं उनमें उंची चेतना की जागृति के लिए सूफियों की भूमिका के तौर पर संदर्भित करता है।&lt;br /&gt;   &lt;br /&gt;उदाहरण के लिए रूमी की रचनाओं में भौतिक और शारीरिक दुनियां से पीछे लौटने या उसके परित्याग को अनेक जगहों पर गौरांवित किया गया है। और इसके विपरीत वेदांतियों ने तो द्वैतवादी स्थिति को स्वीकार कर लिया था - ’’आघ्यात्मिक दुनियां’’ की श्रेष्ठता पर जोर देते हुए - परंतु कुछों ने भौतिकवादी दुनियां के अनुभवों को वजन देते हुए। ठीक वैसे ही जैसा कि सूफी मत दुनियावी कार्यकलापों यथा ललितकलायें, संगीत और विज्ञान को उत्साहित करते थे परंतुु कुछ अन्य थे जो इन सबको निरूत्साहित करते थे।&lt;br /&gt;   &lt;br /&gt;उस समय हिंदू वैष्णव और अन्य भक्तिवादी मतांवलंबी भी थे जिन्होंने संगीत, ललितकला और साहित्य के क्षेत्रों में बहुमूल्य योग्यदान दिया था।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3558267468781846487-9018710204930637923?l=itihaasam.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://itihaasam.blogspot.com/feeds/9018710204930637923/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://itihaasam.blogspot.com/2009/01/blog-post_463.html#comment-form' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3558267468781846487/posts/default/9018710204930637923'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3558267468781846487/posts/default/9018710204930637923'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://itihaasam.blogspot.com/2009/01/blog-post_463.html' title='सूफी धारायें और इस्लामी राजदरबारों में सभ्यता'/><author><name>अनुनाद सिंह</name><uri>http://www.blogger.com/profile/05634421007709892634</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3558267468781846487.post-1353107362286770837</id><published>2009-01-15T05:40:00.000-08:00</published><updated>2009-01-15T05:41:49.215-08:00</updated><title type='text'>सिंध की अरब विजय एवं इस्लामीकरण</title><content type='html'>पाकिस्तान में, सरकारी इतिहास मुहम्मद बिन कासिम के सिंध पर आक्रमण एवं विजय, 711 से 13 ई; को एक ऐसी घटना की तरह बताता है कि जिसने सिंध की जनता को ब्राहमणों की निरंकुश, अत्याचारी और जातिवादी शासन से समतावादी समाज की ओर प्रेरित करते हुए, स्वतंत्रा किया था। वह समतावादी समाज इस्लाम के आगमन के द्वारा ही संभव हो सका था। इस्लामी विश्वास अपनी समतावादिता, पक्षपातरहितता और न्यायप्रियता के लिए एक अद्वितीय विचारधारा है। इस बात को भी रेखांकित किया जाता है कि अरबी शासकों ने साक्षरता और शिक्षा को प्रोत्साहित किया और सिंध ने सांस्कृतिक नवजागरण को महसूस किया था। सांस्कृतिक नवजागरण ने सिंधु नदी की भूमि के पूर्ववर्तीकाल की समस्त उपलब्धियों को मात दी थी।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;चूंकि पाकिस्तान अपने को इस्लामिक तौर पर संरक्षक माने जाने का मूलभूत आधार था, यह सोचना कठिन है कि पाकिस्तान की पाठ्य पुस्तकों में बिन कासिम के आक्रमणों को किसी अन्य ढंग से बतलाया जा सके। ऐसे देश में जहां ईश निंदक कानूनों के तोड़ने पर मृत्यु दण्ड दिया जाता है, क्या यह आश्चर्यजनक नहीं है कि कुछ पाकिस्तानी विद्वानों एवं इतिहासकारों ने गंभीररूप से अनिवेषण का जोखिम उठाया, ऐसे दावों को चुनौती देने में। इस विषय पर चंूकि बहुत ही कम काम उपलब्ध है  इस काल को समझने का कार्य किसी भी ढंग से आसान नहीं है। तब भी कुछ प्रश्न पूंछना संभव है और बिन कासिम की विजय एवं सिंध की जनता पर उसके प्रभाव के पर्याप्त परिस्थितिगत साक्ष्य पाकिस्तान के शासकीय दावों को झुठलाते हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बहुधा, यह दावा कि 7 वीं सदी में सिंध ब्राहमण प्रधानता के शासन से लड़खड़ा रहा था, स्वीकार कर लिया जाता है क्योंकि उसे विभिन्न औपनिवेशिक और उपनिवेशन पश्चात् के इतिहासकारों और समाजविज्ञों के द्वारा इस कदर बारंबार दुहराया जाता रहा कि कुछ विद्वानों ने इस दावे के पक्ष में वास्तविक प्रमाणों की मांग की है। परंतु जैसा कि भारत में सामाजिक संबंधों के इतिहास  में वर्णित है कि 5 से 7 वीं सदी के गुप्तकालीन भू-आदेश प्रगट करते हैं कि जाति तुलनात्मक रूप से लचीली थी और ब्राहमणों को उस काल में सामाजिक प्रधानता प्राप्त नहीं थी। उनकी यह प्रधानता अग्रहारा  गांवों के प्रचुर मात्रा में फैलने तक नहीं बन पायी थी। गुप्तकाल के अंत में अग्रहारा  गांव की पद्धति बिहार में शुरू हुई और धीरे-धीरे शेष भारत में फैली। उसे मजबूत होने में कुछ शताब्दियों से भी ज्यादा समय लगा था। पंजाब, कच्छ, गुजरात और राजस्थान के समीपवर्ती प्रदेशों में अग्रहारा ग्रामों के संबंध में बहुत ही कम साक्ष्य उपलब्ध हैं और इन प्रदेशों के इतिहास को राजपूत, जाट, जैनों और बौद्धों ने संवारा ठीक वैसा ही जैसा कि ब्राहमणों ने संवारा था। वास्तव में, सिंध के सभी इतिहासकारों ने माना कि बिन कासिम के आक्रमण के समय सिंध की जनसंख्या का पर्याप्त भाग राजपूत और जाटों का था। बौद्धों की उपस्थिति भी दर्ज की गई और उसका अनुमोदन राज्य में बौद्ध स्तूपों और अन्य पुरावशेषों की खोज द्वारा भी हुआ।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यद्यपि बिन कासिम के आक्रमण केे समय सिंध पर ब्राहमण राजा का शासन था लेकिन एक ही पीढ़ी पहले सिंध राजपूत राजाओं के द्वारा शासित था जो, ऐसा माना जाता है, बौद्धमत का समर्थन करते थे। यह संभव है कि राजा दाहिर जनप्रिय न रहा हो यह बताने के लिए कि ब्राहमणों की प्रधानता कुछ शताब्दियों में कायम हो गयी हो। क्योंकि खास राजपूत कुलीन एवं समाज के अन्य हिस्सों के समर्थन द्वारा एक ब्राहमण राजा का राज्य प्रमुख बनना एक घटना रही हो। कोई ज्यादा से ज्यादा यही कह सकता है कि उच्च कुलों में दलगत विरोधों ने सिंध के पतन में योगदान दिया था।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;/सिंध के इतिहासकार जी.एम.सईद को 1964 में सिंध संबंधी विरोधी मत के कारण जेल की सजा दी गई थी, ने एक अलग व्याख्या दी थी इस बात का दावा करते हुए कि आक्रमणों के समय राजा दाहिर का शासन धार्मिक सहष्णिुता और उदार विचारों वाला था जिसके कारण विभिन्न धर्म शांतिपूर्वक रहते थे; जहां हिंदुओं के मंदिर, पारसियों के अग्नि मंदिर, बौद्ध स्तूप और अरब मुसलमानों की मस्जिदें थीं। अरब मुसलमानों को समुद्र के किनारे पर बसने की अनुमति दी गई थी। उनके अनुसार सिंध के आक्रमण का मूल उद्देश्य राजा दाहिर से इस बात का बदला लेना था कि उसने परशिया में हारने के बाद ससानियन कुलीनों और सेनापतियों को राज्याश्रय दिया था। यह अविचारणीय नहीं होगा कि उम्मेदों को इस बात का डर था कि ससानियन भारत की भूमि से पुनः उन पर आक्रमण न कर दें और वे सिंध-परशियन सहयोग जो अरब विस्तार के लिए खतरा बन सकता था उसे खत्म करने की वास्तविक या काल्पनिक कामना रखते थे। बाद में पारसियों का गुजरात जाना और उन्हें राज्याश्रय दिया जाना इस बात की पुष्टि करते प्रतीत होते हैं।/&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जबकि जातिविभेदों ने हिंदू समाज के संयुक्त प्रतिरोध इस्लामी आक्रमणकारियों को न देने दिये हों, यह प्रगट नहीं होता कि इस्लामी आगमन ने सबसे दलित जातियों को, स्वतंत्राता दिलाई हो। अलबरूनी, खिवा में 973 ई. में जन्मे, के अनुसार हिंदू समाज में घृणित  काम करने वाले लोगों के साथ भेदभाव बरता जाता था परंतु यह ध्यान में रखा जाना चाहिए कि सिंध और भारत के अन्य जगहों में, स्पष्ट तौर से ऐसे उत्पीड़ित समुदाय थे जो कभी इस्लाम में नहीं बदले गए और उन्हें हिंदू और मुसलमानों दोनों, के हाथों भेदभाव सहना पड़ता रहा।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;/यह भी ध्यान में रखना चाहिए, 11 से 12 वीं ई. के सुमरा शासक इस्लाम के परिवर्तित राजपूत थे, 13 से 14 वीं सदी के ही सुमराओं के समान। उपनिवेशन के बाद जातियां व्यापार और वाणिज्य जैसे हिंदू बनिया और लोहना या उनके मुसलमान प्रतिपक्ष जैसे मेमोन ने कारीगरों और किसानों एवं नगद कर्जदारों पर मजबूत पकड़ बनाई और उनसे से जुड़े। कमोबेश इस्लाम परिवर्तन ने पूर्ववर्ती जातिगत प्रतिबद्धताओं और सामाजिक श्रेणियों को समाप्त नहीं किया। जरीना भट्टी कीः ’’सोशियल स्ट्र्ेटिफिकेशन अमंग मुस्लिम इन इंडिया’’ और एम.एन.श्रीनिवास कीः ’’काॅस्टः इट्स टुवंटीयथ सेंचुरी अवतार,’’ वाईकिंग न्यू दिल्ली, 1996, पृ. सं. 249-253 देखिए।/&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अलबरूनी ने भारत और प्राचीन परशिया में जातिप्रथा की समानतायें देखते हुए पड़ौसी पंजाब के विवरण दिये और शहर या गांवों में चार प्रमुख जातियों या वणों के आपसी संबंधों एवं सहयोग, यहां तक कि साथ-साथ रहने, के बारे में लिखा और यह  पाया कि अछूतों ने अपने आठ समुदाय बनाये हुए थे और वे शहर या गांव के बाहर पास में ही रहते थे। उसके उल्लेख से कोई भी यह अर्थ निकाल सकता है कि अछूतों का दर्जा नीचे का दर्जा था परंतु 4 जातियों के बीच ब्राहमण या क्षत्रिय और उसी तरह वैश्य और शूद्र के बीच दूरी उस तरह से नहीं थी जैसे कही या बतलाई जाती है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अनबरूनी ने इस बात पर बहुत ही कम लिखा कि समाज में ब्राहमणों की सत्ता या स्तर विशेष था परंतु ईश्वरी मामलों पर वे शब्दों से युद्ध करते थे /हिंदुओं के बारे में जिनका उसने अध्ययन और जिनसे व्यवहार किया/ परंतु वे उनकी आत्मा या शरीर या संपदा धार्मिक विरोध के कारण नहीं लेते थे।  उसने यह भी पाया कि हिंदुओं ने विज्ञान की अनेक शाखायें बना ली थीं और असीम साहित्य उनके पास था .....।  सीढ़ीदार कुओं से वह खासकर प्रभावित हुआ और लिखा थाः उन्हांेने कला की उंचाई प्राप्त की है। हमारे लोग /मुस्लिम/ जब उन्हें देखते तो आश्चर्यचकित होते और उनके विवरण देने में असक्षम हैं और उनके समान कुछ भी बनाने में तो और भी असमर्थ हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हिंदू समाज के सरकारी विवरणों से अलबरूनी के पंजाब संबंधी ब्यौरे अलग-थलग हैं। बल्कि वे पाकिस्तान के अधिकारिक इतिहासकारों के लिए कष्टदाई उक्तियां पैदा कर देते हैं। यदि इस्लाम सचमुच में हिंदू समाज को ब्राहमणवाद की बुराईयों से मुक्त करने के लिए एक कारक थे /जैसा कि बार-बार घोषित किया जाता है/ तब सिंध में इस्लाम  की विजय की तीन सदियांे बाद एकदम पास पंजाब में हिंदू समाज जिंदा बना रहा और इस्लामीमत ने हिंदुओं के बीच कुछ ही परिवर्तितों का विश्वास जीता परंतु भेदभाववादी जाति समुदायों में नहीं ? और बिन कासिम के बाद सिंध शिक्षा और संस्कृति का बड़ा केंद्र बना था तो फिर अलबरूनी ने /समर्पित मुसलमान/ पंजाब में हिंदू वैज्ञानिक किताबें पढ़ीं परंतु इस्लामी  वैज्ञानिक किताबें सिंध में नहीं पढ़ीं !&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यह निश्चित तौर पर अजीब है कि उसकाल का एक भी पुरातनकालीन साक्ष्य या स्मारक उपलब्ध नहीं है जो सिंध में अरब संस्कृति के दावे को पुष्ट कर सके ? एक ब्रिटिश इतिहासकार ने टिप्पणी की थीः ’’इसके बाबजूद कि उनका आधिपत्य आंशिक और अस्थाई रहा, हमारे देश /ब्रिटेन/ की मिट्टी उनकी /रोमन/ इमारतों, केम्पों, सड़कों, सिक्कों, बर्तनों से भरी है यह प्रगट करने के लिए कि वे ब्रिटेन के मालिक रहे। परंतु सिंध में अरब प्रभुत्व के संदर्भ में किसी भी यात्राी के लिए यह असंभव है कि उस भूमि की यात्रा में उनके अधिपत्य के अभिलेख की अनुपस्थिति से चमत्कृत न हो।’’&lt;br /&gt;यह सब और भी चकराने वाला है जब कोई पड़ौसी राज्यों, राजस्थान और गुजरात में, 8 वीं और 13 वीं सदी के बीच बने  प्रभावशाली और समुद्ध मंदिरों, सीढ़ीदार कुओं, स्वागत द्वारों, विद्यालयों और मठों को देखता है जिन्होंने सफलतापूर्वक अरब आक्रमणों से अपना बचाव किया था।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सिंध के इतिहासकार जी.एम.सईद के अनुसार 11 वीं सदी के सुमरा राजपूत थे और नाममात्रा के मुसलमानों ने सिंध में राज्य सत्ता हासिल की और तीन सदियों तक राज्य किया। तब तक सिंध अरब खलीकत को कर चुकाने से मुक्त हो चुका था और सुमराओं और बाद के सुमाओं के द्वारा बनाये गए स्मारक बचे हैं यद्यपि वास्तुशिल्प के महान निर्माण कार्य सिंध में 16 वीं सदी से ही शुरू हुए थे।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यद्यपि 9 वीं और 10 वीं सदी के अरब अभिलेखों में विजय पूर्व के सिंध में व्यापार और कृषि उत्पादकता के संदर्भ उपलब्ध हैं परंतु ध्यान देने योग्य नहीं हैं, क्योंकि अरब की भूमि कृषि क्षेत्रा में सदैव पिछड़ी रही थी और सिंध के सकारात्मक संदर्भ ग्रीक इतिहासकारों के लेखन में उपलब्ध हैं /जिन्होंने वर्णन किया कि ग्रीकों की नजर से वह सबसे समृद्ध था/ और कुछ ही शताब्दियों बाद सिंध को रोमन इतिहासकारों के द्वारा धनाढ्य देश माना गया था /निचले सिंध के पटाला को विशेष संदर्भ में व्यापार का केंद्र कहा था। जो आश्चर्यजनक है वह यह है कि अरब विजय के बाद, सिंध सदृश्य ही विशाल पैमाने पर गुजरात एवं अरब के बंदरगाहों के बीच, व्यापार होता था।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इस रहस्यमयता का समाधान सिंध की विजय के परशियन अनुवाद चाचनामा  या तारीख़ ए हिंद वा सिंध, मोहम्मद अली बिन हमीद बिन अबु बकर /कुफी, 13 वीं सदी/ है जो एक बिलकुल दूसरी ही कहानी बयां करती है। भारतीय उपमहाद्वीप में एक महान सामाजिक क्रांति के भांति इस्लाम के आगमन की कहानी का विरोध करते हुए चाचनामा में उसे एक डकैत समान विजय बताया उम्मद शासकों के लिए लूटी हुई भारी संपदा, सोना-चांदी और आभूषण और दास स्थानांतरण करते हुए जिसने जनता पर कहर बरपा। बिन कासिम और उसके सैनिक सहयोगी विजय से बड़े तौर पर लाभांवित हुए और स्थानीय जनता की कीमत पर वे स्वयं रहीस बने। उसकाल के अन्य इतिहासकारों ने - कुतुहू ए बुल्दान, अहमद बिन यहाया, बिन जबीर /892 से 893 सदी/ ने वर्णन किया कि किस प्रकार की जल व्यवस्था के विनाश से विजयें हासिल की गईं जिससे जनता पीने के पानी के अभाव में आत्मसमर्पण करने के लिए विवश हुई थी। दोनों प्रमाण सैनिकों और नगरवासियों की हत्या एवं स्त्रिायों और बच्चों को बड़ी संख्या में दास बनाकर ले जाने का वर्णन करते हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;संचित सोना-चांदी और अन्य संपत्तियों को लूट और अनुमानतः एक मिलीयन दिरहम प्रतिवर्ष सालाना भेंट देने की मांग से सिंध अपने पूर्वी पड़ौसी राज्यों - राजस्थान और गुजरात जो इन विपदाओं से मुक्त रह गए थे, के मुकाबले में सांस्कृतिक और आर्थिक रूप से ग्रहण ग्रस्त हो गया था। यह बतलाना रुचिकर होगा कि इस्लाम के संदर्भ सैन्य विजयों के बाद के विचार हैं जब धन संपदा को लूटना और दासों को ले जाना भगवान, इस्लाम या पवित्रा पैगम्बर के नाम पर न्याय सम्मत था। मंदिरों को मस्जिदों में बदलना सैन्य एवं राजनैतिक आक्रमण की सफलता के संकेत हैं बजाय कोई धर्म विजय के।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इन दो प्रमाणों में से जो उल्लेखनीय है वह है जनता का आम धर्मपरिवर्तन। इस्लाम-परिवर्तन हारी हुई जनता का एक मात्रा विकल्प था और ऐसा अनुमान है कि इस्लाम में परिवर्तन, समर्पण, नई सरकार को नजराना देते रहना और विजेताओं की सत्ता को चुनौती न देने का प्रमाण था। यद्यपि हर किसी को धर्मपरिवर्तन नहीं करना पड़ता था परंतु सबसे खतरनाक और  सबल प्रतिरोधियों पर धर्मपरिवर्तन का दबाव रहता ही था - राजपूत और जाट और स्त्रिायों की अपेक्षा पुरुषों पर। दूसरों का परिवर्तन तो साधारणतया बाद की बात थी।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अरब प्रसार के काल में यह एकदम असाधारण बात थी, और बड़े रूप से इस मत को पुष्ट करती थी कि ’’शासक का धर्म ही जनता का धर्म’’ होता है और इसे अरब इतिहासकार इब्न खल्दून, जन्म टयुनिशिया 1332, द्वारा बारंबार और जोर देकर कहा जाता था, ’’मुक्वादिमाह - इतिहास का एक परिचय’’ में। इब्न खल्दून की रचनायें रुचिकर हैं क्योंकि एक समर्पित मुस्लिम और पैगम्बर तथा कुरान की कथाओं के समर्थक की तरह उसके अरब साम्राट घरानों एवं उनके मूल अरब प्रायद्वीप के इस्लामीकृत बेनुइन कबीलों से होने के वर्णन को जो विश्वसनीयता और स्वीकारिता मिली वैसी अन्य इतिहासकार प्राप्त नहीं कर सके। परंतु अरबी दुनिया के सर्वोत्तम इतिहासकारों में से एक स्तर की जिम्मेवारी है अतिश्यिोक्तिपूर्ण, अनर्गल और असंभव दावों पर प्रश्न चिह्न लगाने की जो अल मसौदी और अल वाकुदी जैसे इतिहासकारों द्वारा किये गए। इब्न खल्दून  सचेत था कि राजाशाही की शक्ति एवं गौरव को किसने बढ़ाया और अरब दुनिया में राजकुल कैसे उदय हुए और कैसे उनका पतन हुआ। उसकी कुछ रचनाओं में सराबोर करने वाला बौद्धिक तत्व महत्वपूर्ण है। दो राष्ट्र् नीति और आज पाकिस्तान में इस्लामी जिहाद के ईषालु वकालत करने वालों के विपरीत इब्न खल्दून विशाल और स्थाई साम्राज्यों के बनने एवं सुरक्षित रहने में राजशक्ति की भूमिका के वर्णन ज्यादा खुलासा करने वाले हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यद्यपि इब्न खल्दुन कुरान से बार-बार उदाहरण देते हैं और ऐसी ही भगवान की इच्छा है  या ऐसे ही भगवान के रास्ते हैं , वह समानता या सामाजिक न्याय से नैतिक सरोकार व्यक्त करता है, जब वह कुलीन विजयों या कुलीन सत्ता की अतिशयता के बारे में लिखता है। कैसे के बारे में बोलते हुए साधारण जनता शासक के धर्म को मानती है  उसने लिखा थाः शासक अपने मातहतों को दबा के रखता है। उसकी प्रजा उसकी नकल करती है क्योंकि वे उसमें संपूर्णता मानते हैं बिलकुल वैसे ही जैसे बच्चे अपने पालकों की या विद्यार्थी अपने शिक्षकों की नकल करते हैं। ईश्वर बुद्धिमान और सब कुछ का ज्ञाता है।  यद्यपि कोई भी इस कथन कि क्यों जनता इस्लाम को स्वीकार करती है के सही वर्णन पर प्रश्न कर सकता है कि अरब दुनिया में इस्लामी शासकवर्ग जनता को अपना धर्म चुनने या पालने के लिए कोई भी स्वतंत्राता नहीं ंदेता था।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इब्न खल्दुन के नजरिये में राजकुल दल भावना  से पैदा होते हैं, उसका विश्वास था, दल-भावना रक्त बंधन या उस प्रकार के संबंधों से उत्पन्न होती थी। कठिन परिस्थितियों के कारण बेदुउन रेगिस्तान से परिचित थे, उसने उनमें दलीय भावना  के पैदा और विकसित होने की सबसे अधिक योग्यता महसूस की। उसने यह भी पाया कि वे लड़ने में और एक दूसरे को दबा कर रखने में निडर थे। उनकी बर्बरता  में राजशाही के बीज देखे। उन्हें अराजक और जंगली भी माना क्योंकि वे दूसरों पर धावा बोलने एवं लूट के लिए समर्थ थे और जिन्हें वे जीत लेते उनकी संस्कृतियों को नष्ट कर देते थे। वह बेदूउन विजयों के बाद सूडान, ईराक, सीरिया और यमन के विनाश का उदाहरण देता है। वह तर्क देता कि राजाशाही नेतृत्व के विकास के लिए  इस्लाम जैसे शक्तिशाली धर्म की आवश्यकता थी, जैसा कि उसने अरब की विजय की शुरूआती सफलताओं में देखा था। यह इस्लाम के संग-साथ रहने की शक्ति थी जिसने अरबों को राजनैतिक नेतृत्व के साथ दल भावना  से युक्त किया जो जीतने और राजाशाही वंशावलियों के जीवित एवं स्थाईत्व के लिए आवश्यक था। उसने पश्चात्वर्ती पतन का कारण धर्म की उपेक्षा एवं दल भावना  तथा नेतृत्वकारी क्षमता का परित्याग, संपदा का लालच और नागरी ऐश्वर्य को माना था।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इन सिद्धांतों के उन्नत होने में राजवंशी शासनों के उत्थान और पतन की, अरब विजयों के बाद परशिया का उदाहरण देते हुए उसने माना कि एक हार गया देश दूसरे के शासन के आधीन जल्दी ही नष्ट हो जाता है, उसने एक देश के द्वारा दूसरे देश के विनाश को नैतिक भूल नहीं माना। उदाहरण के लिए उसने उप-सहारा अफ्रीका के देशों की विजयों से उपजी दुरावस्थाओं के विरोध में किसी भी नैतिक प्रतिवाद को नकार दिया था, यह कहते हुए कि वह उनकी कमजोरी  और अयोग्यता  के कारण  अरबों की जीत का परिणाम था।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इब्न खल्दून अरब विजयों में जनता के इस्लामीकरण से विजेताओं या दमितों को कोई लाभ मिले ऐसा नहीं मानता और न ही इसमें इस्लामी नीतिशास्त्रा में कोई विरोधाभास मानता था। उसकी रचनाओं में विशेष यह था कि इस्लाम कबीलाई नेतृत्व के निकास का कारक था और इस्लामी शासककुलीनों की दलीय भावना  में जो राजनैतिक नियंत्राण के योगदान में जोड़क का साधन था। इस्लाम शासक बौद्धिक वर्ग की दलीय भावना  में जो आवश्यकरूप से भागीदारी नहीं करते थे उनके नियंत्राण का साधन था। पक्षपात रहित  या न्यायोचित  संबंधी कथन अरबों की विजय के इस्लाम के लिए कृतज्ञकारी विवेचन समान थे।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इस प्रकार से यद्यपि इब्न खल्दून ने कोई खास कथन सिंध की विजय संबंधी नहीं दिये परंतु दूसरी सीमाओं की सभ्यताओं का बेदुउन आक्रमण या अरब नियंत्राण से क्या हुआ था का उसका बेबाक मूल्यांकन सुयोग्य था जैसा कि चाचनामा या फुतुहू बुल्दान में था। इससे उसकी रचनाओं से यह अर्थ लगाना संभव है कि अरब आक्रमण और सिंध विजय ऐतिहासिक नमूने का एक राजनैतिक तरीका था जो सीरिया से सिंध तक फैला था। अरब साम्राज्य ने तेजी से अपनी पहुंच और नियंत्राण को प्रत्येक पुरानी सभ्यता को धराशायी करते हुए बढ़ाया था। इतिहास का यह नजरिया विचार के लिए एक नया आयाम लायेगा कि किसने अरब सफलता के लिए योगदान दिया था - दलगत भावना  और सैन्य साहस जो भौतिक तौर पर ज्यादा उन्नत था, परंतु सुस्थापित नागरी सभ्यतायें उनका प्रतिरोध नहीं कर सकीं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सभी हारी सभ्यताओं के लिए एक समान यह था कि जनता के मध्य कोई जातीय भक्ति के बंधन नहीं थे। सामाजिक तौर पर छितरे होने से धार्मिक सहष्णिुता और विभिन्नता या जात विभाजन के कारण /जो श्रम के अंतर और विशेषताओं से या दोनों से बढ़कर/ संभव है कि ये सभ्यतायें छितरा गईं और आगे बढ़ उनकी सुरक्षा कमजोर हो गई। क्योंकि इन आक्रमणों ने हिंदू, बौद्ध, मैनिशियन और पारसी समाजों को समान रूप से एक ओर ढकेल दिया। इतिहास का यह साधारण नजरिया इस प्रकार जातिवाद की ब्राहमणवादी प्रधानता, कठोरता या सर्वोपरिता के मूलभूत कारक की धारणा पर ही प्रश्न करेगा।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;/जो विचाराधीन है और इस विषय पर आगे खोज होना चाहिए - नीचे संदर्भ देखिए, वह है बौद्धों के बुद्धिवाद का पतन, समाज के महत्वपूर्ण अंग ब्राहमणों की भविष्यवाणियों को स्वीकार करने लगे थे और व्यक्तिगत और जनसाधारण के धर्म-रिवाजों यथा हवन, सामूहिक आरती और जागरण थे जिन्होंने समाज को आध्यात्मवाद और अव्यवहारिक दिशा की ओर मोड़ दिया होगा। परंतु यह ध्यान में रखने योग्य है कि इस्लाम के आगमन ने समाज को बौद्धिक और वैज्ञानिक दिशाओं की ओर नहीं मोड़ा। अरबों ने भारतीय ज्योतिषविज्ञान के सिद्धांतों में रुचि ली थी और इस्लाम ने आत्मा को हराने वाले कलापों का गठन कर लिया था जो लम्बे समय में ज्यादा असरकारक अपेक्षाकृत सामाजिक रिवाजों के हो गए थे। और उस समय हिंदू समाज में तो सामान्य बात बन गये होगें।/&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यद्यपि अरब सफलताओं में इब्न खल्दून की रचनायें इस्लाम की भूमिका पर जोर देती थीं उन से यह निर्णय करना संभव नहीं है /और जैसा कि अन्य इस्लामी विद्वानों ने प्रयास किया/ कि इस्लाम की सार्वभौमिकता एवं सर्वोपरिता का दावा किया जाये कि वह उन समाजों के जो उनके मत को स्वीकार कर लेते थे, सांस्कृतिक स्तर को उन्नत करने का स्वाभाविक रुख  रखता था। यह कि इस्लाम एक राजनैतिक औजार ज्यादा था /बजाय अपने आप में उन्नत, वैज्ञानिक, दार्शनिक या सांस्कृतिक पद्धति के/ यह बताने के लिए कि कैसे खास सभ्यताओं से उम्मेद सांस्कृतिक प्रेरणा प्राप्त करते थे जिन्हें वे हटाना और बदल देना चाहा करते थे। यह अब्बासिदों के साथ ज्यादा था कि जो उम्मेदों के उत्तराधिकारी थे। दोनों ने विद्वानों को बुलाया /खासकर उन्हें जिनको वे दास बंदियों की तरह लाये थे/ उन्हें वैज्ञानिक एवं दार्शनिक किताबों के अनुवाद करने के लिए उत्साहित किया या उक्साया मय ईजिप्त, ग्रीक, सीरिया, बेबीलोनिया और भारत के प्राचीन एवं तात्कालिक स्त्रोतों से।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यह ध्यान देने के लिए विशेषकर महत्वपूर्ण है  कि अब्बासिदों के राज्य में कुछ हद तक राज्य एवं चर्च का अलगाव था जो कला एवं विज्ञान के जाने माने आश्रयदाता थे। राज्य और चर्च के इस अलगाव ने बगदाद और बसरा में विज्ञान की खोजों के होने में सहायता दी और विभिन्न स्त्रोतों से ज्ञान प्राप्त करने के लिए राजदरबारी विद्वानों को मौका दिया।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अरब ओ हिंद के ताल्लुकात  के लेखक सईद सुलेमान नद्वी और अन्य अनेक इतिहासकारों के अनुसार अरब में ज्ञान प्राप्ति के लिए सिंध के गणितज्ञों और दार्शनिकों ने अद्वितीय योगदान दिये थे। खलीफाओं और मालिकों के उपचार के लिए अनेक वैद्य सिंध से बुलवाये गए थे जिनमें गंगा और मनका भी थे जिन्होंने हारून अल रशीद का भी इलाज किया था। नया-नया परिवर्तित मुस्लिम सिंधी डाक्टर था सालेम बिन मायला /भल्ला/ जिसने उल्लेखनीय काम किया था। अबुल अता सिंधी, हारून बिन अब्दुल्ला मुलतानी, अबु मुहम्मद मनसूरी, मंसूर हिंदी, मौसा बिन याकूब, सफी, अबू जिला सिंधी और कश्आजम बिन सिंधी बिन शाहक ने अरबी कवियों एवं लेखकों की तरह नाम कमाये थे। सिंधी विद्वान और विकित्सकों ने बगदाद में  गणित, ज्योतिषशास्त्रा, औषधिशास्त्रा, साहित्य और नीतिशास्त्रा विषयों के संस्कृत ग्रंथों का अनुवाद अरबी भाषा में किया।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कुरान की एकांतिकता और सूफियों की उदारता के बीच अंतर को समझना चाहिए क्योंकि ये तो सूफी ही थे जिन्होंने इस्लाम को स्वीकार कर लेने वाले देशों में कला और संस्कृति के क्षेत्रों में महत्वपूर्ण योगदान दिए। जब तक सूफियों को मान्यता दी जाती रही तब तक उन्नति का रास्ता कायम रहा और दूसरी सभ्यताओं से सकारात्मक तत्वों को अरब समाज अपने में समाहित करता रहा।&lt;br /&gt;अनेक अरब विद्वान भारतीय वैज्ञानिक पुस्तकों के अनुवाद एवं अभिग्रहण पर विश्वास करते थे। प्रसिद्ध विद्वान अल फजरी, 8 वीं सदी और उसके पुत्रा मोहम्म्द और याकूब बिन तारिक संस्कृत की खगोलविज्ञान संबंधी पुस्तकों केे अनुवाद से संलग्न रहे थे। बसरा में जन्मे 9 वीं सदी के अलकिंदी ने भारतीय अंकों के उपयोग का वर्णन करते हुए गणित संबंधी 4 पुस्तकें लिखीं। अल ख्वारिज्मी, खिबा में जन्में, मृत्यु 850 में, कालिफ अल मामुन, 813-833, राज्यकाल में ग्रीक और भारत के गणित, खगोलविज्ञान और भूगोल संबंधी ज्ञान की समाहिती के लिए ख्यात् थे। दूसरों ने वैज्ञानिक पद्धति की भारतीय रचनाओं के अनुवाद किये और चाणक्य के अर्थशास्त्रा, महाभारत  और पंचतंत्रा कहलीसा  और दिमना  के नाम से प्रसिद्ध हुईं। परशियन और अरबी दोनों में बड़े पैमाने पर अनुदित पुस्तकों कोे अब्बासिदों के शासनकाल में सचित्रा करके पुनः रचा गया था।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सिंधी बही खाते भी प्रचलित थे। जहेज, मृत्यु 874 ई. के अनुसार ईराक में सभी सराफ  सिंधी थे। सिंध कृषि उत्पाद और नगद फसलों का और साथ ही, मुलायम और रंगीन चमड़े सहित चमड़े की विभिन्न वस्तुओं का बड़ा निर्यातक था। मंसूरा के चमड़े के जूते खास तौर पर प्रसिद्ध थे। इमाम हनोई की मूरूग उज जहाब से उद्धत। इस प्रकार सिंध के विज्ञान, संस्कृति और आर्थिक जीवन का अरब पर गहरा प्रभाव था।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;परंतु जबरिया इस्लामीकरण के बाद सिंध में विज्ञान का विकास धीमा हो गया और अरब, परशिया एवं मध्य एशिया का ध्यान पंजाब, गुजरात और भारत के अन्य बौद्धिक केंद्रों की ओर गया। इसलिए यह दावा कि बिन कासिम जैसे अरब आक्रमणकारियों के संरक्षण में इस्लाम के आगमन की घटना सिंध की जनता की समृद्धि और सांस्कृतिक उत्थान के लिए नये प्रगतिशील युग की द्योतक है, एक निराधार दावा है और वास्तव में, यदि विरोधी साक्ष्यों को परखें तो लगभग असंगत है। उस घटना ने ’’सिंध को अकथनीय और भयंकर स्थितियों से मुक्ति दिलाई’’ यह राजनैतिक जरूरतों से उत्पादित और इस्लामी शौर्यवानता से प्रेरित एक दूसरी कल्पना है। इसके लिए साफ या तर्क सम्मत ऐतिहासिक तथ्यों और साक्ष्यों का नितांत अभाव है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अधिकांश भाग सिंध के सरकारी इतिहास कथानकों और भ्रमों की तरह जीवित रह सकते हैं। इस प्रकार की वाकपटुता के पीछे गहरा कष्टदाई और अकथित उलझाव यह है कि सिंध की जनता खुद ब खुद स्थानीय तानाशाहों से संघर्ष करने में नपुंसक थी और उसे स्वतंत्रा कराने के लिए बाहरी लोगों की आवश्यकता थी। इसके अतिरिक्त एक यह भी अनुमान था कि सिंध के लोग अपने बल पर सांस्कृतिक मूल्य का कुछ भी पैदा करने के योग्य नहीं थे और उनके भीतर जो भी सांस्कृतिक व दार्शनिक पद्धति उत्पन्न हुई थी वह अपर्याप्त थी और बाहरियों द्वारा उनको बदले जाने की आवश्यकता थी। इस प्रकार के दावे न केवल एक राष्ट्र् के सम्मान के लिए घातक हो सकते हैं वरन् ये वे ही ख्यालात् हैं जो स्पष्ट रूप से औपनिवेशिक शासन के ख्यालात् थे।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;क्योंकि पाकिस्तान के निर्माणकत्र्ताओं के मस्तिष्क में मुश्किल से गैर-उपनिवेशन आ पाता है, इस प्रकार के अनेक पूर्वाग्रह बिना चुनौतियों के ही रह गए हैं। इसके बदले दो राष्ट्र् नीति और देश के बटवारे ने पाकिस्तानियों के लिए कितने ही असंभव और हानिकारक विवादों को पैदा किया। यद्यपि यह असंभव है कि पाकिस्तान का वर्तमान शासकवर्ग कभी भी सिंध को सही और सत्य के तौर पर पेश करेगा तथापि साधारण सिंधी पूंछ सकता है कि सिंध में इस्लाम का आगमन जनसाधारण के लिए लाभदायी था तो फिर यह कैसे है कि आज भी सिंध का ग्रामीण जनसाधारण आदमी दुनिया में सबसे अधिक अशिक्षित और पददलित है। क्या यह व्यंगात्मक नहीं है कि पड़ौसी राजस्थान में /जोकि भारत का मूलरूप से हिंदू जनसंख्या के साथ सबसे कम उन्नत राज्य/ पाकिस्तान के 45 प्र.श. के मुकाबले 61 प्र.श. से अधिक शिक्षित लोग हैं। /निश्चित ही भारत के सबसे अधिक औद्योगिक गुजरात राज्य या सबसे अधिक समृद्ध पंजाब राज्य, /दोनों में 70 प्र.श. शिक्षा/ दोनों से सिंध की तुलना करना तो स्थिति को और भी दुरूह बना देना है।/&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आज का सिंध /जो एक समय दुनिया की शुरूआती सुव्यवस्थित सभ्यताओं में से एक की हरप्पन और मोहनजुदाड़ो की सभ्यता सांस्कृतिक और आर्थिक कष्टों में है/ भारी तौर पर गल्फ के तेल की राजाशाही के देश-प्रत्यावर्तन पर आर्थिक रूप से औपनिवेशिक भूतकाल केे वजन और वर्तमान की तानाशाही से लड़ता हुआ बेहद आश्रित है। सिंध धार्मिक संहारक युद्ध के खून से लगातार सनता रहता है। यहां तक कि आंतरिक रूप से पंजाबी सैन्यवर्ग के हाथों भेदभाव को सहता रहा। उसके सच्चे इतिहास की वापिसी के लिए पहला कदम भूतकालीन औपनिवेशिक बेड़ियों से और अरब आक्रमणों और विजयों के झूठे गुणगान से छुटकारा पाना होगा जिसने उसकी समृद्धि को लूटा और बदले में चंद छुद्र टुकड़े दिये।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;वस्तुपरक और पक्षपातरहित ऐतिहासिक अभिलेख प्रगट कर सकते हैं कि सिंध को अरब आक्रांताओं द्वारा ’’मुक्त कराया और सुसंस्कृत किया’’  से बात और साक्ष्य एकदम उलटे हैं। बल्कि सिंध ने नये अरब को शिक्षित और सुसंस्कृत किया और जिसने बदले में भारत के ज्ञान को यूरोप में पहुंचाया था। इस्लाम पूर्व के इतिहास को घृणा या अवहेलना की दृष्टि से देखने की बजाय सिंध के बौद्धिक और सांस्कृतिक रिवाजों के सकारात्मक पक्षों का संज्ञान लिया जाना चाहिए जो इस्लामीकरण पूर्व विकसित हुए थे और जिन्होंने अरब और पश्चिमी दुनिया की सभ्यताओं के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका अदा की थी।  &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color: rgb(153, 51, 153);"&gt;संदर्भः&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;चाचनामा, फुतुह ए बुल्दान, अनुवाद,&lt;br /&gt;हिस्ट्र्ी आॅफ इंडिया ऐज टोल्ड वाई इट्स ओन हिस्टोरियंस् - इलियट और डोसन,&lt;br /&gt;अलबरूनीज इंडिया - ई.सी.सचू, न्यू देहली, लो प्राइज पबलिकेशंस्, 1996, भाग 2,&lt;br /&gt;फुतुह ए बुल्दान - अहमद बिन याहया, बिन जाबिर,&lt;br /&gt;अरबोहिंद के ताल्लुकात - सुलेमान नादवी,&lt;br /&gt;दा मुकद्दिमा /इतिहास एक परिचय/ - अनु. फ्रांज रोजिथाल,&lt;br /&gt;ऐंशियंट ट्र्ेड इन पाकिस्तान - मारटीमर व्हीलर, पाकिस्तान  क्वार्टरली भाग 7, 1957,&lt;br /&gt;क्पम च्ीपसवेवचीपेबीमद ।इींदकसनदहमद कमे ंस.ज्ञपदकप दृ डनदेजमतए 1897ए भ्ण् ैनसजमतए&lt;br /&gt;क्पम डंजीमउंजपामत नदक  ।ेजतवदवउमद कमत ।तंइमत दृ भ्ण् ैनसजमतए&lt;br /&gt;सिंध आॅॅन थ्रेस्होल्ड आॅफ 21 संेचुरी - इक्बाल तरीन,&lt;br /&gt;सिंधु देश - जी.एम.सईद।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color: rgb(153, 51, 153);"&gt;टिप्पणीः&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जैसा पहले कहा जा चुका है ज्योतिषविद्या का नकारात्मक प्रभाव और हिंदू समाज के कर्मकाण्ड की भ्रांतिपूर्ण आस्था ने आक्रांताओं /जो जंग के मैदान में गौरव और नैतिकतारहित थे/ के विरुद्ध सुरक्षात्मक योजनाओं के बनने में बाधा उत्पन्न की। आक्रांता ज्यादा व्यवहारिक और युद्ध कौशल में भारी प्रतीत होते हैं। सिंध के संबंध में इस प्रकार के कारण कितनी दूर तक कारक बने थे, और अधिक खोजबीन की जरूरत है। परंतु बाद की लड़ाईंयों के प्रमाण षड़यंत्राकारी हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उदाहरण के लिए गुजरात का एक वाक्या है जनता की सामूहिक ’’आरती’’ और ’’हवन’’ जो इस विश्वास से किए गए थे कि आक्रमण टल जायेगा बजाय किसी प्रकार की मजबूत सुरक्षात्मक योजना या तैयारी के। यह भी उदाहरण है पृथ्वीराज चैहान की सेना ने लड़ाईयों में अनेक बार इसलिए मौके गंवाये थे कि ग्रह-नक्षत्रा की दशायें उनके पक्ष में नहीं होने के कारण सेना ने आगे बढ़ने से इंकार कर दिया था।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;परंतु इन सब कमियों के होने पर भी यह प्रगट होता है कि ’’महाभारत’’ /जिसका उस समय तक परशियन और अरबी में अनुवाद हो चुका था/ में वर्णित संकोच और संवेदनारहित सैन्य तौर तरीकों को आक्रमणकारियों ने हमारे मुकाबले ज्यादा सावधानी, गौरव और स्वाभिमानी ढंग से अपनाया लिया था जबकि भारतीय शासक युद्ध की आदरपूर्ण नैतिकता से ही जुड़े रहे परंतु आक्रांता ऐसे किसी सदाचरण या नैतिक अवरोध से मुक्त रहे थे।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;दूसरी ओर, राजस्थान और बुंदेलखंड के राजपूत और उड़ीसा के कलिंग/उत्कल राजा सफलतापूर्वक आक्रांताओं से लड़े और दूसरे दिन की लड़ाईयों के लिए पूर्व तैयारियों में संलग्न रहे। और संभवतया यह कोई संयोग नहीं था। उड़ीसा क्षेत्रा में समाज पर ज्योतिष एवं वैदिक कर्मकाण्ड का 15 वीं सदी तक अपेक्षाकृत कम प्रभाव रहा और राजस्थान और बंुदेलखंड में ब्राह्मणों की भागीदारी उतनी प्रमुख कभी भी नहीं रही। यद्यपि ज्योतिष की रुचि ने अनेक भारतीयों को गणित और खगोलशास्त्रा में महत्वपूर्ण खोज करने के लिए प्रेरणा दी थी परंतु उसका युद्ध भूमि में अतिशय प्रभाव स्पष्ट तौर पर घातक ही रहा था।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;दूसरे विश्लेषकों ने आक्रमणकारियों की सफलता का श्रेय आंशिक तौर पर बेहतर हथियारों एवं युद्ध की उन्नत तकनीक को दिया। कुछ इतिहासकारों ने युद्ध क्षेत्रा में हाथियों की उपादेयता की अविश्वनीयता के उद्धण दिये हैं कि अचानक और अनापेक्षित सेना की खास लड़ाईयों के मैदान मंे उनके नष्ट हो जाने के। हाथियों को जहर दिए जाने के भी उदाहरण हैं। आक्रमक शक्तियां छल-कपट और आतंक से रक्षक जनता को तहस-नहस कर डालते थे। यह भी प्रगट होता है कि भारतीय रक्षण मुख्यतया सेनापति की वीरता एवं उसके जिंदा रहकर लड़ाई में भाग लेते रहने पर आश्रित होता था। एक बार सेनापति पकड़ा या मारा गया तो शेष सेना का मनोबल टूट जाता और वे धराशायी हो जाते। कुछ राजाओं की कहानियां भी हैं जिनमें वे कायर की तरह से मात्रा छोटी-सी पिछाहट या हारने पर भाग निकलते थे बजाय लड़ने के।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color: rgb(153, 51, 153);"&gt;संबंधित लेखः&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;भारत में सामाजिक संबंधों का इतिहास,&lt;br /&gt;पंजाब, गजनी और गौर आक्रमण,&lt;br /&gt;इस्लाम और उपमहाद्वीपः उसके संघात का मूल्यांकन,&lt;br /&gt;मुगलों का उत्थान और पतन,&lt;br /&gt;बौद्ध नीतिशास्त्रा एवं सामाजिक समालोचना,&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3558267468781846487-1353107362286770837?l=itihaasam.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://itihaasam.blogspot.com/feeds/1353107362286770837/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://itihaasam.blogspot.com/2009/01/blog-post_6234.html#comment-form' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3558267468781846487/posts/default/1353107362286770837'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3558267468781846487/posts/default/1353107362286770837'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://itihaasam.blogspot.com/2009/01/blog-post_6234.html' title='सिंध की अरब विजय एवं इस्लामीकरण'/><author><name>अनुनाद सिंह</name><uri>http://www.blogger.com/profile/05634421007709892634</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3558267468781846487.post-741717274231149392</id><published>2009-01-15T05:39:00.000-08:00</published><updated>2009-01-15T05:40:13.293-08:00</updated><title type='text'>व्यापार से उपनिवेशः ईस्ट इंडिया कंपनियों की ऐतिहासिक गतिशीलता</title><content type='html'>दुनिया में, ’’17 वीं शताब्दी के बीच में, योरप के मुकाबले एशिया सबसे अधिक महत्व रखता था।’’ पेरिस में, 1950 में, प्रकाशित जे. पिरेने ने अपनी ’’हिस्ट्र्ी आॅफ दी युनिवर्स’’ में लिखा था।  उसने जोड़ाः ’’एशिया के धनाड्य, योरोपियन राज्यों के धनाड्यों की अपेक्षा अतुलनीयरूप से बड़े थे। जो औद्योगिक तकनीकी कुशलता और परंपरागतता उसने दर्शाई वह योरप के हस्तकौशल के पास नहीं थी। पश्चिमी देशों के व्यापारी द्वारा अपनाये गए आधुनिक तरीकों में ऐसा कुछ भी न था, जिससे एशियायी व्यापार ईर्षा कर सके और कर्ज, धन स्थानांतरण, बीमा, और अनुबंध लेखन के संबंध में योरप से भारत, परशिया,  या चीन कुछ भी सीख पा सके।’’ अगस्ते त्उसेंट की ’’हिस्ट्र्ी आॅफ दी इंडियन ओशन’’ में कहा।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;17 वीं शताब्दी की शुरूआत में, ऐसी स्थिति थी जब ईस्ट इंडिया कंपनी ने अपनी गतिविधियां शुरू की थीं। प्रारंभ में, ब्रिटिश व्यापारी योरोपीय महाद्वीप में सबसे अधिक प्रचलित निर्यात की अपनी वस्तु - ब्राड क्लाथ - के बेचने की आशाओं के साथ भारत आये थे, परंतु उसकी कम मांग देखकर निराश हुए। इसके विपरीत, अपने पोर्तगाली प्रतिद्वन्दी के समान, उन्हें भारत निर्मित अनेक वस्तुएं मिलीं जिन्हें वे अपने देश में अच्छे लाभ पर बेच सकते थे। प्रारंभ के ब्रिटिश व्यापारी दूसरे योरोपियन व्यापारियों और योरप के लिए अनेक व्यापारिक मार्र्गाें की /ईजिप्ट से होकर लाल सागर, ईराक से होकर परशियन गल्फ और अफगानिस्थान, पर्शिया और टर्की होकर उत्तरी मार्ग/ प्रतिस्पद्र्धा की वजह से अपनी शर्तें मनवा लेने की स्थिति में नहीं थे। उन्हें दयार्द्र होकर छूटें मांगना पड़ीं और व्यापारिक शर्तें देना पड़ीं जिनसे कमोवेश स्थानीय व्यापारियों और शासकों को  लाभ हो सके। जबकि औरंगजेब ने बढ़ते हुए योरपीय व्यापारिक छूटों और स्थल व्यापार से घटते हुए राजस्व को शायद भांप लिया और ईस्ट इंडिया कंपनी की गतिविधियों को सीमा और नियंत्राण में रखने की कोशिश की, भारत के सभी राजा उतनी व्यापारिक छूटें देने में संकोच करते थे। साथ में, ईस्ट इंडिया कंपनी छूटों के लिए कटिबद्ध थी और चिरौरी करती रहती थी। उसने भारत के विशाल सामुद्रिक किनारों पर व्यापारिक आधार बनाये।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उस समय, भारत और ब्रिटिशों के बीच सौहार्द्र की कमी न थी और ईस्ट इंडिया कंपनी दोनों देशवासियों को सेवा में रखते थे। दोनों देशों के बीच मित्राता न केवल व्यापारिक संबंधों में बल्कि उससे दूर एक दूसरे के बीच शादी करने तक उत्पन्न हुई। ईस्ट इंडिया कंपनी के कर्मचारी, ब्रिटिश कुलीनता की दमघोटू आडम्बरी से प्रभावित हुए बिना जीवन का बड़ा भाग भारत में, भारतीय ठंडे और आरामदाई कपड़ों को पहिनते हुए, भारत के आमोद प्रमोद का आनंद लेते और अपनी बोली में स्थानीय शब्दों को समाहित करते हुए बिताया करते थे। ये ब्रिटिश व्यापारी भारत में बनी वस्तुओं के आकर्षण और बारीक हस्तशिल्प से गद्गद् हुए और फ्रांस तथा ब्रिटेन में उनकी बढ़ती हुई मांग से लाभ उठाया। व्यापार इतना लाभदाई था कि ईस्ट इंडिया कंपनी समृद्ध हुई।  भारतीय व्यापारी बदले में सोना या चांदी छोड़कर कुछ और स्वीकार नहीं करते थे।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अफ्रीका केप को घेरकर इंग्लेंड पहुंचने के लम्बे रास्ते को देखते हुए यह आश्चर्यजनक था कि ब्रिटिश ने बहुत संपदा अर्जित की थी। परंतु अन्य कारणों ने इस असुविधा को फलांगा। पहला, उन्हें इंग्लेंड में कानूनी एकाधिकार के द्वारा ब्रिटिश बाजार पर महत्वपूर्ण नियंत्राण प्राप्त था। दूसरे, स्त्रोत् पर ही सीधी खरीद के द्वारा योरप को स्थल मार्ग से पहुंचने वाली भारतीय वस्तुओं की बढ़ गई कीमत को वे हरा देने में सक्षम थे। तीसरे, संभवतया, ईस्ट इंडिया कंपनी परिमाण की आधिकता का फायदा उठा पा रहे थे क्योंकि इंडियन ओशन में, उनके जहाज सबसे बड़े होने में से एक थे। साथ ही, अफ्रीका और अमेरिका में भारतीय वस्तुओं के लिए नए बाजार विकसित करने में भी वे समर्थ थे।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;और अंतिम शायद सबसे अधिक महत्वकारी जैसा कि वेरोनिका मर्फी ने ’’योरोपियन्स् एण्ड दी टेक्सटाईल ट्र्ेड’’ /आर्ट आॅफ इंडिया, 1550-1900/ में लिखाः ’’यद्यपि ईस्ट इंडिया कंपनी ने अपने को एटलांटिक पार के दासों के व्यापार से तो नहीं जोड़ा था परंतु उनके सू़़त्रा बड़े लाभदायी और निकटता के थे।’’ वास्तव मंे, 18 वीं शताब्दी में, अन्य योरोपियन शक्तियों के गठजोड़ की अपेक्षा ब्रिटिश एटलांटिक दास व्यापार के दासों का परिवाहन करके प्रभुत्व करते थे। 1853 में, ’’दी स्लेव ट्र्ेड, डोमिस्टिक एण्ड फारेन’’ के लेखक, हेनरी केरे ने लिखाः ’’सर्वाधिक विशाल दास प्रथा को दुनिया ने देखा और जहां भी इंग्लेंड को नियंत्राण मिल सका, उनमें से हरएक देश से स्वतंत्राता धीरे धीरे विलुप्त हो रही है।’’ इसलिए एटलांटिक दास व्यापार ईस्ट इंडिया कंपनियों की आर्थिक शक्ति में महत्वपूर्ण बढ़ोत्तरीकारक है।’’&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;17 वीं शताब्दी के मध्य तक, ईस्ट इंडिया कंपनी भारतीय माल को योरप और उत्तरी अफ्रीका और यहां तक कि टर्की को पुनः निर्यात करने लगी। अनाश्चर्यरूप से आटोमंस, परशियन्स और अफगानीज पर इससे गंभीर और हानिकारक असर पड़ा क्योंकि इन राज्यों के राजस्व का बड़ा भाग भारतीय व्यापार से मिलता था। मुगलों के राजस्व पर भी गंभीररूप से आघात हुआ और उनका व्यापार बहुत कम हो गया था यद्यपि अरब और गुजराती व्यापारियों के कार्यकलाप पूरी तौर पर खत्म नहीं हुए थे परंतु बड़े पैमाने पर निर्विघ्न रूप से एशिया के भीतर तक ही सिमट गये।  मुगल शासन इन विकेंद्रित ताकतों का मुकाबला न कर सका और शीघ्रता से विघटित हो गया। इससे ईस्ट इंडिया कंपनी ने अधिक गंभीररूप से उत्तोलक शक्ति पाई और अपने क्रियाकलापों के प्रसार को बढ़ाने में ढीठ हो गई तथा भारतीय शासकों से बड़ी छूटों की मांग करने लगी।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;परंतु जैसे-जैसे भारतीय शासक अधिक छूट देने लगे, एशिया में सोने और चांदी की हानि के रोने-धोने का समवेत स्वर उठने लगा। 17 वीं शताब्दी के अंत तक, इंग्लेंड और फ्रांस के सिल्क और उन के व्यापारी भारतीय वस्त्रा उद्योग के साथ की प्रतिस्पद्र्धा जो योरप की नवबूर्जुआ समाजों में क्रोध का कारण बन गया था, को सहन करने के लिए तैयार न थे। वे ईस्ट इंडिया कंपनी की व्यापारिक गतिविधियों पर रोक लगाने की मांग करने लगे। उनने न केवल रोक लगाने की मांग की वरन् अपने देशों में इन वस्तुओं की खरीद पर पाबंदी लगाने की मांग की जीत भी पाई। इन पाबंदियों ने जब इन्हीं वस्तुओं की चोरी छिपे खरीद को पूरी तरह खत्म किए बिना, अधिकांश व्यापार को स्थानीय भारतीय राज्यों के राजस्व पर दबाव देते हुए सिमटा दिया और इसके परिणाम भुगतने में बंगाल पहला था।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;भारतीय वस्त्रा उद्योग से लाभ कमाने के अवसर को खोे चुकने के बाद ईस्ट इंडिया कंपनी अपना रवैया बदलने मंे नहीं हिचकिचाई। 1616 में, सर थामस रो, ईस्ट इंडिया कंपनी के उपराजदूत, ने मुगलों को बतलाया था कि युद्ध और व्यापार परस्पर विरोधी थे। परंतु 1669 में, /वस्त्रा उद्योग पर रोक के पहले ही/ बंबई के कारखाने के प्रमुख जेराल्ड अनजीयर ने अपने निदेशिकों को लिखाः ’’हाथों में तलवार के साथ सामान्य व्यापार सम्हालना इस समय की जरूरत है।’’ 1687 में, निदेशिकांे का उत्तर, गोवा के समान, भारत में ब्रिटिश उपनिवेशन की वकालत करते हुए आया। फ्रेंच डूप्लेक्स का भी कमोवेश वही नजरिया था। 1614 की शुरूआत में, डच जाॅन पीटरजोन कोयेन ने अपने निदेशिकों को लिखाः ’’आपकी अभिरक्षा और शस्त्रों के नीचे भारत में व्यापार करना और बनाये रखा जाना चाहिए और व्यापार के लाभांश से शस्त्रों की आपूर्ति की जानी चाहिए जिससे व्यापार के साथ युद्ध या युद्ध के साथ व्यापार किया जा सकेे।’’ अगस्ते टूसेंट की ’’हिस्ट्र्ी आॅफ दी इंडियन ओसन’’।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;18 वीं शताब्दी में, राॅयल ब्रिटिश नेवी ने ईस्ट इंडिया कंपनी के व्यापारिक हितों के लिए अफीम के व्यापार से /जो अंततः अफीम युद्ध की ओर ले गया था/ कमोवेश, मिलकर काम किया एवं युुद्ध और व्यापार के बीच के गठजोड़ का उदाहरण पेश किया। युद्ध और व्यापार के आपस में गुथने से उपनिवेशन केवल एक कदम की दूरी पर रह गया था। भारत-ब्रिटिश संबंधों में नयी गतिशीलता का अशुभ संकेत पलासी था।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उपनिवेश शासन के अनेक समर्थक जो अब भी तर्क करते हैं कि ’’जन्मजात दरारों’’ या शताब्दियों पुरानी ’’खिन्नता’’ या ’’एशियावासियों का दुर्बल चरित्रा’’ या ’’भारतीयों /और दूसरे एशियनों/ की स्वयं पर शासन करने की अयोग्यता’’ भारत की हार के लिए पूरी तौर से जिम्मेवार थी। इस नजरिये से भिन्न, आर. मुखर्जी ने /राईज एण्ड फाॅल आॅफ ईस्ट इंडिया कंपनी/ में दूसरा ही सिद्धांत प्रतिपादित किया। उनने तर्क किया कि मजबूर करने वालीं कुछ आर्थिक अनिवार्यताएं थीं जिन्होंने योरपीय इंडिया कंपनियों को उपनिवेशवाद के रास्ते पर ला दिया। उन्होंने बताया कि यद्यपि इजारेदारी के अधिकार इंडिया कंपनियों को खरीदी और बेचान में निरंकुश सुविधाएं सुनिश्चित करते थे पर इस बात की गारंटी नहीं देते थे कि वे सस्ती दर पर खरीदी कर सकें। सस्ती दर पर खरीदी के लिए राजनीतिक नियंत्राण जरूरी था।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;दूसरा कारण ईस्ट इंडिया कंपनी का था कि उसके लाभ का सीधा मुकाबला अपने ही देशवासी प्रतिद्वंदियों से था। इन परिस्थितियों के तहत जहां तक कि लाभ का उद्देश ही सर्वोपरि था /जोकि था/ , पलासी का युद्ध और अफीम का युद्ध उन स्थितियों की तार्किक उत्पत्तियां थीं जिनमें कानूनी और सम्मानीय साधनों से लाभ बनाये रखना असंभव था। कुछ इतिहासकार मानते हैं कि यदि ईस्ट इंडिया कंपनी ’’जेन्टिलमैन ट्र्ेडर्स’’ के अंतर्गत होती तो भारतीय व्यापार से चाय के लिए अफीम के व्यापार में न बदल पाती, जो आज की भाषा में, निश्चित तौर पर ’’ड्र्ग रनिंग’’ के रूप में ही कही जाती। यदि ईस्ट इंडिया कंपनी के व्यापारी ’’मैन आॅफ आॅनर’’ होते और लाभदायी व्यापार के अधिकार को नकारते तो जैसा कि बहुत लोग व्यापार की दुनिया में करते हैं वे सीधे से दिवालिया हो जाते।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;तो भी जो और भी महत्वकारी है कि यद्यपि ईस्ट इंडिया कंपनी ने पुनः अच्छे पैमाने पर अफीम के व्यापार से लाभ प्राप्त किया था से यह प्रगट नहीं हुआ कि भविष्य में आक्रमक गतिविधियां नहीं होंगी। नरभक्षी शेर के की कहावत सच साबित हुई कि एकबार खून का स्वाद चख, वह बारंबार उसको चखने का आदी बनता है। पलासी के बाद, ईस्ट इंडिया कंपनी भारत में ही अफीम की पर्याप्त मात्रा में पैदावार करवाने के लिए मजबूर करने की स्थिति में पहुंच गई और जिससे ब्रिटिश बाजार के लिए बड़े पैमाने पर लाभ पाते हुए पर्याप्त मात्रा में चाय प्राप्त की जा सके। इससे लगे, अब, अंतर एशियन व्यापार में लगे भारतीय जहाजों /और दूसरे एशियन भी/ पर सैनिक आक्रमणों को मोड़ा जाये। ये आक्रमण मराठा और कोरामंडल जिनके राजस्व इन व्यापार से कम हो रहे थे, के विरूद्ध आधारशिला बन रहे थे। जबकि ईस्ट इंडिया कंपनी को पलासी ’’जीवित’’ रह पा सकने की बात रही हो, बाद की लड़ाईंयां उस श्रेणी की नहीं थीं। कुछ इतिहासकार बतलाने की कोशिश करते हैं कि फ्रेंच के साथ की प्रतिस्पद्र्धा ने दक्षिण भारत में युद्ध करवाये, किन्तु इस प्रकार के नजरिये को फ्रांस के ही एक व्यक्ति ने नकारा।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;’’लेस ट्र्ीयोस एजेज डेस कालोनीज्, पेरिस, 1902’’ के लेखक एब्बी डी. प्राॅट ने लिखा कि पलासी की जीत और संप्रभुता संपन्न अधिकारों की स्थापना के बाद इंग्लेंड ने समूचे योरप को बतला दिया कि भारत को ’’नई दुनिया’’ से प्राप्त कीमती ’’धातु मुद्रा’’ भेजना जरूरी नहीं रह गया। वह वस्तुओं और आवाम से प्राप्त करों के राजस्व से व्यापार कर सकता है, जबकि योरोपीय अन्य देश ’’धातु मुद्रा’’ के चुकारे पर ही व्यापार कर पाते थे। भारत मेें अंग्रेजी संप्रभुता के प्रसार सेे भारत को धन भेजने से योरप को मुक्ति हो सकेगी। एब्बी डी. प्राॅट ने विशेषकर लिखाः ’’लोग जिनको भारत पर पर्याप्त नियंत्राण प्राप्त है एशिया को योरपीय धातु मुद्रा के निर्यात को मूलरूप से कम करने, अपने लाभ के साथ साथ योरप के लाभ के लिए भी शासन करते हैं, उनका साम्राज्य खास के बजाय अधिक सामान्य है, अधिक योरोपियन है अपेक्षाकृत ब्रिटिश के; जैसे वह फैलता वैसे योरप को लाभ मिलता है और प्रत्येक विजय से उन्हें वास्तविक जीत हासिल होती है।’’ ब्रिटिश जीत के विरोधियों की भर्तस्ना करते हुए वह लिखता है, भारत में इंग्लेंड के आधिपत्य के बारे में योरप के चारों ओर की गुस्सा और चिल्लाहटें अंधे के सन्निपात की चीत्कारें की तरह हैं, यह सोचा जाता है कि एशिया से जो भी जीता जाता है वह योरोपियन के हक में से इंग्लेंड ले रहा था जबकि इसके विपरीत, एशिया का वह हिस्सा जो उसने अपने लिए लिया है, तथ्यात्मक रूप से, योरप के लिए लिया है।’’&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;वास्तव में, बाद के अनेक विश्लेषिकांे के नजरिये से यह पूरी तरह से मेल खाता है कि अब 17 वीं शताब्दी की तुलना में 18 वीं शताब्दी में, योरप के आपसी झगड़े एवं प्रतिस्पर्धायें कम हुईं और पलासी के बाद तो और भी कम हुईं। सार में, भारत-उपनिवेशन की दौड़ ब्रिटिश के द्वारा जीती गई और एब्बी डी. प्राॅट सच कह रहा था कि इस जीत के ’’सामान्य’’ लाभ फ्रांस के हित में थे मुकाबले ब्रिटिश विजय से ’’खास’’ लाभ की हानि के विलाप के।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;एन. के. सिन्हा, ’’इकोनोमिक हिस्ट्र्ी आॅफ बंगाल’’ के लेखक इन शब्दों में संक्षेप करते हैंः ’’दो शताब्दियों से अधिक तक योरोपियन ने पाया कि गैर कानूनी ढ़ंग, व्यक्तिगत स्वतंत्रा व्यापारियों या कंपनियों द्वारा बंगाल में किया गया व्यापार बंगाल के  हित में होता और चुकारे नगद में ही किए जातेे। अब पलासी के बाद, ’’स्वतंत्रा व्यापारिक साधनों’’ द्वारा माल की आपूर्तियां बंगाल में ही मिलने लगीं’’। बंगाल की जनता से ईस्ट इंडिया कंपनी द्वारा जबरिया करों के संदर्भ में।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;वह आगे बताते हंैः ’’देश के व्यापारी का कारोबार रुकना शुरू हो गया। अरमेनियन, मुगल, गुजराती, और बंगाली व्यापारी पाते कि उनका स्वतंत्रा कारोबार बधित और बोझिल बनाया जाता था।’’ भारतीय स्वतंत्रा व्यापारियों के हाथों से वस्तुओं का निर्माण, आयात और निर्यात निकलकर ईस्ट इंडिया कंपनी किराये पर लिए दलालों के पास जा रहा था। बहुधा इसको सेना की आवश्यकता होती। ईस्ट इंडिया कंपनी के भारतीय प्रतिद्वंदियों के कारखानों को नष्ट करने के लिए कंपनी के सिपाही भेजे जाते। स्वतंत्रा बुनकर जो ईस्ट इंडिया कंपनी द्वारा बेहद कम मजदूरी पर काम करने से इंकार करते उनके अंगूठे काटे जाते। पलासी के बाद आंतरिक स्थल मार्ग के व्यापार पर ईस्ट इंडिया कंपनी ने बढ़कर अपनी निरंकुशता थोपी। पलासी के तीन दशाब्दियों के बाद ईस्ट इंडिया कंपनी ने भारत के आर्थिक और राजनीतिक जीवन पर वास्तविक दमघोंटू पकड़ प्राप्त कर ली गयी थी।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जैसी कि एब्बी डी. प्राॅट ने भविष्यवाणी की थी उपनिवेश के लाभ केवल ब्रिटिशों को नहीं मिले। ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी द्वारा स्थापित व्यापारिक एकछत्राता के लाभ को फ्रंेच, डच और डेनिश प्रतिद्वंदी भी पाने लगे। भारतीय व्यापारियों के समाप्त होने से वे कम मूल्य पर भारतीय वस्तु पाने लगे। दूसरे, ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी के भ्रष्ट स्थानीय कर्मचारी ठगी, धोखाधड़ी और गंभीररूप से कीमतों में कटौतियां करने में लिप्त रहते थे। भारत से इस प्रकार की गैर-कानूनीरूप से अर्जित धन को  करों तथा ब्रिटेन में आयात शुल्क से बचाने के लिए, वे फ्रेंच और डच प्रतिद्वंदियों के माध्यम से स्वदेश भेजना पसंद करते थे। ब्रिटिश ईस्ट इंडिया के भारतीय प्रतिद्वंदी खत्म हो गए और योरोपियन  30 से 40 वर्षों तक फलते फूलते रहे।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अमेरिकन फरबर, जिसने 1948 में /केम्ब्रिज मास/ ईस्ट इंडिया कंपनी पर अपने शोध को प्रकाशित किया में बतलाया है कि 1769 और 1798 तक फ्रेंच और डच प्रतिद्वंदी क्रियाशील रहे थे। वह यह भी बतलाता है कि वह सच्चा बहुउद्देशीय गठबंधन था। कम से कम उसकी नाममात्रा की पूंजी का 1/5 वाॅ भाग /3,200,00 पाउंड/ डच हाथों में था और उस पूंजी का बड़ा भाग आर्मस्टरडम, पेरिस, कोपनहेगन और लिस्बन के धनाढय्ों से आया था। वेे कंपनी के कार्यकलापों से सीधा संबंध भी रखते थे। फरबर ने इस बात को देखा कि फ्रेंच, डच और डेनिस की व्यापारिक गतिविधियां 18 वीं शताब्दी में, इंडियन ओशन में साफ तौर पर प्रगट करतीं थीं किः ’’समय आ गया कि अब भारत में ब्रिटिश राज्य के बनने के काम में भाग लेने के लिए देश या समुद्र के सब योरोपियन भारतीय प्रायद्वीप के किसी भी भाग पर अपनी शक्ति बनाये रखने की बाजी चलने के लिए बाध्य थे।’’ फरबर जो बात बताना चाहता था वह न केवल मुख्यतया ईस्ट इंडिया कंपनी और अंतरदेशीय स्वभाव की थी बल्कि उसके पीछे वालों के सीधे स्वार्थ और प्रयोजन की भी थी।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इस प्रकार से पलासी अनेक आक्रमणों में से एक था जिसका किसी भारतीय शक्ति ने सफलतापूर्वक बचाव नहीं किया। जबकि संगठित भारत योरोपियन को बड़े तौर पर रोक सका और विभाजित भारत अस्थाई तौर पर विभाजित योरप को रोक सका पर विभाजित भारत का तो संगठित योरप से कोई मुकाबला न था। 1818 में मराठों की निर्णायक पराजय में 1848 में सिखों की और 1856 में, अवध के संलग्न करने से भारत पर विजय अभियान जारी रहा। 1857 में, ईस्ट इंडिया कंपनी की जीतों को पीछे छोड़ देने का एक वीरतापूर्ण प्रयत्न था, परंतु उसके बदले, अब, उसने ब्रिटिश राजशाही की सरकार की संपूर्ण शक्ति को ही ला दिया। ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी की कालोनियां ब्रिटिश उपनिवेशिक-भारत बना और इस तरह उपमहाद्वीप में उपनिवेशिक लूटपाट का नया युग शुरू हुआ। एक ऐसा युग जिसने ब्रिटिश नेतृत्व को सदा चुनौतियां देते देखा परंतु 1947 तक वैसा न था कि नया युग उभरकर आ सके।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इस तरह से लगभग 200 वर्षों तक भारत से योरप को धन संपदा का सुचारूरूप से स्थानांतरण हुआ। यद्यपि शुरूआती लाभग्राही ब्रिटिश रहा हो, योरप के उसके सहभागी और नई दुनिया कम लाभांतित नहीं हुई। ब्रिटिश बैंक भारतीय पूंजी का उपयोग युनाईटेड स्टेटस्, जर्मनी और योरप में कहीं भी उद्योगों में निवेश करने में करते रहे।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आधुनिक पूंजीवाद का उत्थान और औद्योगिक क्रांति, भारत और दुनिया के अन्य हिस्सों पर आधारित थी। यह उपनिवेशित दुनिया का जबरिया दोहन था जिसने ब्रिटेन या युनाईटेड स्टेटस् को ’’आधुनिक’’ और ’’औद्योगिक’’ बनाया। आधुनिक पूंजीवाद के विश्लेषण में इस बात को गंभीरता से आंका-परखा जाना चाहिए।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3558267468781846487-741717274231149392?l=itihaasam.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://itihaasam.blogspot.com/feeds/741717274231149392/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://itihaasam.blogspot.com/2009/01/blog-post_6170.html#comment-form' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3558267468781846487/posts/default/741717274231149392'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3558267468781846487/posts/default/741717274231149392'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://itihaasam.blogspot.com/2009/01/blog-post_6170.html' title='व्यापार से उपनिवेशः ईस्ट इंडिया कंपनियों की ऐतिहासिक गतिशीलता'/><author><name>अनुनाद सिंह</name><uri>http://www.blogger.com/profile/05634421007709892634</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3558267468781846487.post-8542708017707837671</id><published>2009-01-15T05:38:00.000-08:00</published><updated>2009-01-15T05:39:16.543-08:00</updated><title type='text'>मुगलों का उत्थान और पतन</title><content type='html'>इतिहास के किसी भी काल ने इतना अधिक ध्यान नहीं खींचा जितना कि भारत में मुगल शासनकाल ने परंतु उस काल की   अध्ययनशील खोज नहीं की गई। भारत और पश्चिम के अनेक इतिहासकारों ने मुगलों के शासनकाल पर भारतीय इतिहास के अन्य कालों की उपेक्षा और बहिष्कार होने की हद तक ध्यान केंद्रीभूत किया। दूसरे राजवंशों के शासन की गहरी छानबीन, फिर चाहे वे मुगलों के आधीन रहे हों -जैसे कि राजपूत और बुंदेलखंडी या उनके पश्चात्वर्ती -जैसे कि परमार, काकतिया, सारकी या तामिलनाडू के पांडया ने बामुश्किल प्रभावशाली इतिहासकारों का ध्यान अपनी ओर खींचा। बहुधा भारतीय इतिहास में उनकी भूमिका और योगदान को मुगलों के बाहरी किनारों पर गौण तथा भारतीय सभ्यता में हाशिया समान माना गया।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पत्राकार, कलामर्मज्ञ और इतिहासकार पक्षपातों से पीड़ित रहे और सम्मानित कला समालोचक तथा समाज विज्ञानियों ने मुगलों के पतोन्मुखी गिरावट से उभरी भारतीय सल्तनतों के बारे में बिलकुल उदासीनतापूर्वक लिखा।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जबकि ताजमहल समेत अन्य स्मारकों का प्रेम और मुगल पुरावशेषों की उत्कृष्टता मुगल राजदरबारों के प्रति भारतीय और पश्चिमी विद्वानों के खास ध्यान को न्यायोचित ठहरायेगी, इस बात को नकारा नहीं जा सकता कि यह रुचि औपनिवेशिक उत्प्रेरिक पक्षपातों की ही प्रतिध्वनि थी जिसने भारतीय इतिहास की पूर्वाग्रही व्याख्या की। सबसे ताकतवर शासकों के परिप्रेक्ष्य से ही इसने इतिहास को देखने की वृति को उत्प्रेरित किया बजाय आम जनता या मध्यमवर्गीय श्रेणियों के परिदृश्य से देखने के।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मुगलों के विदेशी होने और उनकी भारतीयता पर हाल के वर्षों में गरमागरम बहसें हुईं हैं। मुगलों के इतिहास का एक पक्ष जो विद्वानों के ध्यान से बचा रह गया था वह था उनका विस्तारवादी सैन्यवाद का पक्ष जो जहांगीर को छोड़कर औरंगजेब तक वास्तव में, प्रत्येक मुगल शासक का रहा था। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यद्यपि युद्ध-कार्य मुगलों का कोई अद्वितीय काम नहीं था तथापि मुगल सैन्य-निर्णयों की केंद्रीयता और प्रशासन दोनों, श्रेष्ठ थे। सैन्य-कार्यों की बारंबारिता, उनके पैमाने और गहनता में दिल्ली की सल्तनत के अधिकांश मुगलों में एक सदृश्यता थी  अपेक्षाकृत अन्य शासकों के।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यह नहीं कहा जा रहा है कि उनमें कोई विशिष्ठतायें नहीं थीं। पूर्ववर्ती आक्रमणकारियों के विपरीत मुगल विदेशी भूमि में होने के प्रति कुछ ज्यादा ही सचेत थे और बाबर ने अपने संस्मरणों में बहुत समझकर कहा था धर्मनिरपेक्ष नीति लागू करने की आवश्यकता के संबंध में, खासकर एक ऐसे देश में जो गैर-इस्लामिक था। विदेशी भूमि में विधि सम्मतता और राजनैतिक समर्थकों की आवश्यकता के संबंध में भी मुगल अधिक जागरूक और सचेत थे।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जीवन की संुदर वस्तुओं के प्रति उनकी रुचियां, उनके मनमोहक पुरावशेष और मनोरंजनात्मक एवं सांस्कृतिक कार्यकलाप उनको दूसरों से अलग करते थे। वे युद्ध करने में पारंगत तो थे पर कुछ अन्य कामों में नहीं। परंतु यह ध्यान में रखना चाहिए कि अकबर और औरंगजेब के शासनकाल अपनी राजनैतिक और सैन्य-नीतियों को लागू करने में कठोर और कभी-कभी निर्दयी थे।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उनकी योजनायें उनकी नीतियों के अनेक पक्ष उजागर करते हैंे। खास सैन्य-योजनाओं के लिए राजधानियों को सुयोग्य केंद्रों में बारंबार ले जाया गया था। मुगलों के युद्ध-कार्यकलापों में योगदान देने के लिए राजपूत राजाओं के साथ मैत्रियां उनकी सामथ्र्य के आधार पर की गईं थीं। युद्ध-हथियारों के विकास के लिए राजकीय निवेश किए गए जिससे मुगलों की सैन्य-तकनीक की धार पैनी बनी रहे। हर मुगल राजकुमार को युद्ध कौशल में न केवल प्रारंभिक प्रशिक्षण से वरन् वास्तविक लड़ाईयों में भाग लेकर अनुभव से लैस किया जाता था। युद्ध का संस्कार इतना उपर तक उठा था कि उसने उत्तराधिकार की लड़ाई में भाई को भाई के विरुद्ध तक लड़ाया।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;युद्ध-कलापों की केंद्रीयता राजदरबार के इतिहास और शाहजहां एवं युवा औरंगजेब के बीच के पत्राचार से उभरे जहां युद्ध गतिविधियों के अलावा अन्य किसी विषय पर लगभग कोई बात नहीं होती थी। अकबर के शासनकाल में युद्ध चित्रा और युद्ध गौरव के अंकन लघुचित्रों के सामान्य विषय हुआ करते थे।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मुगलों का सैन्य चरित्रा पूरी तौर से अनापेक्षित नहीं था क्योंकि यदि वे युद्ध में इतने भींगे न होते तो उत्तरी भारत की विजय की कोशिश कभी नहीं करते और सर्वप्रथम, भारतीय उपमहाद्वीप के शेष भाग नियंत्राण का विस्तार भी न कर पाते।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मुगल घुमंतु-युद्ध-विद्या में ज्यादा ही पारंगत थे जो समय-समय पर घास के मैदानों से मध्य एशिया के रेगिस्तानों तक छा जाया करते थे। स्थापित कृषक सभ्यताओं पर धावा बोलते, उन्हें लूटते और उनको जीतने में सफल होते थे। न केवल भारत चीन, पूर्वी यूरोप और मध्यपूर्व के उपजाउ अर्धचंद्राहार-इलाकों ने ऐसे धावों एवं आक्रमणों को सहा था। चंूकि घुमंतु-कुलीन भूमिहीन थे परंतु धन-संपदा के लिए कृषकवर्ग को ही निचोड़ा करते थे। घुमंतुओं की आय के प्रमुख साधन थेः स्थापित सभ्यताओं पर धावे या उनकी लूट या व्यापारिक कारवों पर कराधान। दासों का व्यापार भी आय का स्त्रोत् था। युद्ध में परिपक्व योद्धा बहुधा उन्नत सभ्यताओं की सेनाओं पर बड़ी आसानी से जीत हासिल कर लेते थे क्यांेकि उन पर अचानक धावा बोला जाता और सेनाओं में आक्रमण के आतंकवादी तरीकों के मुकाबले का अनुभव नहीं होता था।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;समय बीतने पर, स्थापित सभ्यताओं में दोनों पक्षों की दीर्घकालिक लड़ाईयों की लागत ने और उपजाउ भूमि और नागरी बसाहटों के विनाश ने युद्धों के प्रति स्वाभाविक प्रतिरोध पैदा किया। यदि प्रतिद्वंदी मोटे तौर पर समान बलशाली हांे, तो निर्णयकारी विजयें असंभव होती थीं और यदि एक ही पक्ष अंतिमरूप से बच रह जाता तो जीत की लागत बहुत उंची हो जाती। / कलिंग की लड़ाईयों में अशोक का बौद्धधर्म परिवर्तन जीवन के विनाश का ही परिणाम था।/&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;भारत में इसने जैनों और बौद्धों को युद्ध विरोधी बनाया तथा भक्ति-धाराओं के विभिन्न अनुयायियों को भी युद्ध विरोधी बनाया और उन्होंने कृषकों को अपनी ओर आकर्षित किया। यहां तक कि कौटल्य जो युद्ध का परहेजी नहीं था ने ’’अर्थशास्त्रा’’ में युद्धकाल में राजाओं को सावधान रहने और दूर दृष्टि रखने की सलाह दी थी। जब भी जीत की संभावना कम हो राजाओं को   शांति स्थापित करने के लिए राजनैतिक संधियां करने की सलाह दी और जब राजनैतिक प्रयासों से युद्ध न टाला जा सके, तब भी, इन संधियों से युद्ध की पुनरावृति और लम्बाई तो कम होती ही थी। चूंकि कृषि कर ही दोनों युद्धरत पक्षों की आय का मूल स्त्रोत् होता था, यह दोनों पक्षों के लिए लाभदाई होता कि युद्ध में उदारता और सदाचरण का पालन करें जिससे नागरिक मृत्यु रुकेगी और कृषि भूमि की कछवारी और सिंचाई व्यवस्था का विनाश भी टाला जा सकेगा।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जब अरब शत्राुओं ने सिंध पर आक्रमण किया और वहां की सिंचाई व्यवस्था नष्ट की तो आम जनता हकबका गई। उदारता और सदाचरण के कानून इस उपमहाद्वीप में सामान्य बात थे परंतु आक्रमणकारियों को तो इनका कोई मूल्य ही न था। वे तो किसी तरह से विजय हासिल करना चाहते थे। भारतीय उपमहाद्वीप में मुगलों के आने पर उत्तरी भारत में हिंदू राजाओं का शासन समाप्त हो गया था। इस्लामी शासक नये आक्रांताओं के आक्रमणों को रोकने में समर्थ नहीं थे। एक बार विजयी हुआ कोई भी इस्लामी विजेता स्थाई राजवंश की स्थापना करने में सफल नहीं हो रहा था। नये-नये आक्रमणकारी आते रहे और पहले के राजा को हराते रहे। उनमें से अनेक स्थानीय जनसाधारण की घृणा के पात्रा रहे। स्थानीय जनता के सहयोग के बिना कोई भी शासक छोटे से छोटा राज्य स्थापित नहीं कर सकता था।&lt;br /&gt;लोधियों पर बाबर की प्रारंभिक विजय कोई विशेष घटना नहीं थी। स्थानीय मुगल प्रशासक के पुत्रा नारनौल, में जन्मे शेरशाह सूरी के हाथों हुमांयु की हार अधिक दूरगामी घटना थी। भारत में जन्मा और पला शेरशाह सूरी भारतीय परिस्थितियों से ज्यादा परिचित था और स्पष्ट तौर पर जानता था कि हुमांयु का सत्ता पर अधिकार बुरी तरह से हलका होगा। दूसरे, मुगलों के खोखले समर्थन को भांपते हुए उसने मुगलों के प्रसार को रोकने और पंजाब एवं गंगा के मैदानों के एकीकरण करने में सफलता पाई। ग्रेंड टं्र्क रोड बनाने और विशेष वस्तुओं के उत्पादक नगरों को स्थापित करने से व्यापार और उद्योगों में विस्तार हुआ। प्रशासनिक बदलाव और सामाजिक सुधार जिन्होंने स्थाई कर-आधार बनाने में मदद की, से राज्य में थोड़ी विधिवतता आई। जब हुमांयु दिल्ली की राजगद्दी पर वापिस बैठा तब उसको इस प्रकार से संभाव्य बड़े और समृद्ध साम्राज्य की आधारशिलायें विरासित स्वरूप मिली थीं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अकबर के राज्य में /और ज्यादा दूर तक जहांगीर के राज्य में/ अनेक धर्मशालाओं और अस्पतालों के निर्माण से व्यापार की गतिविधियां ग्रेंड टं्र्क रोड के किनारे-किनारे अधिक विकसित हुईं, खासकर पंजाब में। राज्याधीन कारखानों की स्थापना की गई जिससे राजदरबार और निर्यात के लिए उंच्च गुणवत्ता की वस्तुओं का निर्माण किया जा सके। व्यापार और कृषि दोनों की आय से मुगल राजकोष भरा हुआ था और उसका व्यय युद्ध-कार्यकलापों पर किया जाता था जिन्होंने पूर्व में आसाम और दक्षिण में दक्खिन के पठारों तक मुगलों को पहुंचा दिया था। ये आक्रमण बड़े तौर पर राजपूत और बुंदेलखंड की सेनाओं के सहयोग पर आश्रित होते थे जिन्हें प्रोत्साहनों और राजनैतिक बल प्रयोग से जीता जाता था।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;गंगा के मैदानी इलाकों से भारी कृषि-कर-आय ने अकबर को सबसे अधिक शक्तिशाली राजपूत राजाओं /जैसे जयपुर और बीकानेर/ को वहां के कर-अधिकार अनुदान में देने में समर्थ बनाया था। वैवाहिक रिस्तों ने आपसी संबंधों को और मजबूत बनाया। मुगलों की कुछ निर्णयक विजयें जयपुर के राजा मानसिंह के नेतृत्व में हुईं थीं। अन्य विजयें मुगलों की हिस्सेदारी  को असमान शर्तों और सैन्य धमकियों को स्वीकार करने तथा कुलीन वंशजों को दिल्ली में बंधक रखकर जबरिया प्राप्त हुईं थीं। पहाड़ के राजपूतों एवं दतिया, झांसी और ओरछा के राज्यों को राजकर के साथ-साथ सैन्य अभियानों के लिए मुगलों को सैनिक मुहैया कराना पड़ते थे। जो इन जबरिया भागीदारियों का विरोध करते थे /जैसे ग्वालियर/ उनको सजा दी जाती  जिससे दूसरों को नसीहत मिल सके कि विद्रोह करने से उनका क्या हश्र होगा।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इस ढंग से ही मुगलों ने भारतीय उपमहाद्वीप, दक्षिण को छोड़कर, की लगभग पूरी लम्बाई और चैड़ाई में साम्राज्य का विस्तार किया। परंतु सैन्य सफलता से स्थाईत्व और जनस्वीकारितता की निश्चिंतता नहीं मिल पाती थी। प्रारंभ में कृषि और व्यापार से कर की आय युद्ध-व्यय और स्थानीय एवं विदेशी विलासिता की वस्तुओं के खर्चों से अधिक होती थी परंतु औरंगजेब के गद्दी पर बैठने तक मुगल खजाना लगभग रिक्त हो चला था।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;भारतीय उपमहाद्वीप में प्रारंभ के इस्लामी आक्रमणकारियों ने मंदिरों की संपदा एवं रत्न-आभूषणों की लूट और जनता की  बचतों की डकैतियों के द्वारा आकूत संपदा इक्ट्ठा की थी। आक्रमणकारी सैनाओं के द्वारा पकड़े गए सैनिका एवं नागरिक को दास बनाकर बेचने से भारी लाभ प्राप्त होता था। जो भी हो जब तक भारतीय परिदृश्य पर मुगल आये मंदिरों में संचित समूची संपदा लुट चुकी थी और युद्ध द्वारा बनाये गए दासों के विरोध में भी काफी प्रतिरोध होने लगा था। परिणामस्वरूप मुगलों को इन क्षेत्रों से धन-संपदा की प्राप्ति नहीं हो पा रही थी और उनको अब मुख्यतया कृषि-कर पर निर्भर रहना पड़ता था। व्यापार पर भारी कर नहीं था क्योंकि पूर्ववर्तियों की तरह अपनी वैधता के लिए उन्हें व्यापारवर्ग के समर्थन पर आश्रित होना पड़ता था। मुगलशासन में कृषि कर की दरें सबसे उंची रहीं और बाद में केवल ब्रिटिश उपनिवेशनकारियों द्वारा लांघी गई थीं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इसने मुगल सीमाओं के बड़े हिस्सों में विद्रोहों को स्वाभाविक रूप से पैदा किया। पहाड़ी एवं मेवाड़ी राजपूत और मध्य भारत के राजाओं ने नजराना देना बंद कर दिया और स्थानीय कुलीन भी दिल्ली को कर भेजने में आनाकानी करने लगे। अनेक स्थानीय अधिकारी मुगलों के राजदरबारों के लिए विलासता के तौर तरीकों पर राज्य-धन खर्च करते और दिल्ली के प्रशासकों को घूस देकर बच निकलते थे। शाहजहां के शासनकाल में एक नई समस्या पैदा हो गई थी। यद्यपि भारतीय उत्पाद और निर्यात की मांग अभूतपूर्व स्तर तक उंची हुई परंतु मुगलों के राजकोष में बहुत ही थोड़ी संपदा पहुंची क्योंकि व्यापारियों ने लाभ का बड़ा भाग भारत के बाहर रखना शुरू कर दिया था। भारत के निर्यात व्यापार को नियंत्रित करने के लिए अनेक बार असफल सैन्य कार्यवाहियां की गईं परंतु ये कार्यवाहियां मात्रा शून्य साबित हुईं। उस समय शाहजहां को विशाल इमारतों के निर्माण और विलासता की आयातित वस्तुओं की भूख बनी रही।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मुगलशासन के दिवालिया होने के डर से औरंगजेब ने अपने पिता के विरुद्ध राज्य तख्ता पलटा और व्यर्थ के खर्चों को समाप्त किया। परंतु कीमती उपहार और कर अधिकारों को धीरे-धीरे बांटने की क्षमता के बिना औरंगजेब रूढ़िगत धर्म और मुल्लाओं पर शाहजहां के शासन में शुरू की गई प्रथा के समान, अपने शासन की वैधानिकता के लिए विश्वास करता रहा। परंतु मुगलों की घटती जा रही साख के लिए यह मुश्किल उपाय रहा। यद्यपि औरंगजेब ने बाह्य रूप से अभेद्यता को बनाये रखा परंतु वास्तव में, मुगल साम्राज्य बड़ी कठिन दशा में था। औरंगजेब की मृत्यु के पश्चात् केंद्रीभूत शक्तियां नियंत्राण के बाहर हो गईं और मुगलों के हाथ में दिल्ली के आस-पास के कुछ मैदान मात्रा ही बचे रह गए थे।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मुगलों की राज्य सीमाओं में उंचे करों के बोझ से किसानवर्ग अक्रोशित होता जा रहा था। पंजाब में किसान और कारीगरों में गुरू गोविंदसिंह के प्रभाव से क्रांतिकारी परिवर्तन पैदा हुए जिन्होंने महिलाओं को धर्म और युद्ध दोनों क्षेत्रों में समान भागीदारी के लिए प्रोत्साहित किया। हरियाणा में जाट और यादव सहयोगियों ने अपनी स्वतंत्राता घोषित कर दी। मराठवाड़ा प्रदेश में बहुजातीय मैत्राी ब्राहमण, क्षत्रिय, कृषक एवं कारीगरों के स्वयंसेविकों ने बिखरे हुए मुस्लिमों के साथ मराठों के विद्रोह में साथ दिया। अफगानिस्तान और कश्मीर, अवध और बंगाल के इलाकों में स्थानीय प्रशासकों ने भी स्वतंत्राता की घोषणा कर दी। पहाड़ी राजपूतों, बंुदेलखंडियों और जबलपुर-नागपुर पट्टी के आदिवासियों के मूल के शासकों ने मुगलों को नजराना देना बंद कर दिया था।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कुछ इतिहासकारों ने औरंगजेब की धार्मिक कट्टरता की तुलना अकबर की धार्मिक उदारता से करते हुए जिसने वास्तुशिल्पी नवीनताओं और सांस्कृतिक समन्वयता को बढ़ावा दिया था, मुगल पतन का दोषारोपण औरंगजेब के उत्साह को माना था। अकबर के राजदरबार में पैदा हुई समन्वयवादी रिवाज फतेहपुर सीकरी के नमूनेदार सम्मिश्रण की ओर इशारा करते हैं और यह भी बताते हैं कि कैसे कुछ हिंदुओं ने उसके प्रशासन में महत्वपूर्ण योगदान दिया था।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कुछ विद्रोहों के तात्कालिक कारण औरंगजेब की साम्प्रदायिक पैगम्बरी वृत्तियां रही हों परंतु उन्हें मुगल साम्राज्य के पतन का एक मात्रा कारण नहीं माना जाना चाहिए। चुनौतियां तो अकबर की सैन्य सफलताओं के एकदम बाद ही शुरू हो गईं थीं।  यद्यपि औरंगजेब को इस्लामी रूढ़िवादिता के साथ जोड़ा जाता था परंतु औरंगजेब के राजदरबार में अकबर के राजदरबार की अपेक्षा हिंदुओं की नौकरियां अधिक संख्या में थीं। अपने पूर्ववर्तियों की तरह औरंगजेब ने हिंदू राजाओं के साथ मैत्राी जारी रखी परंतु उनके साथ वैवाहिक संबंधों को त्याग दिया था। बिना वैवाहिक बंधन के तथा कर-आधार जो कमजोर होता जा रहा था, मुगल लड़ाईयों में राजपूतों के लड़ने की उत्कंठा खत्म हो रही थी और बलप्रयोग कम असरकारक होता जा रहा था।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;तब भी, अनेक मूलभूत कारक भी थे। किसानों पर अत्याधिक करों की दर और दूसरा महत्वपूर्ण कारण सिंध, पंजाब, कश्मीर और यमुना-गंगा के मैदानों में मुगलशासन के सकारात्मक योगदान का अभाव मुगलशक्ति के बिखराव का कारण था।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इसलिए यह विचित्रा है कि कैसे आधुनिक भारत में आर्थिक और राजनैतिक विकेंद्रीकरण के कुछ चहेतों ने मुगल साम्राज्य की एकीकृतता  का प्रसन्नतापूर्वक समर्थन किया, मानों केंद्रीयकरण अपने आप में कोई ध्येय हो। यह ध्यातव है कि भारत का एकीकरण  अकबर ने अधिकांशतया युद्ध और बल प्रयोग के द्वारा प्राप्त किया था और महत्वपूर्ण यह है कि इस केंद्रीयकरण के लाभ समूचे साम्राज्य को नहीं मिलते थे। कुछ राज्य राजकर देते थे परंतु बदले में वास्तविक लाभ प्राप्त नहीं करते थे। खासकर गुजरात, छत्तीसगढ़, नागपुर और विदर्भ, पूर्वी मध्य प्रदेश, झारखंड और बिहार के अधिकांश प्रदेशों में निवेश का अभाव रहा और उनमें यथा स्थिति बनी रही या घटाव होता रहा।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;दुनिया से जोड़ने वाले मुख्य व्यापारिक मार्गों को छोड़कर, मुगलराज्य ने उत्तरी भारत मंे न तो कृषि संबंधी विस्तार और न ही व्यापार को प्रोत्साहन देने के लिए निर्माण या संरचनाओं पर निवेश किया। मुगल उत्पादक नगरों की बड़ी संख्या यमुना और गंगा के मैदानों में या सिंधु के किनारों पर थी और यह कोई मात्रा संयोग नहीं था कि मुगल साम्राज्य की विधिवत्ता मूलरूप से इन्हीं इलाकों में जीवित रही थी।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इतिहासकारों ने प्रशंसा से अकबर की धर्मनिरपेक्षता  और समतावादिता  के बारे में लिखा और अकबर एवं औरंगजेब के बीच के अंतर को बारीकी से बताया परंतु खास नुक्ते तो छोड़ दिये। इस बात को स्पष्ट किया जाना चाहिए कि यद्यपि अधिकांश मुगल जानबूझकर धर्मनिरपेक्ष  थे, उनके शासनकाल में कभी भी हिंदू और मुसलमानों की जनसंख्या के अनुपात में प्रशासनिक पदों को आबंटित नहीं किया गया। मुसलमानों ने हमेशा अधिक प्रतिनिधित्व पाया और शुरूआत के मुगलों का झुकाव कलाओं और संगीत के साथ-साथ मध्य एशिया, परशिया और चीनी रस्म-रिवाजों की ओर ही रहा। बाबर के जमाने के लघुचित्रा संपूर्ण रूप से बुखारा रिवाजों के थे जबकि अकबर के शासनकाल में परशियन और पश्चिम की नकलें ख्यात् हुईं थीं। केवल जहांगीर के काल में बिखराव और असामान्य गुण छोड़कर स्पष्ट और सुसंगत शैली विकास हुआ था।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;राजपूत मां का पुत्रा जहांगीर राजपूत रिवाजों से प्रभावित था और कुशल हिंदू कारीगरों को इनाम देता था तथा उन्हें राजदरबार में मुख्य पदों पर रखता था। आकृति, ललितकलाओं और हस्तकौशल की गुणवत्ता में बारीक परख की योग्यता रखने के कारण उसने बिना भेदभाव गुणियों को प्रोत्साहित किया। उसे स्थानीय रीतिरिवाजों और अपने पिता के समान दर्शनशास्त्रा में रुचि थी। दाराशिकोह और शाहजहां के साथ तो दरबारी मजाकों का जुड़ाव था परंतु वहां औपचारिकता की वृत्ति के कारण मुगल रीतिरिवाजों में राजपूत एवं बुंदेलखंड के राजाओं के ढंग और जनसामान्य एवं लोक प्रभावों को आने से रोक मिली।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;परशियन सभ्यता एवं भाषा और उर्दू को प्रशासनिक भाषा के बतौर प्रोत्साहन के द्वारा मुगलों के राजदरबारी तौर तरीके लोक रीतिरिवाजों से और भारतीय जनता से अलग-थलग ही रहे। सभ्य कुलीनजन एवं शहरी विद्वानों में प्रिय हुई उर्दू अपनी मातृक परशियन एवं अरबी शब्द भंडार और गैर-भारतीय लिपि के साथ सामान्य जनता की स्वीकृति प्राप्त नहीं कर सकी। वह मूलतः विद्वानों की ही भाषा बनी रही। हिंदी पट्टी के बाहर वह बड़ी समस्या ही बनी रही। मुगल राजधानियों से दूर-दूर के नागरी केंद्रों की संपदा के दूर होते रहने से यह नितांत आवश्यक हो गया था कि मुगलशासन के प्रति जल्दी ही दुराव पैदा हो। मध्य भारत और बाहरी किनारों के भू-भागों में एकीकृत मुगल साम्राज्य में साधारणतया कोई रुचि नहीं थी इसलिए धर्मनिरपेक्ष शक्तियों के गठबंधन इन इलाकों में मुगलशासन के लिए चुनौतियां बनकर उठ खड़े हुए थे।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मुगलशासन की एक गंभीर खामी यह थी कि आधुनिक शिक्षा पर राजकोष की एक भी छदाम का खर्च न करना। औरंगजेब तो आधुनिक विज्ञान और तकनीकों के प्रति शंकालु बना रहा था। जबकि यूरोप के देशों ने पुस्तकों की छपाई एवं विश्वविद्यालयों पर निवेश करना शुरू कर दिया था और इधर मुगल विज्ञान के प्रति उपेक्षापूर्ण रुख रखते रहे। यद्यपि औरंगजेब के तहत मुगलसाम्राज्य ने भारत में यूरोपियन व्यापारिक बस्तियों के निर्माण को सफलतापूर्वक रोका था, परंतु भारत में मुगलों के द्वारा एकता और वैज्ञानिक उपलब्धियों के लिए कोई भी आधारशिला नहीं रखी गई थी। परिणामतः भारत को बड़े पैमाने पर यूरोपियन सैन्य चुनौतियों और सांस्कृतिक उत्थान के लिए अयोग्य ही छोड़ दिया गया था।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;/यह नहीं कहा जा रहा है कि स्थानीय राज्य उपनिवेशन के प्रतिरोध के लायक थे, उनकी वैमन्स्यकता और तनावों ने ब्रिटिश के विरुद्ध एकीकृत धड़ा बनने से रोक रखा था। परंतु बात अधिक महत्व की यह है कि उपर की केंद्रीयभूतता के बिना बड़ी जनप्रिय वैधानिकता, जनसमर्थन और स्वीकारता अपने आप में गंभीर सीमायें रखती थी।/&lt;br /&gt;दुर्भाग्य से मुगलों की ऐसी कमजोरियां भारतीय इतिहासकारों के ध्यान में नहीं आईं और जो समालोचक थे वे अपना ध्यान मुख्यतया जातीयता, हिंदूधर्म और संस्कृति के मसलों पर पर लगाया करते थे, बजाय सामाजिक, आर्थिक और राजनैतिक कारणों के जो ज्यादा ही अंकुरित होने वाले होते थे। मुगलशासन के जातीयवादी दृष्टि के आलोचक बहुधा उपेक्षा कर जाते हैं कि किस प्रकार से खास जातियों ने अपनी सेवायें और राजभक्ति मुगलशासन के प्रति प्रगट कीं और बदले में भौतिक लाभ प्राप्त किए थे। खासकर कायस्थों ने उपर उठने की गतिशीलता अनुभव की - लेखापाल और नोध करने के काम से उठकर महत्वपूर्ण प्रशासनिक पद सामाजिक तौर पर ब्राहमणों के समतुल्य प्राप्त करके। मुगलशासन की सफलताओं में व्यापारिक जातियों को भी ऐसा ही अवसर उपलब्ध था और यहां तक कि औरंगजेब के राज्य में, सबसे उपर के राजस्व पदाधिकारी हिंदू बनिया या ब्राहमण ही थे।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बिहार के मैथिल ब्राहमणों की पदोन्नति पूर्ववर्ती इस्लामी शासकों द्वारा की जा चुकी थी और उनकी प्रादेशिक सत्ता को मुगलों द्वारा कोई चुनौती नहीं दी जाती थी जबकि दूसरी ओर, प्रादेशिक हिंदू शासक /यथा मेवाड़ और पहाड़ी राजपूत या बुंदलेखंड के/ बहुधा मुगलों द्वारा शमित ही रहे थे, वे बहुत ही आराम और सुख चैन से जीवनयापन करते थे और इसी ने उन्हें मुगलशासन के किसी गंभीर आक्रमण या चुनौती के लिए सामूहिक तौर से संगठित होने से रोका था।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;दूसरी ओर, ब्रिटिश इतिहासकारों, कलामर्मज्ञों और भारतविदों में मुगलों के प्रति लगाव की व्याख्या करना कठिन नहीं है। भारतीय सभ्यता के उंचे नुक्तों की तरह मुगलों को आदर देने से और उनकी परशियन प्रेरणाओं पर ज्यादा ही जोर देने से  ब्रिटिश विद्वानों ने एक मिथ्या प्रभाव प्रगट करने की कोशिश की कि भारत में सभी प्रकार की महान उपलब्धियों के लिए विदेशी-उत्प्रेरणा की आवश्यकता होती रही थी।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मुगलशासन में ब्रिटिशों की रुचि भारत में उनकी उपनिवेशन की अर्ध-सुसुप्त इच्छा से जुड़ी हुई थी और मुगलशासन से कोई अधिक भिन्न नहीं थी। यह तथ्य कि मुगल विदेशी विजेताओं की तरह भारत में आये थे और विशाल साम्राज्य की स्थापना  राजनैतिक गतिविधियों एवं सैन्य विजयों के आधार पर की थी से उपनिवेशन के अति हानिकारक परिणामों के लिए ब्रिटिश शासकों को क्षमा प्राप्ति का अवसर मिलता था। क्योंकि मुगलों ने किसानों पर करों के भार को बढ़ाया था, उन पर विदेशी भाषा जो विदेशी लिपि में लिखी जाती थी और अनेक रूप से वे देशज् सांस्कृतिक धाराओं से अलग और अछूते रहे - इन सबने ब्रिटिश शासन को भारतीय अनुभव की निरंतरता का ही हिस्सा प्रगट किया।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;परंतु इन सभी समानताओं के बाबजूद भारत में मुगलशासन को ब्रिटिश शासन से अलग करने वाली मूलभूत भिन्नतायें हैं। पहली, मुगलशासन के दौरान, किसानों और विशाल जनता में उतनी दरिद्रता नहीं थी जितनी ब्रिटिश शासन के दौरान थी। यह भी ध्यान देने योग्य है कि भारतीय उत्पादनों की गुणवत्ता ने सुयोग्य आदर प्राप्त किया और जहांगीर एवं शाहजहां के शासनकालों में उनकी भारी मांग हुआ करती थी जबकि ब्रिटिशकाल में भारत यूरोपियन निर्यातकों का कचरा-घर बना और पलासी की हार के बाद भारत के निर्यातों में भारी गिरावट आई।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हर गलती और विदेशी प्रवृतियों के बाबजूद मुगलों ने भारत में ही रह जाने का मन बना लिया था। समय बीतने पर वे  देशज् बने और इसलिए ही 1857 केे विद्रोह में उत्तरवर्ती मुगलों ने ब्रिटिशों का विरोध किया था। राजपूत राजकुमारियों के साथ अकबर की शादियों की नीति ने सैन्य नीति के क्षेत्रा में युक्तिपूर्ण उद्देश्यों को पूरा किया और उसने मुगलों की रुचियों का स्वदेशीकरण भी किया।यद्यपि ब्रिटिश इतिहाकार और कलामर्मज्ञों ने बड़े विस्तार के साथ लिखा कि अकबर ने अफगानिस्तान से हेरात और ईरान के राजदरबारों से सिराज या तबरिज लिया था तथापि जहांगीर द्वारा प्रोत्साहित पुरावशेषों में गहरे रंगों एवं काल्पनिक प्रकृतिवादी आकृतियों के लिए राजपूत रीतिरिवाजों का वह ऋणी था। स्थानीय प्रभावों ने बड़ी दूर तक मुगलों पर अपनी छाप छोड़ी अपेक्षाकृत ब्रिटिश शासकों के जिन्होंने वास्तव में, जहां भी प्रत्यक्ष शासन किया वहां के सांस्कृतिक रीतिरिवाजों को नष्ट किया था।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;परंतु ज्यादा महत्वकारी है कि किसानवर्ग से ली गई संपदा को मुगलों ने यद्यपि नष्ट किया था परंतु भारत में उनकी ललित कलाओं एवं वास्तुशिल्प की धरोहरें बनी रही आईं। भारत की धन-संपदा को योजनापूर्वक दूसरे देशों को नहीं भेजा गया  जैसा कि ब्रिटिशों ने किया था। उनके पतन के बाद स्थानीय शक्तियों ने ज्यादा जनप्रिय स्वीकृति के साथ अधिकार ले लिए और कुछ देशज् सांस्कृतिक प्रथाओं ने शीघ्रता से और आसानी से अपने आपको भारतीय जीवन के अनेक पक्षों पर पुनस्र्थापित किया परंतु ब्रिटिश औपनिवेशिक लूट और सांस्कृतिक विकृतिकरण बहुत ही कठिन थे कि उनको पलटा या  मिटाया जा सके। भारतीय जीवन के अनेक पक्षों पर इन सबने छलपूर्वक असर डालना जारी रखा था।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इस प्रकार से ब्रिटिश विद्वानों ने चतुराई से ब्रिटिश शासनकाल में विशाल संपदा की लूट और मनोवैज्ञानिक तार्किकता के विनाश के लिए मुगलशासन के प्रतिनिधित्व का चतुराई पूर्वक उपयोग किया परंतु जिसकी समतुल्यता भारत के इतिहास में अन्यत्रा नहीं है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;साथ ही, भारत या पाकिस्तान, बंगलादेश या अफगानिस्तान के लिए वे इतिहासकार और समाजविज्ञानी जो उपमहाद्वीप में सामाजिक समानता की प्रक्रिया को बढ़ाने और प्रजातंत्रात्मक अधिकारों के विस्तार में रुचि लेते हैं, को मुगलशासन काल बड़े परीक्षण का विषय होना चाहिए। भारत में मुगलकाल का प्रेम और रहस्यमयता को हटाया जाना चाहिए परंतु बिना सांप्रदायिक जाति विवाद में पड़ते हुए जिसमें मुगलशासन काल को ब्रिटिश उपनिवेशन से अधिक बड़ी बुराई की तरह से देखा जाता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color: rgb(153, 51, 153);"&gt;संबंधित आलेखः&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;1.सिंध की अरब विजय और इस्लामीकरण,&lt;br /&gt;2.पंजाब और गजनी एवं गौर आक्रमण,&lt;br /&gt;3.इस्लाम और उपमहाद्वीपः उसके संघात का मूल्यांकन,&lt;br /&gt;4.हिंदू और जैन परंपराओं के साथ प्रादेशिक सल्तनतों का अनुकूलन और समझौता,&lt;br /&gt;5.भारत में हस्तकौशल और व्यापार के ऐतिहासिक स्वरूप,&lt;br /&gt;6.भारतीय कला और वास्तुशिल्प में प्रगति,&lt;br /&gt;7.1857 का क्रांतिकारी उभार,&lt;br /&gt;8.भारत में सामाजिक संबंधों का इतिहास,&lt;br /&gt;9.सूफी धारायें और इस्लामी राजदरबारों में सभ्यता।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color: rgb(153, 51, 153);"&gt;संदर्भः&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;1.     चाचनामा, फुतुह ए बुल्दानः  /सिंध के आक्रमण और विजय के इतिहास की अरबी/परशियन पाठ्य पुस्तकों से अनुवाद एवं उद्धण,&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;1 ब.  ताजू ए मासिर और तबाकत ए नासिरः  किलों और मंदिरों के विनाश, मंदिरों की संपदा की लूट, हारे सैनिकों के कत्लेआम और दासों के ले जाने संबंधी विवरण दिल्ली सल्तनत के अनेक अरबी और परशियन इतिहास में हैं,&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;2.     स्काॅट लेवीः हिंदूकुश पार हिंदूः मध्य एशिया दास व्यापार में भारतीय / जरनल आॅफ दा राॅयल एशियाटिक सोसायटीः ज्ीम प्दकपंद डमतबींदज क्पंेचवतं प्द म्ंतसल डवकमतद ब्मदजतंस ।ेपं - प्तंदए प्तंदपंद ैजनकपमे ;34ण् 4द्ध,&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;2 ब. डिरिक काॅफः नौकर, राजपूत और सिपाही। ज्ीम मजीदवीपेजवतल व िउपसपजंतल संइवनत पद भ्पदकनेजंदए 1450.1850ए कैम्ब्रिज युनिवर्सिटी प्रेस, 1990 बतलाता है कि मुगल शासनकाल में दास प्रथा के होने के साक्ष्य हैंः ’’मुगल कुलीनवर्ग के द्वारा हजारों-हजार की संख्या में दास बनाने और बाहर भेजे जाने के अकाट्य प्रमाण हैं।’’ ’’इनमें से बहुतों को भारत के पश्चिमी में स्थित देशों में बेचा जाता था। सन् 1400 से पूर्व यह व्यापार फलीभूत हो रहा था, जब मुलतान एक महत्वपूर्ण बाजार था, परंतु उसके बाद वह काबुल के साथ चालू रहा था /पृ. 10/’’ ’’भेजे जाने वाले इस व्यापार में जहांगीर की हिस्सेदारी थी /पृ. 11/ और साम्राट शाहजहां राजद्रोहियों को सिंधु नदी के पार पठानी कुत्तों के बदले में भेज दिया करता था।’’ उसने बताया कि यह स्पष्ट है कि 1660 के दशक में भारतीय दासों की भारी मांग परशिया में बनी रहती थी।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;       डोरिक काॅफ ने यह भी बतायाः ’’इस इलाके का एक हिस्सा जबरन दासों के भेजे जाने की नीति सम्मत था जबकि पश्चिमी भारत में राजपूतों को नष्टकर दास बना के सिंधु नदी पार बाहर भेजा जाता था। अफगानों को पूर्व की ओर खदेड़ा जाता था आ ैर राजपूत विद्रोहियों के इलाकों में बसा दिया जाता था। फिजक अफगान अपनी मातृभूमि से पूरी तरह से विलुप्त हो गए थे, राजपूतों के साथ पेश होने के लिए ... ।’’&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;3.     इंडियन हिस्टोरिकल रिव्यू के बुलेटिन /इंडियन कौंसिल आॅफ हिस्टोरिकल रिसर्च/ और सोसियल साईंस प्रोबिंग्ज।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;4.     ए कांप्रीहेंसिव हिस्ट्र्ी आॅफ इंडिया, सं. मोहम्म्द हबीब और के.ए.निजामी, पीपीएच, 1970,&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;5.     ए हिस्ट्र्ी आॅफ माडर्न इंडिया, सं. क्लाउड मारकोविच, एंथम प्रेस /मुगल एम्पायर के परिच्छेद को देखिए, खासकर, ’’अकबर एण्ड दा कंस्ट्र्क्शन आॅफ एम्पायर और मिथ्स् एराउन्ड अकबर,&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;6.    मीरा सेठीः वाॅल पेंटिंग्ज् आॅफ दा हिमालया /भारत सरकार का प्रकाशन विभाग/। मीरा सेठी ने स्थानीय सल्तनतों का मुगलों के साथ सविस्तार वर्णन किया है,&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;       मुगल पुरावशेषों पर पुस्तकों को भी देखिए जैसे दा इंडियन हैरीटेजः कोर्ट लाईफ एण्ड आर्टस् अंडर मुगल रूल जो लंदन में विक्टोरिया और अल्बर्ट म्युजियम के संग्रह में मुगल पुरावशेषों का अभिलेखन करता है। यद्यपि अभिलेख जो चाहा गया है को दर-किनार करता है तब भी अनेक चित्रा मुगल उत्पादों की विभिन्न एवं बेहद संुदर गुणवत्ता का बखान करते हैं। चूंकि भारत के बाहर ही मुगलों की धरोहरें संग्रहालयों में हैं मुगल धरोहरों के छाया चित्रों के संग्रह आवश्यक मार्ग दर्शन एवं भारत में मुगलों की भूमिका के मूल्यांकन में, सहायता कर सकते हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;       मुगल पुरावशेषों के उदाहरणों को अनेक आॅन-लाईन कलेक्शनों में भी देखा जा सकता है जैसे कि लाॅस ऐंजिल काॅउंटी म्युजियम आॅफ आर्टस्। म्युजियम लिंक को उपर देखिए।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3558267468781846487-8542708017707837671?l=itihaasam.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://itihaasam.blogspot.com/feeds/8542708017707837671/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://itihaasam.blogspot.com/2009/01/blog-post_4165.html#comment-form' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3558267468781846487/posts/default/8542708017707837671'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3558267468781846487/posts/default/8542708017707837671'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://itihaasam.blogspot.com/2009/01/blog-post_4165.html' title='मुगलों का उत्थान और पतन'/><author><name>अनुनाद सिंह</name><uri>http://www.blogger.com/profile/05634421007709892634</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3558267468781846487.post-3425600604955868547</id><published>2009-01-15T05:33:00.000-08:00</published><updated>2009-01-15T05:38:00.855-08:00</updated><title type='text'>भारतीय स्वतंत्राता संग्राम में मूल युगांतरकारी घटनायें</title><content type='html'>’’नादिरशाह ने देश को केवल एक बार लूटा परंतु ब्रिटिश हमें हर दिन लूटते हैं। हमारे खून को चूसते हुए प्रति वर्ष 4.5 मीलियन डालर की संपदा देश के बाहर खींच ली जाती है। ब्रिटिश को तत्काल ही भारत छोड़ देना चाहिए।’’ सिंध टाईम्स ने मई 20, 1884 में इंडियन नेशनल कांग्रेस के जन्म से 1 वर्ष और 1942 के ’’भारत छोड़ो’’ आंदोलन की शुरूआत से 58 वर्ष पहले लिखा था ।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;केवल इंडियन नेशनल कांग्रेस ने एम.के.गांधी के नेतृत्व सम्हालने पर राष्ट्र्ीय भावनाओं को जगाया था इस विचार के विपरीत राष्ट्र्ीय संवेदनायें भारत में 1857 के लगभग रहीं और ब्रिटिश शासन के दौरान भारतीय राष्ट्र्ीयता विभिन्न शक्लों में लगातार प्रगट होती रही।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color: rgb(153, 51, 153);"&gt;विदेशी वस्तुओं का बहिष्कार&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सिकारपुर सिंध में, आर्थिक राष्ट्र्ीयता का स्वरूप दिखलाई दिया जब 1888 में स्थापित प्रीतम धर्मसभा ने अनेक सामाजिक सुधारों को प्रारंभ किया। उसने ’’स्वदेशी’’ शक्कर, साबुन, और कपड़ा मिलों की स्थापना की प्रेरणा दी थी। सभा के साहित्य को इतना क्रांतिकारी समझा गया कि 1909 में, उसके 3 सदस्योंः  सेठ चेतूमल, वीरूमल बेगराज और गोविंद शर्मा को ब्रिटिश प्रशासन ने 5 वर्ष की कठोर कारावास की सजा सुनाई थी।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;1905 में, ब्रिटिश द्वारा साम्प्रदायिक आधार पर बंग भंग ने देशव्यापी स्वदेशी और स्वतंत्राता आंदोलन को प्रेरित किया था। अगस्त 7, 1905 को विदेशी वस्तुओं के बहिष्कार की घोषणा कर दी गई। इस समय इंडियन नेशनल कांग्रेस ने इस कार्यक्रम को सशर्त समर्थन दिया। परंतु एक वर्ष बाद, उग्रवादी नेता महाराष्ट्र् से तिलक, बंगाल से बिपिनचंद्र पाल एवं अरविंदो घोष और पंजाब से लाजपत राय के प्रभाव से 1906 में कांग्रेस के कलकत्ता अधिवेशन ने पहली बार ’’स्वराज’’ अर्थात् स्वशासन संकल्पना की घोषणा की और बहिष्कार आंदोलन को समर्थन देने का आह्वान किया। यद्यपि ’’स्वराज’’ की मांग भारत के लिए संपूर्ण राजनैतिक और आर्थिक आजादी की ओर मात्रा एक कदम था और चूंकि भारत को ब्रिटिश साम्राज्य का एक अंग बना रहना था, यह वास्तविक स्वतंत्राता की ओर एक महत्वपूर्ण पग था। उसने कई स्थानीय राष्ट्र्वादी संगठनों को विदेशी वस्तुओं के बहिष्कार आंदोलन में भाग लेने की और ऐसी दुकानें कायम करने की प्रेरणा दी जहां केवल देश में निर्मित वस्तुओं को ही बेचा जाता था।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color: rgb(153, 51, 153);"&gt;पूर्ण स्वतंत्राता के शुरूआती आवाहनः गदर पार्टी का अभ्युदय&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ब्रिटिश शासन से पूर्ण स्वतंत्राता के आह्वान के लिए 1913 में, प्रथम भारतीय राजनैतिक संगठन, गदर पार्टी भारतीय आप्रवासियों के द्वारा कैलीफोर्निया में, गठित की गई थी। गदर आंदोलन अनेक कारणों से अनोखा था। इसके संस्थापक सदस्यों में सिख बहुसंख्यक थे परंतु गदर आंदोलन प्रादेशिक और धार्मिक अतिश्यता से मुक्त था। वह धर्मांधता और जातिभेदभाव को पूरी तरह से नकारता था। और, कांग्रेस के विपरीत, इसकी सदस्यता मूलरूप से कामगार वर्ग और गरीब किसानों से थी। गदर आंदोलन मंे सिख, मुस्लिम और दलित के साथ हिंदुओं का स्वागत बिना किसी भेदभाव के किया जाता था।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;गदर पार्टी का साहित्य ब्रिटिश शासन पीड़ित आम लोगों की दुर्दशा का स्पष्ट वर्णन करता था। प्रथम विश्व युद्ध की शुरूआत का पूर्वानुमान करने में वे सर्वप्रथम थे। भारतीय जनता की औपनिवेशिक शासन से मुक्ति का वह सही अवसर था इसलिए उन्होंने पूर्ण स्वतंत्राता के आम आंदोलन का नारा दिया था। ’’जंग दा होका’’ युद्ध की घोषणा पोस्टर में प्रथम विश्व युद्ध से संलग्न ब्रिटिश युद्ध गतिविधियों में भारतीय सैनिकों के झौंके जाने की आशंका की चेतावनी भी उन्होंने ही दी थी।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;दुर्भाग्य से, कांग्रेस इस अवसर का फायदा न उठा सकी। गांधी जैसे नेता तो ब्रिटिश युद्ध गतिविधियों के समर्थन में यहां तक बढ़ गए कि ब्रिटिश सेना में भारतवासियों के भरती होने का आह्वान किया। गांधी की बेईमान और खुशामदी नीति की न केवल गदर कार्यकत्र्तों ने कटु आलोचना की वरन् अन्य हलकों से भी विरोध शुरू हुआ।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उस समय जब गांधी ’’वार रिक्रूटमेंट मेला’’ को संबोधित कर रहे थे नबावशाह के डा. तुलजाराम खिलनानी वार लोन बाॅड के विरोध में खुली मुहिम चला रहे थे। सिंध बाम्बे प्रिसिडेंसी का हिस्सा था और सिंध कांग्रेस, बाम्बे प्राविंशियल कांग्रेस कमेटी का। जब गांधी ने आॅल इंडिया कांग्रेस कमेटी का चुनाव बंबई प्राविंशियल कांग्रेस कमेटी से लड़ा, सिंध के प्रतिनिधियों ने ब्रिटिश युद्ध गतिविधि के समर्थन को ध्यान में रखते हुए, उनके चुनाव का विरोध किया था।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;तब भी कमोवेश, कांग्रेस उस समय अपेक्षाकृत समझौतावादी संगठन था और गदरवादियों से तीखी आलोचना पाती रहती थी। ब्रिटिश की दमनकारी नौकरशाही में भागीदारी के द्वारा अथवा स्वशासन या सुधारों के लिए ब्रिटिश से वकालत के द्वारा आजादी प्राप्त की जा सकती है - कांग्रेस के इस विचार को गदरवादियों ने अस्वीकार किया था। गदरवादियों को विश्वास था कि बिना किसी भेदभाव के, समाज के सभी वर्गों के साथ किसान एवं कामगार्रों का संघर्षशील जनआंदोलन ही सफल हो सकेगा। उन्होंने न केवल ब्रिटिश शोषण से आजादी की कल्पना की वरन् भूख, बेघरबारी और बीमारी से आजाद भारत की कल्पना की थी। उनकी दृष्टि में नए भारत में धार्मिक अंधविश्वासों और समाज मान्य असमानताओं के लिए कोई स्थान नहीं रहेगा।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कैलीफोर्निया में गदर आंदोलन शुरू हुआ, पूरी दुनियां में शाखायें स्थापित कीं गईं और 1916 में, उसके साप्ताहिक इस्तहार की 10 लाख प्रतियां प्रकाशित होकर बांटीं जातीं रहीं। जैसे जैसे शक्ति बड़ी उनका आंदोलन आगे बड़ा और पूरे भारत मेें गदर पार्टी की इकाईयां स्थापित करने की योजना को बल मिला। हजारों स्वयंसेवकों ने घर लौटने का यत्न किया और जहां भी संभव हो सका, गदर पार्टी की इकाईयां स्थापित कीं। इस बेहद विप्लववादी आंदोलन के असर को भांपते हुए ब्रिटिश ने कठोर कदम उठाये और आंदोलनकारियों को जा घेरा। सैकड़ों को लाहौर कांस्प्रेसी के 5 केसों में आरोपित किया गया। एक अनुमान के अनुसार 145 गदरवादियों को फांसी पर चढ़ा दिया और 308 को 14 वर्ष से अधिक के लिए कैद की सजा सुनाई। अनेकों को अंदमान के बदनाम काला पानी की सजा दी गई।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ब्रिटिश आर्मी के खासकर भारतीय सैनिकों पर गदरवादियों को सफलता प्राप्त हुई और उनको राजद्रोह करने के लिए प्रेरित किया। ब्रिटिश ने हांगकांग रेजीमेंट के सैनिकोें को गिरफ्तार किया, गदर बुलेटिन वितरण के लिए कोर्ट मार्शल किया, भारत वापिस भेजा और जेल भेज दिया गया। पेनाॅग की दो रेजिमेंटों ने सैन्यद्रोह किया परंतु सैन्यद्रोह को बर्बरतापूर्वक कुचल दिया गया। जनवरी 1915 में 130 वीं बलूची रेजिमेंट ने विद्रोह किया। इस रेजिमेंट के 200 सैनिकों का कोर्ट मार्शल किया गया, 4 सैनिकों को फांसी दी गई, 69 को आजीवन कारावास और 126 को विभिन्न मियादों के लिए सश्रम जेल भेजा गया। पंडित सोहनलाल पाठक गदर पार्टी के नेताओं में से एक को फरवरी 16, 1906 को, ब्रिटिश शासन के विरुद्ध विद्रोह भड़काने के लिए मंडालय जेल में फांसी दी गई। इराक और ईरान में भारतीय सैनिकों के बीच गदर पार्टी क्रियाशील थी। उनके काम के परिणाम स्वरूप बसरा में स्थित 15 वीं लेंसरस् ने विद्रोह कर दिया और 64 सैनिकों का कोर्ट मार्शल हुआ। इसी तरह 24 वीं पंजाबी और 22 वीं पहाड़ी रेजीमेंटों ने भी विद्रोह किया था।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;परंतु गदरवादियों के विरुद्ध भंयकर दमन शरू करने के बाद भी 1919 में, जनता के क्रांतिकारी असंतोष की लहर को रोकने में ब्रिटिश असमर्थ थे। 1918 के अंतिम और 1919 के शुरू के महिनों ने अभूतपूर्व विशाल हड़ताली आंदोलनों को देखा। बंबई मिल की हड़ताल 1,25,000 कामगारों तक फैल गई थी। 1919 का रोलेट एक्ट जो सैन्य कानून के उपनियमों को विस्तार देता था, के बाबजूद आम प्रदर्शनों की लहर, हड़तालें और नागरिक असंतोष से ब्रिटिश अधिकारियों का सामना हुआ। कामगारों के साहसिक प्रतिरोध से ब्रिटिश सकते में आ गए और उस वर्ष की सरकारी गवर्नमेंट रिपोर्ट ने आश्चर्य से यह चेतावनी पाई कि कैसे हिंदू और मुस्लिम ने एक साथ होकर उनकी शक्ति को चुनौति दी। आश्चर्य नहीं, ब्रिटिश ने बेमिसाल दमनकारी कदम उठाये थे।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जनरल डायर के जलियांनबाग के हत्याकांड के बाद हड़तालों की बाढ़ आ गई। उसने निहत्थे 10,000 बैसाखी मनाने वाले लागों पर 1600 राॅउंड गोलाबारूद से निर्दयी हमला किया। गांधी ने तब भी, दिसम्बर 1919 में ब्रिटिशों को सहयोग देने की वकालत करना जारी रखा जबकि आम भारतवासी का प्रतिरोध जारी था। 1920 के शुरू के दो महिनों ने बड़े पैमाने के प्रतिरोधों को देखा। इन प्रतिरोधों में 15 लाख कामगारों और 200 से अधिक हड़तालों की भागीदारी थी। इस उमड़ते क्रांतिकारी ज्वार के प्रत्युत्तर मंे कांग्रेस के नेतृत्व को अपनी उदारवादिता से ही मुकाबला करना पड़ा। उन्हें अपने कार्यक्रम में कुछ ज्यादा ही संघर्षकारी चेहरा प्रगट करना पड़ा। ’’अहिंसक असहयोग’’ आंदोलन इस प्रकार से कांग्रेस के नेताओं यथा लाजपत राय, मोतीलाल नेहरू, और गांधी की देखरेख में शुरू किया गया।  &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color: rgb(153, 51, 153);"&gt;अन्य विप्लवकारी शक्तियां &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कांग्रेस की टांग खिंचाई के बाबजूद दूसरी अन्य विप्लववादी शक्तियों का सम्मिलन हो रहा था। 1920 में कम्युनिस्ट पार्टी आॅफ इंडिया का गठन हो चुका था। वह संपूर्ण स्वतंत्राता की मांग कर रही थी। उसने यह भी जोर दिया कि ’’स्वराज’’ के नारे को मूलभूत अर्थ दिया जाना चाहिए और सामाजिक एवं आर्थिक परिवर्तन के कार्यक्रम की व्याख्या की जानी चाहिए। इन परिवर्तनों में जमीनदारी प्रथा की समाप्ति, सामंतकालीन दमन और जातीय उत्पीड़न से मुक्ति जैसे अतिआवश्यक प्रश्नों को जोड़ा जाना चाहिए।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आजादी की लड़ाई में भाग लेते हुए कम्युनिस्टों ने कामगारों कोे ट्र्ेड युनियनों में, किसानों को ’’किसान सभाओं’’ ’में और विद्यार्थियों को विद्यार्थी युनियनों में संगठित करने में अपनी क्षमताओं को लगाया। इन्हीं प्रयत्नों के परिणामस्वरूप राष्ट्र्ीय संगठनों जैसे ’’आॅल इंडिया टे्र्ड युनियन कांग्रेस,’’ ’’आॅल इंडिया किसान सभा’’ और ’’आॅल इंडिया स्टुडेंट फेडेरेशन’’ का गठन हुआ और उन्हें शक्तिशाली बनाया गया। कम्युनिस्टों ने प्रगतिशील, सांस्कृतिक एवं साहित्यिक संगठनों यथा ’’प्रोग्रेसिव राईटर्स एसोशियेशन’’ और ’’इंडियन पीपुल्स थेयटर एसोशियेशन’’ की शुरूआत की।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ब्रिटिश ने कम्युनिज्म को भारत से बाहर कर देने का निश्चय कर लिया था। ठीक उसी प्रकार जैसे उनने गदरवादियों का दमन किया था। ब्रिटिश ने अनुभवहीन कम्युनिस्ट संगठनों का क्रूर दमन करना शुरू किया। कम्युनिस्ट साहित्य को प्रतिबंधित किया जिससे क्रांतिकारी विचारधारा के विस्तार को रोका जा सके। ब्रिटिश शासन ने कम्युनिस्ट आंदोलन के युवा नेतृत्व के विरुद्ध षडयंत्रातापूर्वक केस दायर करना शुरू किया यथा पेशावर 1922 में, कानपुर 1924 में और मेरठ 1929 में। 1920 के दशक में स्थापना के बाद ही कम्युनिस्ट पार्टी को गैरकानूनी घोषित किया और उसे दो दशकों से अधिक गैरकानूनी परिस्थितियों में ही काम करना पड़ा था।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color: rgb(153, 51, 153);"&gt;कांग्रेस की पुराणपंथता   &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अनेक संदर्भों में, गदर पार्टी और भारतीय कम्युनिस्टों का भारतीय परिस्थितियों का विश्लेषण एक समान था और बाबजूद इसके कि वे सरकारी दमन को भुगत रहे थे, उनके सिद्धांत लोगों को लुभाते रहे।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;परंतु गदरवादी कांग्रेस के ज्यादा आलोचक थे और कम्युनिस्टों की अपेक्षा कांग्रेस के नेतृत्व को अधिक संशय से देखते थे। कम्युनिस्ट सोचते थे कि जन आंदोलनों का दबाव कांग्रेस को ब्रिटिश के विरुद्ध अधिक दृढ़ता से कार्य करने पर मजबूर करेगा। परंतु उनने संभवतया कांग्रेस को पीछे खींचे रखने वाले पुराणपंथता का कम मूल्यांकन किया था। 1921 में, रिपब्लिकन मुस्लिम नेता हसरत मोहानी विदेशी नियंत्राण से पूर्ण मुक्त ’’स्वराज’’ को संपूर्ण स्वतंत्राता की तरह व्याख्या करते हुए प्रस्ताव रखना चाहते थे। ब्रिटिश को अधिक राहत के लिए गांधी ने प्रस्ताव के विरोध का नेतृत्व किया और उसे रद्द कराया। 1921 में, ब्रिटिश द्वारा लगाये गए उंचे करों के खिलाफ उबलता हुआ गुस्सा था। अनेक जिलों के प्रतिनिधि गांधी के पास ’’नो टेक्स’’ अभियान के नेतृत्व के लिए पहुंचे। गुंटूर में राष्ट्र्ीय नेतृत्व की अनुमति के बिना नो टेक्स अभियान शुरू हो गया परंतु गांधी ने सभी टेक्स समय पर देने का नारा दिया। जो भी हो, केवल बारदोली के जिले में नो टेक्स आंदोलन के नेतृत्व के लिए वे सहमत हो गए थे परंतु जब उनने चैरीचैरा के गांव के किसान विद्रोह की खबर सुनी तो उसेे भी वापिस ले लिया।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;गांधी के बारदोली निर्णय ने कांग्रेस के भीतर विवाद पैदा कर दिया। सुभाषचंद्र बोस ने लिखाः ’’’जब जनता का गुस्सा उबाल खा रहा था पीछे हटने की घोषणा राष्ट्र्ीय आपदा से कम न थी। महात्मा के प्रमुख लेफ्टीनेंट देशबंधुदास, मोतीलाल नेहरू और लाला लाजपत राय, जो जेल में थे, ने आम गुस्सा सहा। मैं देशबंधु के साथ था और मैंने देखा कि वे गुस्से और दुख में थे।’’ दी इंडियन स्ट्र्गल से उद्धृत, पृष्ठ 90।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मोतीलाल नेहरू, लाजपत राय और दूसरों ने गांधी को उनके निर्णय के विरोध में लम्बे और गुस्से भरे खत भेजे। गांधी ने उत्तर दिया था कि जेल में आदमी ’’नागरिक रूप से मृत’’ थे और उन्हें नीति के संबंध में कहने का अधिकार नहीं। इस गंभीर जन विरोधी निर्णय के साथ कांग्रेस की छवि बड़ी खराब हुई। गांधी ने स्वीकारा कि कांग्रेस की एक करोड़ की सदस्यता की घोषणा के स्थान पर उसके संपर्क में बमुश्किल दो लाख लोग ही गिने जा सके थे।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इस प्रकार से यह आवश्यक हो गया था कि नौजवान क्रांतिकारी दूसरी और विप्लववादी ताकतों की ओर मुड़ते। एम.एन.राय जैसे लोग ब्रिटिश विरोध के लिए सशस्त्रा संघर्ष के गठन की बात से आकर्षित हुए और उन्होंने रासबिहारी बोस से हाथ मिलाया कि विदेश में इस काम के लिए समर्थन पाया जा सके। दूसरों के लिए गदर पार्टी के संदेशों ने मानों तार झंकृत कर दिये। गदरवादियों का प्रभाव खासकर पंजाब में पैदा हुआ। युवा और चहेते शहीद भगतसिंह गदर समर्थकों के परिवार में पैदा हुए थे और उनके संदेश से बहुत प्रभावित थे। 1925 में, शहीद भगतसिंह द्वारा नौजवान भारत सभा शुरू की गई थी। उसने ’’इंकलाब जिंदाबाद’’ का प्रचलित नारा दिया था। पंजाब में 1925 में, गदर समर्थकों ने कृति किसान पार्टी की स्थापना की। कृति पार्टी ने नौजवानों के बीच काम किया और नौजवान भारत सभा से नजदीकी संबंध बनाये, भगतसिंह के ’’कृति’’ उर्दू संस्करण में काम करते हुए। गदरवादियों के समान कृति पार्टी ने भी समाज के हर श्रेणी से अपने सदस्य बनाये। उसने धार्मिक अवरोधों को तोड़ा और सिख, हिंदू और मुस्लिम सभी समुदायों से नेता चुने।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;1920 के उत्तरार्ध में, कांग्रेस द्वारा किसी भी महत्वपूर्ण जन आंदोलन शुरू न कर सकने पर भी, ब्रिटिश शासन का विरोध वर्कर्स् एण्ड पीजेंट्स पार्टी और लड़ाकू युनियनों, गिरनी कामगार युनियन या बंबई की सूती कारखाने की रेड फ्लेग युनियन की ओर से बड़े तौर पर हुआ। 1928 के अधिवेशन में, संपूर्ण स्वतंत्राता की मांग से हटाते हुए कांग्रेस फिर अपने पुरांणपंथता को ओड़े रही। सुभाषचंद्र बोस और जवाहरलाल नेहरू की क्रांतिकारी मांगों पर गांधी छाये रहे। तब भी, 1929 का साल किसानों के विप्लवों और हड़तालों का महत्वपूर्ण साल रहा। यह वही वर्ष था जब भूमिगत क्रांतिकारियों के छोटे छोटे गुटों ने पुलिस स्टेशन, ब्रिटिश सेना के केंपों और ब्रिटिश दमन के स्थानों पर आक्रमण किए। अधिकांश क्रांतिकारी पकड़े गए। उन्हें या तो फांसी दी गई या फिर काले पानी की कठोर सजा।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color: rgb(153, 51, 153);"&gt;सशस्त्र &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(153, 51, 153);"&gt;क्रांतिकारियों&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(153, 51, 153);"&gt; का प्रादुर्भाव&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;शुरू में सभी सशस्त्रा क्रांतिकारियों ने उत्साहपूर्वक अहिंसक असहयोग आंदोलन में हिस्सा लिया। परंतु जब गांधी ने अचानक असहयोग आंदोलन निलंबित कर दिया युवा क्रांतिकारियों ने दूसरे नेताओं की ओर रूख किया। 1904 में व्ही.डी.सावरकर ने ’’अभिनव भारत’’ का गठन क्रांतिकारियों की गुप्त संस्था के रूप में किया। ’’अनुशीलन समिति’’ और ’’युगांतर’’ ऐसी ही दो संस्थायंे थीं। उनने ब्रिटिश शासन का सशस्त्रा विरोध करने का विचार प्रचारित किया और मदाम कामा और अजीतसिंह के साथ अंतरराष्ट्र्ीय केंद्र स्थापित किये। यूरोप में संघर्ष का प्रतिनिधित्व श्यामजी कृष्णा वर्मा और कुछ दूसरों के द्वारा लंदन में एक शाखा स्थापित करते हुए हुआ।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कांग्रेस की अकर्मन्यता से उत्तर भारत में क्रांतिकारी निराश हुए और उनका मोह भंग हुआ। वे पहले थे जिनने बुजुर्ग नेताओं जैसे रामप्रसाद बिस्मिल, जोगेश चटर्जिया और सचिन्द्रनाथ सांयाल को पहिचाना। उनकी पुस्तक ’’बंदी जीवन’’ क्रांतिकारी आंदोलन में पाठ्य पुस्तक मानी जाती रही। वे अक्टूवर, 1924 को कानपुर में मिले और औपनिवेशिक शासन को सशस्त्रा क्रांति द्वारा उखाड़ने के लिए हिंदुस्तान रिपब्लिकन एसोशियेशन /सेना/ का गठन किया।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सशस्त्रा संघर्ष के लिए साहसी और जोखिमी भिड़ंतों की जरूरत थी। स्वयंसेवकों की भरती, प्रशिक्षण और हथियारों की प्राप्ति के लिए धन की जरूरत बनी रहती थी। इसलिए ही, ब्रिटिश राजकोष की डकैतियां की जातीं थीं। 9 अगस्त, 1925 को दस व्यक्तियों ने लखनउ के पास काकोरी गांव पर 8 डाउन ट्र्ेन को रोका जिससे रेलवे की धन राशि को प्राप्त किया जा सके। ब्रिटिश कार्यवाही कठोर और तत्काल हुई। असफाक उल्लाखान, रामप्रसाद बिस्मिल, रोशनसिंह और राजेंद्र लाहरी को फांसी पर लटका दिया गया, चार अन्य लोगों को अंडमान आजीवन कारावास के लिए भेजा और सात को लम्बे समय के लिए जेल की सजा सुनाई। उत्तर भारत के क्रांतिकारियों के लिए काकोरी केस बड़ा बुरा सिद्ध हुआ परंतु वह कोई प्राणनाशक आघात नहीं था। युवा विजयकुमार सिन्हा, शिव वर्मा और जयदेव कपूर उत्तर प्रदेश में और भगतसिंह, भगवती चरण वोहरा और सुखदेव पंजाब में ने हिंदुस्तान रिपब्लिकन एसोसियेशन /सेना/ का पुनर्गठन चंद्रशेखर आजाद के नेतृत्व में किया। इसी समय वे समाजवाद के सिद्धांतों से आकर्षित हुए। दिल्ली की 1 सितम्बर, 1928 की बैठक में, नये सामूहिक नेतृत्व ने समाजवाद को अपना लक्ष्य स्वीकार किया और अपने संगठन का नाम हिंदुस्तान सोशियलिस्ट रिपब्लिकन एसोशियेशन /सेना/ में बदल दिया।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अप्रेल 8, 1929 को हिंदुस्तान सोशियलिस्ट रिपब्लिकन एसोशियेशन /हि.स.प्र.स./ ने दो दमनकारी पब्लिक सेफ्टी बिल और ट्र्ेड डिस्प्यूट बिल को पारित करने के विरोध में सेंट्र्ल लेजिस्लेटिव एसेम्बली में बम फंेकने की योजना पर काम शुरू किया। परंतु, बम फेंकना किसी के जीवन को क्षति पहंुचाने के उद्देश से नहीं था। इस साहसपूर्ण कदम द्वारा भारतीय जनगण को जगाना और उत्साहित करना था। उसका उद्देश ’’बहरे को सुनाना’’ था, गिरफ्तार होकर और नए एवं स्वतंत्रा भारत के अपने विचारों और स्वप्नों के प्रचार के लिए ट्र्ायल कोर्ट का उपयोग करना था।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;भगतसिंह और बटुकेश्वर दत्त पर एसेम्बली बम केस चलाया गया। बाद में सुखदेव, राजगुरू और दूसरे दसियों क्रांतिकारियों पर विख्यात षड़यंत्राकारी केस चलाये गये। कोर्ट में, उनकी दृढ़ता और निर्भयता धरोहरें बनीं।  हर रोज ’’इंकलाब जिंदाबाद’’, ’’डाउन, डाउन विद इम्पीरियलिज्म’’ नारों के साथ कोर्ट में वे प्रवेश करते और ’’सरफरोशी की तमन्ना हैै’’ तथा ’’मेरे रंग दे बसंती चोला’’ जैसे गानों को गाते।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मार्च 1931 में, राजगुरू, सुखदेव और भगतसिंह को ब्रिटिश ने आम जनता के तीव्र विरोध के बाबजूद फांसी पर लटका दिया। भगतसिंह देश का चहेता नायक बना और उसकी फांसी पूरे देश में वेदना और दुख का उद्गार बनी। आंदोलन को बढ़ाने के लिए आम जनता के गुस्से को क्रांग्रेस उपयोग में ला सकती थी परंतु उसका भगतसिंह के मुकदमें पर ढीला रवैया था। ऐसा लगता है, गांधी ने भगतसिंह की आसन्न मृत्यु दण्ड की बात पर ब्रिटिश से अपनी व्यक्तिगत वार्ताओं में जोर नहीं दिया। भगतसिंह के समर्थक कटु हो गए थे। गांधी उनकी ओर से लड़ने में असफल हुए।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बंगाल में भी, सशस्त्रा क्रांतिकारी समूह ने पुनर्गठन और गुप्त कार्यवाहियों को बढ़ाना शुरू किया यद्यपि कुछ लोग कांग्रेस से संबंध बनाये रहे। उनकी योजनाओं में से कलकत्ता के अति घृणित पुलिस कमिश्नर, चाल्र्स टेगार्ट की हत्या एक थी। यह आक्रमण असफल रहा परंतु गोपीनाथ शाहा को पकड़ा और जनता के प्रतिरोध के बाबजूद उसे फांसी दे दी गई। इस असफलता के बाद भी सशस्त्रा विद्रोह के कदमों को त्यागा नहीं गया। नए ’’विद्रोह समूहों’’ में से सबसे अधिक क्रियाशील और प्रसिद्ध था, सूर्या सेन के नेतृत्व वाला चितगांग समूह।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सूर्या सेन ने असहयोग आंदोलन में सक्रिय भागीदारी अदा की थी। वे चिटगांग के नेशनल स्कूल में शिक्षक बन गए थे और वहां कांग्रेस से जुड़ गए थे। स्थानीय कांग्रेस कमेटी के सदस्यों के साथ नए युवा लोगों और अन्य हमवतनों से मिलकर सूर्या सेन ने विद्रोह की योजना बनाई। यह एक छोटी ही योजना थी यह बतलाने के लिए कि ब्रिटिश साम्राज्य की सशस्त्रा शक्ति को चुनौती दी जा सकती थी। उनकी योजना चिटगांग के दो मुख्य शस्त्रागारों को अधिकार में लेना और उनके शस्त्रों को छीनकर चार बड़े क्रांतिकारी समूह से एक बड़ा सशस्त्रा डिटेचमेंट का गठन करना था। अप्रेल 1930 में भयंकर लड़ाई में 80 ब्रिटिश सैनिक और 12 क्रांतिकारी मारे गए परंतु चिटगांग को क्रांतिकारों द्वारा छीना नहीं जा सका। चिटगांग के ग्रामीण इलाकों में सशस्त्रा क्रांतिकारी बिखर गए। अधिकांश गांव के मुस्लिमों ने छिपने, भोजन और 3 वर्षों तक जीवित रह सकने के लिए आश्रय दिया। चिटगांग शस्त्रागार धावे ने बंगाल की जनता पर गहरा प्रभाव डाला और अनेक सशस्त्रा प्रतिरोधों को प्रेरणा दी। परंतु सूर्या सेन अकस्मात् पकड़ा गया और 1934 में फांसी पर लटका दिया गया। उसके अनेक सह लड़ाकू भी पकड़े गए और उनको लम्बे समय के लिए जेल की सजा दी गई।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जैसा कि दिखलाई पड़ा कि कांग्रेस के प्रभाव से राष्ट्र्ीय आंदोलन पूरी तौर से फिसला जा रहा था, गांधी अहिंसात्मक संघर्ष के तरीके पर वापिस आये और 1930-31 का नमक सत्याग्रह शुरू कर दिया। आयातित वस्तुओं के बहिष्कार के कार्यक्रम भी शुरू किये गए। एक बार फिर से जनता स्फूर्तिवान हुई, ब्रिटिश विरोधी कार्यवाही की एक श्रृखंला बनी जिसमें से सबसे महत्वपूर्ण चिटगांग के शस्त्रागार का धावा और पेशावर के गढ़वाली सैनिकों का सैन्यद्रोह था। गढ़वाली सैनिकों ने आम जुलूस में अपने भाईयों पर गोली चलाने के ब्रिटिश आदेशों की अवज्ञा की थी। उन्हें गांधी से थोड़ी सी ही दया प्राप्त हुई थी।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color: rgb(153, 51, 153);"&gt;ट्रेड&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(153, 51, 153);"&gt; युनियन प्रतिरोध &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;साथ ही साथ, ब्रिटिश सत्ता का सामना एक बार फिर हड़तालों की लहर से हुआ। यद्यपि कम्युनिस्ट सरकारी तौर पर गैरकानूनी थे, कम्युनिस्ट और सोशियलिस्ट समर्थक ट्र्ेड युनियन आंदोलनों में गतिशील बने रहे। बंबई के औद्योगिक कामगारों ने सबसे अधिक वीरतापूर्ण प्रतिरोध, लाठी चार्ज और अंधाधुंध गोलियों से भयभीत हुए बिना किया। इस प्रकार के बढ़ते हुए विरोध के उत्तर में ब्रिटिश ने बदला लेने के लिए भारी सशस्त्रा सेना का सहारा लिया और राॅयल एअर फोर्स के बमवर्षक वायुयानों को प्रतिरोधी और हड़ताली कामगारों पर बमबारी करने के लिए बुलाया। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;व्यापारियों और बंबई चेम्बर आॅफ कामर्स ने औपनिवेशिक आधार पर भारतीयों के लिए स्वशासन की मांग का समर्थन किया। कामगारों का प्रतिरोध 30 के दशक भर चलता रहा परंतु मोटे तौर पर राष्ट्र्ीय आंदोलन ने नकाफी प्रगति की। कांग्रेस और उसके समर्थकों की उदारवादिता से राष्ठ्र्ीय आंदोलन पंगू बना और ब्रिटिश औपनिवेशिक स्वामियों के क्रूरदमन के द्वारा पीछे ठेल दिया गया।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color: rgb(153, 51, 153);"&gt;भारत छोड़ो आंदोलन का निर्माण&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सुभाषचंद्र बोस ने कांग्रेस के पुनरूत्थान के लिए कोशिश की और उसे उग्रवादी एवं समाजवादी दिशा में मोड़ने का प्रयास किया। उनने गांधी के प्रत्याशी पट्टाभिसीतारमैया को 1939 में कांग्रेस अध्यक्ष पद के चुनाच में हरा दिया। परंतु गांधी द्वारा उनके विरुद्ध प्रचार में वे ठीक से तैयार नहीं थे। कुछ महिनों बाद, उनने पद से स्तीफा दे दिया और वैकल्पिक तथा उग्र मंच तैयार किया जो स्वतंत्राता के बाद, भारत में, फार्वर्ड ब्लाक बना।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;द्वितीय विश्व युद्ध की शुरूआत ने ब्रिटिश शासन के विरूद्ध संघर्ष के लिए नई एवं दृढ़ परिस्थितियां पैदा कर दीं। 1939 और 1940 में हड़तालें एवं किसान विद्रोह तेज हो गए थे। 1941 में मलाया में इंडियन नेशनल आर्मी को जनरल मोहनसिंह ने जापानी सहायता से आरंभ किया था। वे पंजाब के सियालकोट के थे और जलियांनवाला बाग की हत्याओं और गदर पार्टी के सदस्यों की फांसी से बेहद प्रभावित हुए थे। 1943 में सुभाषचंद्र बोस ने, जो बंगाल के सशस्त्रा क्रांतिकरियों के हमेशा समीप रहे थे, इंडियन नेशनल आर्मी को अपने अधिकार में लिया और उसका नाम बदलकर ’’आजाद हिंद फौज’’ रखा। उनके ’’पूरी लामबंदी’’ के नारे को दक्षिण पूर्वी एशिया में रहने वाले 20,00,000 से अधिक लोगों का समर्थन मिला। उनकी फौज में पंजाबी, मुस्लिम, सिख और पठान पेशेवर सैनिक तामिल और मलयाली रबर बागान कामगारों के साथ मिलकर लड़े थे। आजाद हिंद फौज में बोस ने हिंदू मुस्लिम एकता और मित्राता कैसे प्राप्त हो, प्रमाणित कर दिखला दिया और महिलाओं को सार्वजनिक कामों में समुचित अधिकार के योग्य बनाया।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;1942 तक कांग्रेस दृढ़तापूर्वक काम करने के लिए मजबूर हुई और अगस्त में ’’भारत छोड़ो’’ का नारा दिया। 1942 का भारत छोड़ो आंदोलन देश के चारों ओर ज्वारभाटे जैसी शक्तिशाली लहरों की तरह फैल गया। वह अपने जद में देशभक्ति एवं देश पर मर मिटने के ज़जबे को उभारते हुए, हर तकबे के लोगों को ले आया। हिंदू महासभा जैसे अन्य संगठनों के स्वयंसेवक जिनमें भी यह सब था पर वे आम आंदोलन से दूर थे, वे लोग भी इसमें आये। उद्योगपति उत्साहित हुए और ब्रिटिश के विरुद्ध हड़ताली कार्यों को प्रोत्साहित किया।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color: rgb(153, 51, 153);"&gt;महिलाओं की भूमिका&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;भारत के स्वतंत्राता संग्राम का एक महत्वपूर्ण पहलू उसमें महिलाओं की बढ़ती हुई भागीदारी था। आर्थिक बहिष्कार आंदोलन में महिलाओं ने विशेष भूमिका निभाई और अकसर अपने पति या रिस्तेदारों से बढ़कर असहयोग आंदोलन में भाग लेतीं रहीं। कांग्रेस के जुलूसों में प्रायः बच्चों को साथ रखकर महिलाओं ने बड़े पैमाने पर भाग लिया। बंगाल के सशस्त्रा संघर्ष में उनकी भागीदारी विशेष ध्यान देने योग्य थी। सूर्या सेन के दल को उनने आश्रय दिया, संदेश वाहक के काम किये, हथियारों की रखवाली की और हाथ में बंदूक लेकर लड़ाई की। प्रीतिलता वाड्डेगर एक धावे की अगुआई करते हुए मारीं गईं थीं। कल्पना दत्त को गिरफ्तार किया गया। सूर्या सेन के साथ उन पर मुकद्मा चला और आजीवन जेल की सजा दी गई। दिसम्बर 1931 में कोमिल्ला की दो स्कूली लड़कियांे, शांति घोष और सुनीति चैधरी ने डिस्ट्र्क्टि मजिस्ट्र्ेट को गोली मारी थी। फरवरी 1932 में, बीना दास ने कांवोकेशन में डिग्री लेते समय गवर्नर पर असफल गोली चलायी थी। 1942 में जब कांग्रेस के सब नेता जेल में थे अरूणा आसफअली और सुचेता कृपलानी अच्युत पटवर्धन और राम मनोहर लोहिया एवं अन्य के साथ भूमिगत आंदोलन चलाने के लिए आगे आईं। उषा मेहता ने कांग्रेस के रेडियो को चलाने का काम किया था। कांग्रेस, समाजवादी और फारवर्ड ब्लाक के सदस्य और अन्य सशस्त्रा प्रतिरोध दल इस समय भूमिगत गुटों के माध्यम से बंबई, पूना, सतारा, बड़ौदा, गुजरात, कर्नाटक, केरल, आंध्र प्रदेश, उत्तर प्रदेश और दिल्ली के हिस्सों में क्रियाशील थे।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color: rgb(153, 51, 153);"&gt;दलित, आदिवासी और क्रांतिकारी किसान&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;भारतीय स्वतंत्राता संग्राम के अंतिम दौर ने किसान आंदोलनों को संघर्षशीलता की नई उंचाईयों तक उठते हुए देखा। 1930 के दशक में, किसान सभा क्रियाशील थी। भारत छोड़ो आंदोलन के नारे के बाद पूर्वी उत्तर प्रदेश, बिहार, बंगाल में मिदनापुर, महाराष्ट्र् में सतारा, और आंध्र, गुजरात एवं केरल में भी हर वर्ग के किसानों ने स्वतंत्राता संग्राम में भाग लिया था। यहां तक कि कुछ जमीनदार भी इस आंदोलन में शामिल हुए थे। दरभंगा के राजा किसान आंदोलन के बड़े समर्थकों में से एक थे। अपने संघर्ष में आदिवासी एवं खेतहर मजदूर खासकर वीरोचित थे। जमीनदारी प्रथा की अमानवीयता से कुचले हुए उन्हें दो संघर्ष करने पड़ेः एक, ब्रिटिश शासन से और दूसरे, जमीनदारों से जो ब्रिटिश शासन के सहयोगी थे। इन लड़ाईयों में से सबसे अधिक महत्वपूर्ण तेभागा, पुन्नपरा, वायालार, वोरवी आदिवासियों और सबके उपर तेलंगाना किसानों का वीरतापूर्ण सशस्त्रा संघर्ष हैदराबाद निजाम के विरुद्ध था। निजाम ने ब्रिटिश के साथ सहयोग किया था।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;स्वतंत्राता संग्राम के दौरान दलित और आदिवासियों के बीच समानता का मामला बार बार उभरता रहा था। दलित नेताओं में फुले, पेरियार और अम्बेडकर सबसे बड़े रूप में उभरे। गदर आंदोलन, हिंदुस्तानी समाजवादी प्रजातंत्रात्मक ऐसोशियेशन और बाद में इंडियन नेशनल आर्मी ने जाति और साम्प्रदायिक अवरोधों को तोड़ कर समानता का रास्ता बनाने में नेतृत्व किया। कांग्रेस यद्यपि कुछ सुधारों के लिए राजी थी परंतु दूर तक आगे नहीं जाना चाहती थी। विप्लव के दलित और आदिवासी नेताओं से वह कटु आलोचना पाती रहती थी। वास्तव में, स्वतंत्राता संग्राम के अग्रिम हिस्से इस निर्णय पर पहुंचे कि आधुनिक देश की तरह भारत को यदि सफल होना था तो दलित एवं आदिवासी एकता की समस्या को नकारा नहीं जा सकता था।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color: rgb(153, 51, 153);"&gt;स्वतंत्राता की ओर अंतिम धक्का&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;द्वितीय विश्व युद्ध के बाद, भारत छोड़ो आंदोलन से पैदा हुए संवेग ने सशस्त्रा कार्यवाहियों को बढ़ाया जिसने ब्रिटिश शासन को बुरी तरह कमजोर किया। विश्व युद्ध ने ब्रिटिश को भारतीय नेवी की इकाईयों की स्थापना के लिए मजबूर किया और भारत के विभिन्न भागांे से आफिसरों को सेवा में लिया। 1946 फरवरी में हड़ताल के विरुद्ध भारतीय नौसैनिकों से बुरा और भेदभावपूर्ण बर्ताव किया गया था। हड़ताल को बंबई बंदरगाह में खड़े सभी 20 जहाजों के भारतीय कर्मीदलों का समर्थन मिला था। नौसेना के 20,000 नाविक हड़ताल पर चले गए। ’’भारत की विजय’’, ’’क्रांति अमर रहे’’ और ’’हिंदू और मुस्लिम एक हों’’ उनके नारे थे। शीघ्र ही महाराष्ट्र् के थाने, दिल्ली की बैरिकों, करांची, कलकत्ता एवं विशाखापटनम में खड़े जहाजों में संघर्ष फैल गया। बंबई की फेक्टरियों के 2,00,000 कामगारों ने हड़ताल के समर्थन में औजार नीचे रख दिए। परंतु मुस्लिम लीग और जिन्ना की तरह गांधी और मौलाना आजाद सहित कांग्रेस के अन्य नेताओं ने, हड़ताल का विरोध किया। पटेल ने हड़तालियों को यह वादा करते हुए कि उनकी छटनी नहीं की जायेगी, शांत करने का प्रयास किया। परंतु पटेल का वादा आम गिरफ्तारी और पुलिस की बर्बर कार्यवाहियों को नहीं रोक पाया, जिनमें 1700 लोग की मृत्यु हुई थी।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;भारतीय नौसेना की हड़ताल ने जनता में शक्ति और साहस का संचार किया। प्रतिरोध की कार्यवाहियां गतिशील हुईं। ब्रिटिश ने साफ तौर पर अनुभव किया कि वे भारत पर और अधिक पकड़ नहीं रख सकते और बदले में भारत के बटवारे पर अपना ध्यान केंद्रित किया। इन अलगाववादी और खतरनाक षड़यंत्रों में मुस्लिम लीग सक्रिय भूमिका अदा करने की इच्छा रखती थी। स्वनिर्णय के अधिकार के बेतुके अर्थ में उस समय की कानूनी भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी जिसने अपने भूतिगत जीवन के अनेक सालों में ट्र्ेड युनियनों और किसान सभाओं को उर्जा देने की अहम भूमिका अदा की थी, ने मुस्लिम एक अलहदा राष्ट्र् था, के विचार का समर्थन किया। इस तरह मुस्लिम लीग के आग लगाउ प्रचार को सैद्धांतिक छत्राछाया उनने दी थी। इससे गदरवादियों और दूसरे कम्युनिस्ट संगठनों जो ’’दो राष्ट्र् नीति’’ के सिद्धांत के विरोध में जोरदार ढंग से लड़े थे, के बीच दरार पैदा हो गई। ट्र्ेड युनियन और विप्लववादी किसान आंदोलनों में हिंदू और मुस्लिम एकता लगभग उल्लेखनीय रही। तब भी कम्युनिस्ट पार्टी के नेता एक भारी भूल में मुस्लिम लीग की अलगाववादी नीति का समर्थन करते प्रतीत होते थे।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;स्वतंत्राता भारी कीमत पर जीती गई परंतु वह कीमत उपमहाद्वीप की जनता को उद्वेलित करती चली आ रही है। और, वह कीमत है धार्मिक विभाजन एवं असिंहष्णु प्रतिक्रियावादी आधार पर पाकिस्तान का निर्माण ।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जब हम भविष्य की ओर देखते हैं यह याद रखना महत्वपूर्ण है कि धार्मिक कट्टरता और रूढ़िवादिता के विरोध के संघर्ष में यूरोप के पुनर्जागरण ने गंभीर भूमिका अदा की थी। यह बेहद शंकास्पद है कि भारतीय उपमहाद्वीप की जनता धार्मिक अंधविश्वासों, कट्टरता और रूढ़िगत आतंकवाद के धब्बों को मिटाये बगैर, स्वतंत्राता के लाभ को पूरी तरह से उपयोग में ला सके।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यद्यपि 1947 में धर्म आधारित विभाजन की घृणा को प्रेरणावान लोग नहीं जीत सके, यह अति आवश्यक है कि विभाजन का दुख फिर से न दुहराया जा पाये। भारत का इतिहास गवाह है कि कैसे धार्मिक रूढ़िगतता और सामाजिक जड़ता को विचारवान और धर्मनिरपेक्ष ताकतों ने चुनौतियां दीं और हराया था। परंतु आज के भारत के धर्मनिरपेक्ष आंदोलन चकराये हुए हैं, आत्मविस्मृत हैं। आज कश्मीर मुख्यतया इस लड़ाई का युद्ध क्षेत्रा है। कश्मीर को इस्लामी रूढ़िवादियों एवं आतंकवादियों की घुसपैठ से बचाने में ’’धर्मनिरपेक्ष’’ भारतीय निष्क्रिय और उदासीन हैं, लोगों का प्रभाव अथवा शाबाशी पाने की लालसा में। और, न ही वे हिंदू अंध देशभक्ति या अंधकारिता के साथ इस्लामी विभाजन के कैंसर को हरा सकने की कामना करते हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;धर्मनिरपेक्ष समाज के संघर्ष का अनेक आर्थिक समस्याओं के कारण, जो हमारी प्रगति को रोकता है, परित्याग नहीं किया जाना चाहिए। दलितों, आदिवासियों और अन्य पिछड़ी जातियों की असली एकता की लड़ाई साथ साथ होना चाहिए। हम सब को वातावरण बनाने की कोशिश करना चाहिए जहां भारत के स्वतंत्राता संग्राम के महानतम नेताओं के संदेश को बड़े पैमाने पर और पहले के मुकाबले ज्यादा फैलाना चाहिए। जिससे, भूख, छतविहीनता, अशिक्षा और बीमारी के कष्ट को समूल नष्ट किया जा सके। देश की स्वतंत्राता तब तक पूर्ण नहीं होगी जब तक हम एक ऐसे देश का निर्माण न कर लें जहां जीवन स्तर खुल्लमखुल्ला उठाया जा सके। जहां आधुनिक विज्ञान के लाभ सहित सही मायने में मानवतावादी और समानतावादी समाज का वातावरण समानरूप से सबको अवसर प्रदान करने वाला हो।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3558267468781846487-3425600604955868547?l=itihaasam.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://itihaasam.blogspot.com/feeds/3425600604955868547/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://itihaasam.blogspot.com/2009/01/blog-post_2938.html#comment-form' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3558267468781846487/posts/default/3425600604955868547'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3558267468781846487/posts/default/3425600604955868547'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://itihaasam.blogspot.com/2009/01/blog-post_2938.html' title='भारतीय स्वतंत्राता संग्राम में मूल युगांतरकारी घटनायें'/><author><name>अनुनाद सिंह</name><uri>http://www.blogger.com/profile/05634421007709892634</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3558267468781846487.post-1230408345045278620</id><published>2009-01-15T05:28:00.002-08:00</published><updated>2009-01-15T05:33:00.188-08:00</updated><title type='text'>भारतीय स्वतंत्राता संग्राम के दौरान की क्रान्तिकारी रचनायें एवं अन्य ऐतिहासिक अभिलेख</title><content type='html'>&lt;span style="color: rgb(153, 51, 153);"&gt;शहीद भगतसिंह के आलेख&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;’’जीवन का ध्येय मस्तिष्क को नियंत्रित करना नहीं, उसे सामंजस्यपूर्ण ढंग से उन्नत करना है; इह जीवन के बाद मुक्ति को प्राप्त करना नहीं, उसका सर्वोत्तम उपयोग,  तो सत्य, सुंदर और अच्छाई को न केवल विचारों में खोजना है वरन् रोजमर्रा की जिंदगी में भी अनुभव करना है; सामाजिक प्रगति कुछ व्यक्तियों की कुलीनता पर नहीं वरन् जनगण की समृद्धि पर आधारित होती है; विश्वबंधुत्व तभी प्राप्त हो सकेगा जब सामाजिक, राजनैतिक और वैक्तिक जीवन में अवसर की समानता होगी।’’ - शहीद भगतसिंह, जेल दैनिदंनी।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;क्राॅति के विचार पर शहीद भगतसिंह ने अपने विचार सह-देशभक्तों को लिखे पत्रों में, अदालतों के वक्तव्यों में और दूसरी रचनाओं में समय समय पर व्यक्त कियः  यहां कुछ उदाहरण हैंः&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;..... क्राॅति का मतलब केवल उथल-पुथल या रक्तपाती मारकाट नहीं और न ही उसमें व्यक्तिगत बदला लेने का कोई स्थान है। वह कोई पिस्तौल या बम का अनुष्ठान नहीं। क्राॅति आवश्यक रूप से नये और बेहतर आधार पर समाज के पुनर्निर्माण की व्यवस्थित योजना है .....।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;..... क्राॅति  से हमारा आशय है कि वर्तमान व्यवस्था जो अन्याय पर आधारित है को बदलना ही चाहिए। किसान जो सब के लिए अनाज पैदा करता, अपने परिवार सहित भूखा रहता है; बुनकर जो दुनिया के बाजार में कपड़े की अपूर्ति करता, खुद और अपने बच्चों के शरीर को नहीं ढाॅप पाता है; राजगीर, लुहार और बढ़ई जो भव्य महलों को बनाते, झोपड़ पट्टियों में अछूतों की तरह रहते हैं .....।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;..... क्राॅति  शब्द का जिस मायने में उपयोग किया जाता है उसमें बेहतरी के लिए उत्कंठा और उर्जा की कामना होती है। सामान्यतया जनता आम वस्तुओं के स्थापित तरीके से आदी हो जाते हैं और बदलाव के ख्याल मात्रा से कांपने लगते हैं। यह एक आलस्यमयता है जिसे क्राॅतिकारी उर्जा से बदल देने की आवश्यकता है। अन्यथा, पतन होने लगता है और मानवता प्रतिक्रियावादी ताकतों के द्वारा संपूर्ण तौर पर धूलधूसरित कर दी जाती है। इस प्रकार की स्थिति मानव उन्नति को ठहराव या लकवे में बदल देती है .....। - रामानंद चटर्जी को लिखे पत्रा से।  वे माडर्न रिव्यू के संपादक थे।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color: rgb(153, 51, 153);"&gt;शहीद भगतसिंह की अन्य रचनाओं के लिए देखिएः&lt;/span&gt;  &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लेख, पत्रा, अदालत में क्राॅतिकारी वक्तव्य।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हिंदुस्तानी समाजवादी प्रजातंत्रात्मक सेना /हिसप्रस/ और शहीद भगतसिंह के अन्य सहयोगियों के अभिलेखः&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कोर्ट केसेज - ब्रिटिश सरकार के अध्यादेश, याचिकायें, संपादकियां, पार्टी घोषणा पत्रा।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;वापिसः      भारतीय स्वतंत्राता संग्राम में मूल युगांतरकारी घटनायें।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;संबंधित आलेख:      गदर आंदोलन के दस्तावेज।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3558267468781846487-1230408345045278620?l=itihaasam.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://itihaasam.blogspot.com/feeds/1230408345045278620/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://itihaasam.blogspot.com/2009/01/blog-post_3753.html#comment-form' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3558267468781846487/posts/default/1230408345045278620'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3558267468781846487/posts/default/1230408345045278620'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://itihaasam.blogspot.com/2009/01/blog-post_3753.html' title='भारतीय स्वतंत्राता संग्राम के दौरान की क्रान्तिकारी रचनायें एवं अन्य ऐतिहासिक अभिलेख'/><author><name>अनुनाद सिंह</name><uri>http://www.blogger.com/profile/05634421007709892634</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3558267468781846487.post-404242628087827189</id><published>2009-01-15T05:28:00.001-08:00</published><updated>2009-01-15T05:28:43.625-08:00</updated><title type='text'>भारतीय सामुद्रिक व्यापार पर यूरोपियन प्रभुत्व</title><content type='html'>1498 में पोर्तगीज के आने से पहले, भारतीय समुद्र में, पश्चिम में पूर्वी अफी्रका और मध्य पूर्व के बंदरगाहों और पूर्व में चीन एवं दक्षिण पूर्व एशिया के बंदरगाहों को भारतीय उपमहाद्वीप के बंदरगाहों से जोड़ने वाले सामुद्रिक रास्ते थे। इन पर किसी भी शक्ति ने एकाधिकार पाने का प्रयास नहीं किया था। मेडीटरेरियन जहां रोमन साम्राज्य के समय और उससे पहले भी, विरोधी शक्तियों ने सैन्य कार्यकलापों से सामुद्रिक व्यापार को नियंत्रित करने की कोशिश की थी; वहीं भारतीय समुद्र में शांतिपूर्ण व्यापार चलता रहा। उस समय दक्षिणी भारत और मलाबार तट के राजा वहां से गुजरने वाले जहाजों से मार्ग कर वसूल  सकते थे। जबकि अरब शासकों ने लाल समुद्र से गुजरने वाले जहाजी रास्तों को नियंत्राण में लेने की कोशिश की थी। किसी एक भी राजनैतिक शक्ति ने कोई योजनाबद्ध कोशिश नहीं की कि सामुद्रिक व्यापार जो भारतीय उपमहाद्वीप को छूता था से, सभी दूसरों को हटाया जाये।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आने वाले जहाजों से जो उंचे कर भारतीय बंदरगाह मांग सकते थे वे हमेशा के लिए ’’फ्री पोर्ट’’ को सौंप दिए गए - अर्थात् जहाजों से बहुत ही कम कर मांगने वाले बंदरगाहों को। वास्तव में, भारतीय समुद्र के अनेक बंदरगाहों में तटस्थ सत्ताएं थीं जो विविध देशों और भिन्न धर्म संबंधों के जहाजों को कर मुक्त और समुचित मार्ग मुहैया करतीं थीं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;15 वीं शताब्दी के पहले, अरब और चीनी भौगोलिक अभिलेख जहाजरानी की लम्बी यात्राओं और प्राकृतिक विपदाओं को बतलाते हैं; परंतु किसी प्रकार की राजनैतिक या सैनिक आपदा का वे उल्लेख नहीं करते, सिवाय जल-दस्सुओं की जोखिम के। इस प्रकार से मार्को पोलो, इब्नबतूता, परशियन राजदूत अब्दुर रजाक, वेनेशियन कोन्टी और जेनोआन संतो स्टेफानो जैसे सभी इतिहासकार बताते हैं कि 14 वीं और 15 वीं शताब्दियों में भारतीय समुद्र व्यापार के फलने फूलने का परिदृश्य था।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;परंतु एकबार जब पोर्तगीजों ने भारत का नया रास्ता खोज लिया और तब उन्होंने पूर्वी अफी्रका, परशियन गल्फ, भारत में सौराष्ट्र्, कोंकण तथा मलाबार प्रदेश के लाभदाई बंदरगाहों ंको हड़पने में बहुत उत्कंठा दिखलायी। 16 वीं शताब्दी के मघ्य तक, मसाले के धंधे में अर्धइजारेदारी थोप दी और नौसेना रक्षित किलेबंद बस्तियों की श्रृंखला से पोर्तगीज अपने विरोधियों को धीरे-धीरे समाप्त कर सके। पोर्तगीज ने स्थानीय व्यापारियों को सुरक्षा-पास खरीदने और तटकर देने के लिए मजबूर किया। जो भी हो, इजारेदारी के इस प्रयास को गुजराती व्यापारियों, ओमनीज ने और इक में स्थित उत्तरी सुमात्रा की समुद्री ताकतों ने ललकारा। जैसे-जैसे दक्षिण पूर्वी एशिया, चीन और जापान में पोर्तगीज ने बस्तियों का विस्तार किया, स्वयं पश्चिमी इजारेदारी को बचाये रखना कठिन होता गया।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पोर्तगीज को प्रारंभ में सफलताएं मिलीं क्योंकि वे ’’बांटो और जीतो’’ की युद्ध नीति बनाने में चतुर थे। पहले, मुस्लिम व्यापारियों को कालीकट के हिन्दू राजाओं से अलग किया। उस समय, भारतीय समुद्र का मसाले का सबसे बड़ा बाजार भारत था। तटीय महत्व के शहरों पर दो दिन बमबारी करके अपनी अग्नेय शक्ति का प्रदर्शन किया। इन भयावह तरीकों ने पोर्तगीज के पक्ष में काम किया। इस रणनीति को अन्य प्रमुख व्यापारिक केंद्रों पर भी दुहराया गया था। 1510 में, बीजापुर के आडिलशाही राजा ने गोआ का नियंत्राण पोर्तगीज को सौंप दिया। इस बात को जानकर कि भारत से बाहर जाने वाले माल का बड़ा भाग भारतीय समुद्र के तीन बंदरगाहों में उतारा जाता है-परशियन खाड़ी में हारमान, लाल सागर में अदन, और मलय प्रायदीप में मलाका, गोआ के भारतीय गवर्नर अलफेनसो अलबुकर्क ने अपना ध्यान इनमें से प्रत्येक बंदरगाह को कब्जे में लेने पर लगाया। मलाका 1511 में, हारमाज 1515 में जीत लिए गए और मात्रा अदन बच पाया था।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;1505 में, पोर्तगीज ने एशिया से यूरोप के मसाला व्यापार को ’’राजशाही इजारेदारी’’ घोषित किया। उसने इसमें सैन्य साधनों के द्वारा खसोटी गई भेंट की संभावनाएं देखीं। पोर्तगीज के राजनैतिक और सैन्य नियंत्राण एकबार हारमज और मलाका पर आये, तब उसने अपनी इजारेदारी को एशिया के अंदरूनी व्यापार तक फैलाने का प्रयत्न किया। इसके लिए उन्हें गुजरातीे व्यापारियों तक की सीधी पहुंच को रोकना आवश्यक था जो यद्यपि मलाका से कट जाते और लाल सागर से व्यापार जारी रखे रह सकते थे। 1509 की सैन्य विजय के बाद भी 20 वर्षों तक, पोर्तगीज गुजरात के बंदरगाहों पर आक्रमण करते रहे, ड्यू और ईजिप्त की जलसेना जो ड्यू के अमीर हसन की सहायता के लिए भेजी गई थी, के मिलेजुले बचाव के विरूद्ध पहले की हार के बाद। परंतु तब भी ड्यू हारा नहीं और मलिक आयाज, ड्यू का दूसरा गवर्नर, को हराने के प्रयास 1520-1521 में भी विफल हुए। 1530 में पोर्तगीज उपनिवेशकों ने काम्बे, सूरत और रनवेर के बंदरगाहों को लूटा और जलाया। गुजरात के सुलतान बहादुर ने कमजोरी के एक क्षण में बेसिन के छोटे बंदरगाह के नियंत्राण को 1534 में, त्याग दिया था। ड्यू जो दो दशकों से झगड़े में पड़ा था, अचानक असुरक्षित हो गया। मुगल साम्राट हुमांयू ने सुलतान बहादुर को हराने के लिए पोर्तगीज से सौदा कर उसे अलग कर दिया। पोेर्तगीज को उस द्वीप पर किला बनाने की अनुमति प्रदान कर दी गई जिससे 1555 तक उस क्षेत्रा पर पोर्तगीज ने पूरी तौर पर राजनैतिक नियंत्राण पा लिया। काम्बे की खाड़ी पर पोर्तगीज का नाविक नियंत्राण पूरा हुआ। उन्होंने 1559 में दमन के बंदरगाह पर भी कब्जा कर लिया। उस समय अपने विकासमय उद्योग और व्यापार के कारण भारत के सबसे धनाढय् प्रदेशों में से एक था। इस प्रकार गुजरात के व्यापारी पोर्तगीज के नियंत्राण में लाये गए और गुजरात ने अपने भाग्य को लगातार गिरते देखा।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;गुजरात में इन विजयों के साथ पोर्तगीज ने कोलम्बो को अधिकार में लिया और श्रीलंका तक कोरोमंडल तट पर मलियापुर /साओ टोम/ में बस्ती बनाकर नियंत्राण को बढ़ाया। गोआ से बंगाल तक का व्यापार कोरोमंडल की अपेक्षा अधिक लाभदायिक देखकर, उन्होंने, बंगाल की ओर अपनी लड़ाकू शक्तियों को मोड़ा। प्रारंभिक विरोध के बाद, उन्हें चिटगांव और सत्गांव /कलकत्ता के पास/ बसने दिया गया और बाद में वे हुगली नदी तक बढ़ आये। इसने उन्हें 16 वीं शताब्दी के अंत तक जब तक कि 1632 में मुगल सेनाओं ने उनको बाहर नहीं खदेड़ दिया पश्चिमी बंगाल के बाहय् व्यापार पर इजारेदारी करने में सहायता पहुंचाई। दी जिब्रा दास सीडाडस, इ फोर्टलेजास ने पोर्तगीज का भारतीय समुद्र के बहुसंख्यक बंदरगाहों /उनके अतिरिक्त जिनका पीछे उल्लेख हो चुका है/ जैसे अफ्रीका से सोने की आपूर्ति करने वाला एक बड़ा बंदरगाह मोजाम्बिक में सफाला, और उष्णकटिबंधी उत्पादों एवं मसालों के लिए महत्वपूर्ण स्त्रोत् मेंगलोर, कैम्बूर, क्रेगानूर, कोचीन और क्वालिन, के नियंत्राण का विवरण विस्तार से दिया।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ये सफलताएं प्राप्त र्हुइं क्योंकि मुख्यतया उनके पूर्ववर्ती एशियन व्यापारिक जहाजों के मुकाबले में पोर्तगीज जहाज बेहतरीन तौर पर अस्त्रा-शस्त्रा सज्जित थे। सबसे बड़ी बात, वे लोग भाग्यशाली थे कि भारतीय उपमहाद्वीप में वे उस समय  आये जब स्थानीय राजाओं के नियंत्राण से बहुत से बंदरगाह बाहर थे। यद्यपि वे राजा पोर्तगीज की बेहतर अग्निय शक्ति और बेहिचक  उपयोग के विरूद्ध मुकाबला कर सकते थे। यह इस कारण भी था कि उस समय की महान एशियन अर्थव्यवस्थायें वस्तुतः भूमि आश्रित एवं स्वाबलंबी थीं। बाहय् व्यापार, अर्थव्यवस्था का मुख्य भाग नहीं था और समुद्र-भयातुर व्यापारी वर्ग के हितों की रक्षा करना राजाआंे का क्षेम न था। जहां व्यापारी वर्ग किसी स्थानीय महत्व का था, जैसा कि गुजरात में, पोर्तगीज को बड़े अवरोधों का सामना करना पड़ा और ऐसा सुमात्रा में भी हुआ। परंतु दो दुश्मनों के बीच, उत्तर में मुगल और दक्षिण में पोर्तगीज, गुजरात के पास समर्पण के सिवाय अन्य विकल्प न था।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;दक्षिणी और पूर्वी भारतीय तट के छोटे और कमजोर व्यापारी मध्य एशिया के व्यापार से पूरी तरह नष्ट कर दिए गए और फिर वे कभी भी पुनर्जीवित होने के लायक नहीं रह गए। दूसरे, जो जिंदा रह पाये वे पोर्तगीज की शर्तों और सुरक्षित रास्तों के लिए मांगी गईं सौगातों के बल पर रहे। तब भी, भारत क दूसरे और कुछ गुजराती व्यापारियों /और उनके दूसरे पक्ष-पूर्वी अफ्रीका, मध्य पूर्व और इंडोनेशिया/ ने पोर्तगीज इजारेदारी को बड़ी कोशिशों से, ऐसे छोटे बंदरगाहों का उपयोग करके जो पोर्तगीज उपनिवेशन से स्वतंत्रा थे, दरकिनार किया। इसके साथ गुजराती व्यापारियों ने जहाजी बेड़ों को अस्त्राशस्त्रा सज्जित करने की पोर्तगीज प्रथा का अनुकरण उनके आक्रमणों का प्रतिकार करने के लिए किया ।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जो भी हो, लाभ का बड़ा भाग पोर्तगीज को जाता था। वे इंडोनेशिया को भारतीय वस्त्रा उंचे दाम पर जहाज से भेजते और वापसी में, योरप के लिए, बहुमूल्य मसाले ले आते थे। इस धंधे का लाभ अन्य प्रतिद्वंदियों को खींच ले आया। फ्रेंच के जल्दी ही बाद पहले डच फिर ब्रिटिश आये। 1656 में, कोलंबो डच को मिला, 1663 में, पोर्तगीज ने डच के हाथों कोचीन खोया। ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी के साथ की प्रतिद्वंदिता ने हरमिज को खो जाने पर मजबूर कर दिया।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बहुत शीघ्र डच, और बाद में अंग्रेजों ने पोर्तगीज की इजारेदारी को अपनी इजारेदारी में बदलने का प्रयत्न किया। मुख्य व्यापारिक मार्ग पर पहले के पोर्तगीज व्यापारिक बुर्ज के स्थान पर अपने प्रतिद्वन्दियों को किले बंद बस्तियां बनाने में अगुआई की थी। शुरूआत में ब्रिटिश और फ्रंेच प्रतिद्वन्दियों के मुकाबले डच ज्यादा सफल हुए दिखे। इंडोनेशिया में डच अपनी अग्रता की स्थापना में सफल हुए और एकबार जब पोर्तगीज को पछाड़ चुके तो सिंध और गुजरात के बाहर जहाजरानी में वे प्रबल हो गये। अब, अधिकांश भारतीय जहाजों पर डच अपनी इच्छा लादते और कर वसूलते जो पहले पोर्तगीज द्वारा लगाये गए थे।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सूरत 1612, मद्रास 1639, बंबई 1668, पांडेचेरी 1674 और कलकत्ता 1698 ने धीरे धीरे गोआ को नीचे दिखलाया और भारत-यूरोपियन व्यापार के मुख्य केंद्र बन गये। तो भी, भारत में /और दूसरे यूरोपियन/ जहाज बनाने का उद्योग फलता फूलता रहा क्योंकि भारत में बने जहाज प्रायः यूरोप में बने जहाजों की गुणवत्ता और कारीगरी में समान और कभी कभी उनसे भी आगे होते थे।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;भारतीय निर्माताओं से प्रभावित /खासकर वस्त्रा उद्योग/ और अपने व्यापार से उसे वदल लेने के लिए डच और ब्रिटिश व्यापारियों ने, न केवल, अपनी तटीय नई बस्तियों में वरन् देश के भीतरी भाग में भी, कारखाने स्थापित किए। गुजरात में अहमदाबाद और भरूच जैसे बुनाई के कंेद्रों में ही नहीं बल्कि भीतरी भाग जैसे लाहौर, आगरा और बुरहानपुर में कारखाने लगाए। बाद में पटना की तरह ढाका, बालासोर, पिपली और मछलीपटट्म ने उनका ध्यान खींचा। इस प्रकार से डच और ब्रिटिश व्यापारियों ने लाभ का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा रखा जो अन्यथा भारतीय दलालों को मिलता। इंडोनेशिया में डच द्वारा निर्माण और व्यापार के वाणिज्यिक केंद्र स्थापित किए गए।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;औपनिवेशिक शासन की ओर अग्रेशित काल में, यद्यपि यूरोपियनों के उद्योग नाटकीय ढंग से बढ़े और यूरोप में उत्पन्न राजस्व का लगातार कम होता कुछ हिस्सा भारतीय या इंडोयेशियन कुशल और औद्योगिक कामगारों तक भी पहुंचा।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;फिर भी डच और ब्रिटिश व्यापारी भारत में सीमित राजनैतिक नियंत्राण से कुशल कारीगरों के दाम पूरे तौर पर नियंत्रित नहीं कर पा रहे थे और कर अधिकारियों और व्यापारियों को स्थानीय कारखानों के मालिकों से कुछ कुछ आदरपूर्ण व्यवहार करना पड़ता था। यूरोपियन व्यापार के साथ भारत प्रभावशाली संतुलन बनाये रहा और यूरोपियन व्यापारी मूल्यवान धातु  /मुद्रा/ की सतत् आपूर्ति से इस व्यापारिक अंतर को पूरा करने के लिए मजबूर होते रहे। जहां तक भारतीय उपमहाद्वीप को यूरोपियन व्यापारी सोना और चांदी पहुंचाते रहे, भारतीय राजे महराजे यूरोपियन व्यापारियों को सहते रहे। यूरोपियन व्यापारी  अपनी उपस्थिति का विस्तार करते रहे और भारत में अपनी गतिविधियों पर राज्य के  नियंत्राण को कुशलतापूर्वक रोकते रहे।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कुछ समय तक संतुलन बना रहा परंतु यूरोपियन व्यापारिक कंपनियां अपनी लगातार बढ़ते सैन्य बल के प्रदर्शन द्वारा मोल भाव करने की शक्ति को बढ़ाते रहे। भारतीय शासकांे के हिस्से की कोई भी कमजोरी की जांच-पड़ताल करते हुए वे अपनी शक्ति का निरंतर परीक्षण करते रहे। 1691 में, यहां तक कि मुगल सल्तनत को ईस्ट इंडिया कंपनी ने ललकारने की कोशिश की परंतु औरंगजेब की सैनाओं से हार गए और यूरोपियन व्यापारियों को जो कुछ भी प्राप्त हो चुका था उससे अधिक छूट देने के पक्ष में वह नहीं था।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;परंतु एकबार मुगल साम्राज्य विघटित होना शुरू हुआ और अब वह समय आ गया था जब भारतीय समुद्र व्यापार पर छाईं र्हुइं यूरोपियन शक्तियों में से कोई एक विस्तार का रास्ता पायेे। भारत पर शासन करने की लड़ाई को अपने यूरोपियन प्रतिद्वन्दियों को दरकिनार करते हुए विजयी ब्रिटिश ही थे जिनने एशिया और अफ्रीका में उपनिवेशन के लिए और प्रदेश पा लिए थे।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;भारत के उपनिवेशन के बाद बर्मा, इंडोचायना, मध्य पूर्व और संपूर्ण अफ्रीका का उपनिवेशन हुआ। यूरोपियन उपनिवेशन के नीचे चीन का सामुद्रिक क्षेत्रा आया। बीसवीं शताब्दी के आरंभ में संयुक्त राज्य औपनिवेशक शक्ति के रूप में उदित हुआ जब उसने फिलीपींस और कैरेबियन में स्पेनिश कालोनियों को अपने अधिकार में ले लिया।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इस प्रकार समुद्र के अस्त्राशस्त्रा विहीन स्वतंत्रा व्यापार के विरूद्ध शुरू हुए युद्ध ने अंत में, पश्चिमी यूरोपियन और अमेरिकन शक्ति ने पृथ्वी का अधिकांश भाग अपने आधीन कर लिया। संपदा का विशाल और अभूतपूर्व बहाव यूरोप और उत्तरी अमेरिका को उपनिवेशनों से प्राप्त हुआ। एक शताब्दी तक भारतीय समुद्र में क्रियाशील अधिकांश स्थानीय व्यापारियों से पोर्तगीज सौगातें बटोरते रहे। इसके बाद एक काल डच उपनिवेश का आया, यद्यपि कुछ समयकाल प्रतिस्पद्र्धात्मक व्यापार का था जब अन्य यूरोपियन प्रतिद्वदियों ने पोर्तगीज /बाद में डच/ को निकाल बाहर करने का यत्न किया। परंतु अंत में, ब्रिटेन ही था जिसने सबसे बड़ा उपहार जीता। भारत के दो तिहाई पर प्रत्यक्ष औपनिवेशिक शासन और शेष एक तिहाई पर अप्रत्यक्ष शासन, बड़े पैमाने पर डच और पोर्तगीज की विशाल सौगातें खींचते हुए, कायम किया ।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;परंतु, अभूतपूर्व दरिद्रता और गरीबी की ओर एशिया और अफ्रीका को ठेल दिए जाने के साथ उत्तरी अमेरिका और यूरोप ने संस्कृति, तकनीक और विज्ञान की आश्चर्यजनक उन्नतियों को देखा। पश्चिम की विस्मयकारी जीत उपनिवेशित जनता के लिए अपार दुख और अग्निपरीक्षा दोनों की कारक बनी। इतिहास की इस दुखद द्वन्दात्मकता की उपेक्षा न करना ही महत्वपूर्ण है कि ’’पश्चिमी सभ्यता’’ के आधार और जिंदा रहने के साधन पूर्व और दक्षिण एशिया से आया हुआ बेशुमार धन ही था।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पश्चिम के ’’स्वतंत्रा व्यापार’’ के विजेता को स्मरण रखना चाहिए कि भारतीय समुद्र  के स्वतंत्रा व्यापार को खत्म करने वाले शस्त्रों से सज्जित और दृढ़ इच्छा शक्ति वाले ’’यूरोपियन इजारेदार व्यापारी’’ ही थे। दूसरे अन्य कोई नहीं। तोप के गोले से संरक्षित व्यापार ’’फ्री’’ या ’’फेयर’’ व्यापार नहीं था। शुरूआत से ही पश्चिम के दक्षिण और पूर्व के साथ संबंध थे और आज तक पश्चिम अपने व्यापार के प्रतिबंधों को नीचा नहीं करना चाहता जबकि वह ’’फ्री ट्र्ेड’’ की शिक्षा शेष दुनिया को देता रहता है।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3558267468781846487-404242628087827189?l=itihaasam.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://itihaasam.blogspot.com/feeds/404242628087827189/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://itihaasam.blogspot.com/2009/01/blog-post_1030.html#comment-form' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3558267468781846487/posts/default/404242628087827189'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3558267468781846487/posts/default/404242628087827189'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://itihaasam.blogspot.com/2009/01/blog-post_1030.html' title='भारतीय सामुद्रिक व्यापार पर यूरोपियन प्रभुत्व'/><author><name>अनुनाद सिंह</name><uri>http://www.blogger.com/profile/05634421007709892634</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3558267468781846487.post-917173243596026960</id><published>2009-01-15T05:26:00.000-08:00</published><updated>2009-01-15T05:27:56.540-08:00</updated><title type='text'>भारतीय संस्कृति एवं सभ्यता के लिए आदिवासी योगदान</title><content type='html'>भारतीय संस्कृति और सभ्यता के सब ओर आदिवासी परंपरायें और प्रथायें छाईं हुईं हैं फिर भी, इस तथ्य की जानकारी आम लोगों में नहीं है। भारतीय दर्शनशास्त्रा, भाषा, एवं रीतिरिवाज में आदिवासियों के योगदान के फैलाव और महत्व को अक्सर इतिहासकार और समाजशास्त्रिायों के द्वारा कम करके आंका और भुला दिया जाता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यद्यपि बौद्धधर्म संबंधी सामान्य भ्रांतियों ने उसके मानवीय पक्ष की प्रेरणा एवं मौलिक स्त्रोत् को ढांप लिया है। भारत के प्राचीन आदिवासी समुदायों को गौतमबुद्ध बतौर नमूने समाज के सामने पेश करते हुए, उनकी पक्षधरता रखते थे। निजी संपत्ति की लालसा, गरीबी, सामाजिक शोषण और अंतहीन युद्धों के कारणों से दुखी हो, गौतम बुद्ध ने आदिवासी गणतंत्रों में समाज के लिए आशा देखी जो अभी तक जाति-भेदभाव और बलशाली कानून के प्रभाव में नहीं आये थे। प्रारंभ के बौद्ध संघ भी, आदिवासी सामाजिक पारस्परिकता के नमूने थे। वे लेंगिक समानता और सभी के लिए आदर पर जोर देते थे। बौद्ध संघ के लोग भी अपने समानता के दृष्टिकोण और प्रजातंत्रात्मक कार्य प्रणाली के लिए प्रचार-प्रसार करते थे।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उस समय आदिवासी गणतंत्रों ने सामाजिक समता के अनेक स्वरूपों को बचा रखा था जो शोषण और व्यवसायिक गिरावट के बुरे प्रभावों से मुक्त थे। आदिवासी समाज का गठन जीव के सभी रूपों, पौधों तथा वृक्षों के लिए आदर और समानता के आधार पर होता था। उनमें मानव समाज एवं प्रकृति की पारस्परिकता की गहरी समझ थी। विशेष कार्यक्रमों में सामाजिक जरूरतों के योगदान के अनुसार लोगों को सम्मान और पद दिया जाता था। धार्मिक अनुष्ठान में गुरू या वैद्यराज को बहुत आदर दिया जाता था परंतु जैसे ही यह कार्य संपन्न हुआ कि वह धर्मगुरू या वैद्य हर एक के लिए सामान्य हो जाता था। उच्च कोैशल या ज्ञान, उंचे पद को प्राप्त नहीं कर पाता था। इसका अर्थ है कि कोई व्यक्ति या छोटा-समूह किसी प्रकार की प्रभुसत्ता या वंशानुगत स्वामित्व को हासिल नहीं कर पाता था।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यह मूल्य-पद्धति उस समय तक बनी रही जब तक कि आदिवासी समुदाय धन-अलोलुपी रहा और समुदाय के समस्त उत्पादनों का आपस में हिस्सा-बांट होता रहा। श्रम विभाजन था। सामाजिक कार्य बिना किसी भेदभाव या पक्षपात के सहकारिता और सहसमानता के आधार पर किया जाता था।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;गौतमबुद्ध को सहजता, प्रकृति-प्रेम और वस्तुओं या धन के प्रति अलोलुपता तथा सामुदायिक जाति समन्वय ने आकर्षित किया ओैर इन्हीं सबने उनकी शिक्षाओं पर बड़ा प्रभाव डाला।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;तब भी, ज्यों ज्यों आर्थिक संपदा बढ़ी जनजाति समुदाय लगातार दवाब में बने रहे और वस्तु-विनिमय को अधिकाधिक आसान बनाते रहे। व्यापार के मामले में, आदिवासियों ने उच्चकोटि के सम्मान का तरीका अपनाया। सभी समझौतों का वे सम्मान करते थे। जाति के एक व्यक्ति के द्वारा भी किए गए अनुबंध का सम्मान संपूर्ण जाति के लोग करते थे। बेईमान या धोखेबाज व्यक्ति को जनजाति द्वारा गंभीर सजा दी जाती थी। जनजाति के सम्मान के उल्लंघन की दशा में व्यक्ति को निर्वासन भुगतना पड़ता और उसके परिवार के सदस्यों को सजा के दौरान सामुदायिक कार्यकलापों में भाग लेने के अधिकार से वंचित होना पड़ता था। परंतु प्रायः जनजाति की सत्यनिष्ठा को क्षति पहुंचाई जाती थी। आदिवासियों से व्यापार करने वाले गैर-आदिवासी उनके वादों से विश्वासघात करते और जनजाति के अधिकांश लोगों की  ईमानदारी एवं सच्चाई का अनुचित लाभ उठाते थे।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जनजाति समुदाय अनेक कारणों के दवाब में आये। वाणिज्य के फैलाव, उनकी भूमि पर सेनाओं के आने जाने और उनके बीच ब्राहम्णों के पुनर्वास ने दवाब डाला। जनजाति के प्रमुख सदस्यों को हिंदू समाज की ’’मुख्य धारा’’ में लाने में सैद्धांतिक मानमनौअल एवं धमकी का सहारा लिया जाता था। इसने अनेक जनजाति समुदायों को ’’जाति’’ के नाम पर हिंदुओं में समाहित किया और जिन समुदायों ने विरोध किया उन्हें निर्जन स्थानों, पहाड़ों या जंगलों में खदेड़ दिया। सबसे खराब दशा तब हुई जब हारे हुए आदिवासियों को समाज के किनारों पर धकिया दिया और वे इस तरह से अपने ही समुदाय से बाहर होकर ’’अछूत’’ बने।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;समय बीतते बीतते जनजाति समुदायों के भीतर स्वेच्छिक भेदभाव पैदा हुए जिसने उनको एकीकृत हिंदू समाज में बिना किसी हिंसा या बल प्रयोग के असमान जाति बना दिया। मध्य भारत में, जनजाति समुदायों में से शासक राजकुल भी पैदा हुए।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पूरे देश में अंतिम परिणाम यह था कि जनजाति समुदाय के देवीदेवता और रीतिरिवाज, भ्रांतियों के प्रादुर्भाव, धार्मिक संस्कार और अनुष्ठान ’’हिंदू’’ समाज की वृहत धारा में प्रवेश पा गए। आदिवासी परंपराओं में पुरखों की पूजा, प्रजनन शक्ति के देवी देवताआंे, यहां तक कि नरनारी प्रजनन अंग प्रतीकों की आराधना, गृहदेवता की पूजा आदि सब ने प्रभाव जमाया। जिस प्रथा को आज हिंदूवाद या हिंदूधर्म कहते हैं उसमें उन सब ने अपना रास्ता बना लिया। ’’व्रत’’ रखने की बड़े पैमाने पर फैली हुई भारतीय प्रथा अर्थात् मनोकामना प्राप्ति या नैतिक शुचिता के लिए रखा गया उपवास, भी आदिवासी मूल से ही है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;महादेवी श्वेतादेवी ने बतलाया है कि शिव और काली जनजाति के मूल से हैं जैसे कि कृष्ण और गणेश। 8 वीं शताब्दी में जनजाति की वनदेवी या कटाई की देवी को शिव की पत्नि के तौर पर माना गया था। हाथियोें को प्रशिक्षित करने वालों की जनजाति से ही गणेश का उद्गम है जिनका हिंदू समाज में /हाथी-चिन्ह/ देवतुल्य प्रवेश हुआ था। महाराष्ट्र् के ब्राहम्ण-वशों के अध्ययन में कौशाम्बी ने बतलाया कि अनेक ब्राहम्णों के गोत्रा जैसे ’कश्यप’ जनजाति ’कच्छप’ /कछुआ/ प्रतीक से बना है। राजस्थान में राजपूत शासकों ने आदिवासी भील मुखियों को मित्रावत् स्वीकार किया। कुछ राजपूतों के राज्याभिषेक में उन्हंे मुख्य भूमिका का अधिकार भी प्राप्त है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;संस्कृत और पाली के साथ आदिवासी भाषाओं के घुलन-मिलन के परिणाम स्वरूप भारत की क्षेत्राीय भाषाएं पैदा हुईं जैसे उड़िया, मराठी या बंगाली और भारत की सभी भाषाओं ने आदिवासी भाषाओं के शब्दों को स्वीकार किया।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आदिवासियों ने विभिन्न पौधों और उनके औषधिक उपयोगों का ज्ञान प्राप्त कर लिया था और आयुर्वेदिक दवाईंयों की उत्पत्ति में बहुमूल्य योगदान दिया। हाल ही के अध्ययनों में, आॅल इंडिया कोआरडिनेटेड रिसर्च प्रोजेक्ट ने पशुओं के स्वास्थ्य एवं मानवीय घाव-भरण के उपयोग में आने वाली 7,500 प्रजातियां आदिवासियों के 9,000 पौधों की प्रजातियों के संचित ज्ञान में से हैं मानकर, सम्मान किया है। दांतों की सुरक्षा के लिए दातुन, जड़ें एवं मसाले, हल्दी का रसोई में उपयोग, और मलहमों की खोजें आदिवासियों की ही हैं जैसे कि अनेक फल और लतायें हैं। जोड़ों की बीमारी और रतौंधी के उपचार का मूल आदिवासी ज्ञान में है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कृषि उन्नति के लिए आदिवासियों ने महत्वपूर्ण काम किये हैं यथा अदल-बदल फसलें उगाना, उर्वरकता बनाये रखने के लिए वैकल्पिक फसलें और जमीन परती छोड़ना या उसका चारागाही उपयोग के द्वारा। उड़ीसा के आदिवासी चांवल के अभिरंजक पैदा करने में सहायक रहे।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आदिवासी वाद्ययंत्रा जैसे बांसुरी और ढोल, जनकथायें, नाच और ऋतु समारोहों ने भारतीय रिवाजों में, धातुविज्ञान की कुशलताओं एवं ललित कलाओं की ही तरह से ही जगह बनाई है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;भारत के मध्य भाग में आदिवासी समुदाय महत्वपूर्ण उंचाईयों तक उठे और खुद के शासक कुलों को पैदा किया। शुरूआती गांेड़ राज्य 10 वीं शताब्दी से प्रगट हुए और गोंड़ राजे 18 वीं शताब्दी तक अपना स्वतंत्रा अस्तित्व बनाये रख सके यद्यपि उन्हें मुगल साम्राज्य के प्रति निष्ठा के लिए मजबूर किया जाता था। गढ़ मंडला राज्य ने उत्तर में उपरी नर्मदा घाटी के अधिकांश तथा आसपास के जंगली भूभागों पर नियंत्राण फैला लिया था। जहां उपरी बैनगंगा घाटी के अधिकांश पर देवगढ़-नागपुर राज्य प्रभुत्व जमाये था वहीं पर दक्षिण में वर्धा की सीमा के चारों ओर एवं बैनगंगा तथा पेनगंगा के संगम पर, चांदा-सिरपुर।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;गढ़ मंडला राज्य के बड़े कंेद्रों में से जबलपुर एक था और वहां बड़ी और राजकुलीन राजधानियों की तरह ही एक बड़ा किला और महल था। गोंड़ राजशाहियों के दौरान बहुत ही बारीक नक्काशी तथा मिथुन मूर्तियों के साथ मंदिर और महलों का निर्माण हुआ। चंदेल राजाओं के साथ गोंड़ शासक कुलों का घनिष्ठ संबंध रहा और दोनों चतुराईपूर्ण समझौतों के माध्यम से मुगल राज्य से अपनी स्वतंत्राता बचाये रखने में प्रयासरत रहा करते थे। जबलपुर की रानी दुर्गावती, चंदेल-गोंड़ कुल परंपरा, ने पौराणिक कथाओं में सम्माननीय स्थान प्राप्त किया। उसने मुगल आक्रमणों के विरूद्ध लड़ाई में रक्षा करते हुए वीरगति पाई थी। 18 वीं शताब्दी की शुरूआत में नागपुर शहर गोंड़ राजा के द्वारा बनाया गया था।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color: rgb(153, 51, 153);"&gt;स्वतंत्राता संग्राम और आदिवासी&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पूर्वी भारत को ज्योंहि ब्रिटिश शासकों ने लिया, विदेशी शासन को चुनौति देते हुए जनजाति-विद्रोह भड़क उठे थे। उपनिवेशन के शुरूआती दिनों में, भारत के अन्य किसी भी समुदाय ने ब्रिटिश शासन को वीरतापूर्वक यदि अवरोध दिया था तो वे आदिवासी समुदाय ही थे और उसके बदले में दुखद परिणामों को, अब के झारखंड़, छत्तीसगढ़ एवं उड़ीसा और बंगाल के आदिवासियों ने ही भुगता। 1772 में, पहाड़िया विद्रोह भड़क उठा था। उसके बाद पांच वर्षीय उपद्रव तिलक मांझी के नेतृत्व में जिसे 1785 में भागलपुर में फांसी पर लटका दिया था, भड़का था। बाद में तमार और मुण्डा विद्रोह हुए। आगे के 20 वषों में सिंगभूम, गुमला, बिरभूम, बांकुरा, मानभूम और पालामउ में विद्रोह हुए। 1832 में कोल विद्रोह, खेबार एवं भूमिंग विद्रोह 1832-1855 में हुए। 1855 में कार्नवालिस की स्थाई बस्तियों के खिलाफ संथालों ने युद्ध किया और एक वर्ष बाद असंख्य आदिवासियों ने 1857 के स्वतंत्राता संग्राम में मुख्य भूमिका निभाई।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;परंतु 1858 की पराजय ने देश की संपदा और स्त्रोत्ों के ब्रिटिश शोषण को और भी गहरा बना दिया। 1865 में वन कानून पारित किया जो ब्रिटिश सरकार को वृक्षों या झाड़ियों वाली किसी भी भूमि को सरकारी जमीन घोषित करने और उसके व्यवस्थापन के कानून बनाने का अधिकार देता था। वन और भूमि के उपयोग करने वाले आदिवासियों के अधिकारों के संबंध में कोई उपबंध उस कानून में नहीं था। 1878 में उससे बड़ा ’इंडिया फारेस्ट एक्ट’ पारित किया जो संरक्षित एवं सुरक्षित जंगल तथा उसके उत्पादों पर आदिवासियों के अधिकार पर कठोर रूकावटें थोपता था। उस कानून ने आदिवासी समुदायों की परंपरागत संपत्ति के स्वरूप को मूलभूतरूप से बदल दिया और उसे राज्य की संपत्ति बना दिया।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ब्रिटिश शासन के आदिवासी प्रतिरोध के लिए सजास्वरूप ’’दी क्रमिनल ट्र्ाईब एक्ट’’ 1871 में आदिवासी समूहों को कलंकित करते हुए एक तरफा पारित किया और आदिवासियों को जन्मजात अपराधी घोषित किया गया। ब्रिटिश हित में आदिवासियों को बड़ा दुश्मन माना गया था।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;झारखंड पट्टे में, आदिवासी विद्रोहों को सैनिक टुकड़ियों की बड़ी कार्यवाही के द्वारा दबाया। ब्रिटिश शासन और उसके स्थानीय प्रतिनिधियों के खिलाफ 18 वीं शताब्दी के अंत के संघर्षों में खेरबार विद्रोह और बिरसा मुण्डा के आंदोलन बड़े महत्व के थे। बिरसा मुण्डा का लम्बा संघर्ष ब्रिटिश नीतियों की ओर उन्मुख था। ये नीतियां जमीनदारों और सूदखोरों को आदिवासियों का शोषण करने की अनुमति देतीं थीं। 1914 में, जात्रा उरांव ने ताना आंदोलन शुरू किया जिसमें 25,500 से अधिक आदिवासियों ने भागीदारी की थी। 1920 में ताना उरांव आंदोलन ने देशव्यापी सत्याग्रह आंदोलन को अपनाया और औपनिवेशिक सरकार को लगान देना बंद कर दिया था।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ब्रिटिश राज्य के दौरान उड़ीसा में कई विद्रोह हुए जिसमें स्वाभाविकरूप से आदिवासियों की मुख्य भागीदारी थी। 1817 का पैक विद्रोह: 1838 से 1856 का घुमसर विद्रोह  और 1857-1864 का संबलपुर विद्रोह विशेष विद्रोहों में से थे।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आंध्र प्रदेश के पहाड़ी आदिवासी क्षेत्रों में अगस्त 1922 में विद्रोह हुआ था। अल्लुरी रामचंद्रा राजू /सीताराम राजू/ के नेतृत्व में आंध्र पहाड़ियांे के आदिवासियों ने ब्रिटिश को बड़े पैमाने पर गौरिल्ला युद्ध मे घसीट लिया था। असफल होने पर, ब्रिटिश उनको कुचलने के लिए मलाबार स्पेशियल फोर्स ले आये और वे तब ही सफल हो सके जब अल्लुरी राजू वीरगति को प्राप्त हुआ था।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जैसे जैसे स्वतंत्राता संग्राम फैला, संघर्ष के हर क्षेत्रा में, संग्राम ने आदिवासियों को अपने में खींचा। अनेक खेतहर मजदूर और बहुत दबाये गए आदिवासी उच्च जाति के स्वतंत्राता संग्रामियों से जुड़ते गए इस भरोसे के साथ कि ब्रिटिश की हार के बाद नया और प्रजातंत्रात्मक युग पैदा होगा।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;स्वतंत्राता के 50 वर्षों बाद, दुर्भाग्य है कि देश की स्वतंत्राता से दलित और आदिवासी सबसे कम लाभांवित हो पा सके। यद्यपि स्वराज्य से भारतीय जनता के बड़े भाग के लिए विस्तृत लाभ मिले हैं पर दलित और आदिवासी इनसे बाहर ही छूटे रहे और देश की आदिवासी जनता के लिए नई नई समस्यायें उत्पन्न हो गईं। 1947 की आबादी की तुलना में जनसंख्या के तिगुने होने से जमीन के स्त्रोत्ों पर बड़ा हुआ दबाव, जंगली क्षेत्रों से विशेष मांगें, खदानंे और जल स्त्रोत्ों ने आदिवासी जीवन में लूट मार मचा दी। अपनी परंपरागत भूमि से आदिवासियों को गैरसामंजस्यपूर्ण संख्या में हटा दिया गया जबकि अनेकों ने देखा है कि उनके पारंपरिक स्त्रोत्ों को जंगल माफिया और घूसखोर अधिकारियों ने हड़प लिया। माफिया और अधिकारियों ने गैरकानूनी व्यापारिक लीजों पर हस्ताक्षर किए जोकि संविधान द्वारा स्वीकृत आदिवासी अधिकारों के विरूद्ध हंै।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यह देखना बचा है कि झारखंड और छत्तीसगढ़ राज्य बनने से भारत के आदिवासियों की दशा में क्या बदलाव आता है। जो भी हो, यह बहुत जरूरी है कि आदिवासी समुदायों की शानदार धरोहरों का संरक्षण एवं लेखन के अवसर, प्रदूषणरहित उपयोग, सहभागितावाली वन-व्यवस्थापनायें और संरक्षण योजनायें, अनिवेषण संस्थान और पाठशालाओं में निवेश के संबंध में केन्द्रीय सरकार के द्वारा विशेष ध्यान दिया जाना अत्यावश्यक है। शैक्षणिक, सांस्कृतिक और आर्थिक अवसरों में आदिवासियों को विशेष प्राथमिकता मिलना चाहिए जिससे आदिवासियों द्वारा सहे गये पहले के अन्याय और उपनिवेशन के प्रभावों का प्रतिकार किया जा सके।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आदिवासी सामुदायिक व्यवहारों की सुंदरता, उनकी मिल-बांटने एवं सब के लिए आदर की संस्कृति, गूढ विनम्रता, प्रकृति प्रेम और सबसे उपर उनकी समानता तथा नागरिक समन्वय की गहन अनुरक्ति से देश बहुत कुछ सीख सकता है।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3558267468781846487-917173243596026960?l=itihaasam.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://itihaasam.blogspot.com/feeds/917173243596026960/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://itihaasam.blogspot.com/2009/01/blog-post_6881.html#comment-form' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3558267468781846487/posts/default/917173243596026960'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3558267468781846487/posts/default/917173243596026960'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://itihaasam.blogspot.com/2009/01/blog-post_6881.html' title='भारतीय संस्कृति एवं सभ्यता के लिए आदिवासी योगदान'/><author><name>अनुनाद सिंह</name><uri>http://www.blogger.com/profile/05634421007709892634</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3558267468781846487.post-5330372075656822566</id><published>2009-01-15T05:24:00.000-08:00</published><updated>2009-01-15T05:26:14.341-08:00</updated><title type='text'>भारतीय लोक चित्रकला</title><content type='html'>&lt;span style="font-weight: bold;"&gt;आलेखः जगदीश &lt;/span&gt;&lt;span style="font-weight: bold;"&gt;मिततल&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;भारतीय पारंपरिक लोक चित्राकला की प्रदर्शनी की योजना पर 50 वर्षों पूर्व विचार करना असंभव लगता था। उस समय देश के अनेक प्रदेशों के लोकचित्रा अनजान थे और जो थोड़े बहुत ज्ञात भी थे उन्हें संग्रहालयों और विथियों तक पहुंचने का रास्ता उपलब्ध न था। भारत के विभिन्न प्रदेशों के मानव विज्ञान एवं लोक साहित्य के विद्यार्थियों ने दूरदराज के क्षेत्रों की चित्राकला या अन्य कला अभिव्यक्तियों तथा हस्तकौशलों की समीक्षा अथवा उन पर प्रकाश डालने के मूल्य को नहीं आंका था। धर्म यात्राओं के केद्रों और गांवों में बनाये गए चित्रों को ’’आदिम’’ कहा गया था।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;वास्तव में, 20 वीं शताब्दी की शुरूआत से भारतीय दृष्टिकोण से लोक चित्राकला की प्रशंसा की जाने लगी। इसके पूर्व ब्रिटिश कला प्रेमियों और मर्मज्ञों की स्पर्धा में भारत में पारखियों ने केवल मुगल चित्राकला की प्रशंसा की। और यह 1916 का समय था, जब आनंदकुमार स्वामी ने राजस्थानी और पहाड़ी चित्रों को सम्मान दिया। यद्यपि मुगलकाल के परिष्कृत काम की तुलना में ये चित्रा सामान्य एवं लोक कलात्मक ही थे परंतु उनकी सौम्यता ज्यादा युक्तियुक्त थी और आनंदकुमार स्वामी द्वारा उत्साहपूर्वक व्याख्यिातित की गई थी। उनके लेखन कार्य ने भारत के सभी लालित्यरूपों के मूल्यांकन में महत्व पैदा किया और पश्चिम में भारतीय चित्राकला के महत्व को दृढ़ता से जमाया जा। इसके पश्चात् अन्य कारकों ने कला प्रेमियों को ग्रामीण चित्राकारों की अभिव्यक्तियों की ओर दृष्टिपात करने के लिए प्रेरित किया।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;शुरूआत में, लोक चित्राकला की खोज बंगाल तक ही सीमित थी। यह इस प्रकार कि 1900 वीं सदी में यूरोप की ’’आधुनिक कला’’ के परिदृश्य के महत्वपूर्ण परिवर्तनों को बंगालियों ने सबसे पहले महसूस किया था। फ्रांस और जर्मनी में तत्कालीन यूरोपियन चित्राकारों के कार्य ने यूरोपियन कला क्षेत्रा में क्रांति का सृजन किया। आधुनिक चित्राकारों ने परिदृश्य का त्याग कर दिया था, रंगों का उपयोग उनके या सांकेतिक उद्देश्य के लिए ही किया और मनुष्य आकार को स्वतंत्रातापूर्वक परिष्कृत किया या तोड़ा मरोड़ा। उन्होंने सघन सरलीकरण को उद्देश्य बनाया और स्वाभाविकता का परित्याग किया अमूर्त या ज्योमिति के पक्ष में। ये परिवर्तन एक ओर अफ्रीकन मूर्तिकला की खोजी गई प्रतिक्रियास्वरूप थे और दूसरी ओर जापानी लकड़ी के छापे थे। जैसा श्रीमती आर्चर ने बतलायाः बंगाल की ख्यात् चित्राकला, इस संबंध में, नीग्रो मूर्तिशिल्प से भिन्न प्रतीत नहीं होती और यह तीव्र देशभक्ति की मनोदशा में सुनिश्चित बंगाली लेखकों, आलोचकों और चित्राकारों ने कालीघाट की चित्राकला के उत्थान में शुरू किया और उसी समय ग्रामीण चित्राकला के विशेष रूपांकन को ढ़ूंढ़ निकाला और संग्रहीत किया-ग्रामीण बंगाल में पातुआ द्वारा बनाये गए कुंडली चित्रों की श्रृंखला में।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;भारत के अग्रगामी संग्रहकत्र्ता एवं कला समालोचक अजित घोष और चित्राकार मुकुल डे लंदन से कलकत्ता 1920 की शुरू में वापिस आये थे। दोनों ने कालीघाट के चित्रों को एकत्रित किया जो तब भी कलकत्ता के काली मंदिर के पास बनाये जा रहे थे। अजित घोष ने कालीघाट चित्रों के लिए अपनी रूचि इन शब्दों में रखी /रूपम 1926/: ’’इन तूलिका चित्रों में भाव और प्रयास की तत्क्षणता और ताजगी है। ’’अजित घोष और बंगाल की ग्रामीण चित्राकला में यूरोप की आधुनिक कला के समान प्रभाव देखा गया है और उसी आलेख में जोर दिया ’’आदिम सादगी,’’ ’’शैलीगत विशालता,’’ ’’आश्चर्यजनक साहसीपन’’ और नाटकीय प्रभाव जो संक्षिप्त सहजता से उत्पन्न हुए थे। गुरू सवे दत्त, बंगाल की इंडियन सिविल सर्विस के एक वरिष्ठ अधिकारी, ने 1930 के दशक में बंगाल के गांवों का भ्रमण किया था। उन्होंने लोककला का भारी संग्रह किया और कला प्रेमियों को बंगाल की ग्रामीण मनोहारी चित्राकला से परिचित कराया।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जैसे जैसे ’’लोक’’ और ’’जन सामान्य’’ की चित्राकला ने सम्मान की नई स्थिति पाई अनेक ऐसे केंद्रों को धीरे धीरे ढ़ूंढ़ निकाला गया और विशाल स्तर पर चित्राकला की उर्जा का भान होने लगा और उनकी प्रादेशिक विभिन्नताओं को कला इतिहास के क्रम में रखा गया। इस उत्साह में इजाफा हुआ था 1950 के दशक में स्वतंत्राता पश्चात् भारतीय राज्यों के विलीनीकरण के बाद भारतीय महलों के गोदामों से लघुचित्रा बाजार में आ गए। लाभदायी कला के बाजार के व्यापारी ने उनके खोजने और विक्रय करने का काम शुरू किया उन चित्रों की अपेक्षा जो राजदरबारों के लिए बनाये गए थे।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;’’लोककला’’ शब्द उन चित्रों को समाहित करता है जो भारत के गांवों में, पुरुष और नारी के द्वारा अपने घर की सजावट, अपने आराध्य और अपने रीतिरिवाजों के लिए और स्थानीय पेशेवर चित्राकारों या कारीगरों के द्वारा स्थानीय लोगों के उपयोग के लिए बनाये जाते थे। यह शब्द पारंपरिक चित्राकारों के द्वारा ग्रामीण जनता के लिए बाजार में बनाये गये चित्रों को भी समाहित करता है और उनको भी जो तीर्थ स्थानों पर पारंपरिक पेशेवर चित्राकार परिवारों के द्वारा बनाये जाते थे। ये सब चित्रा विभिन्न विषयों और शैलियों में बनाये जाते थे। इतिहास, समाजशास्त्रा और भूगोल ने हर प्रदेश के चित्रों में स्थानीय प्रभाव को बढ़ावा दिया। एक दूरी तक उनकी शैली और गुणवत्ता स्थानीय तौर पर मिलने वाली सामग्री पर आश्रित होती थी। इन सब गुणों से हमें उनको प्रदेशबार पहचानने में मदद मिलती है। और तब भी सभी प्रगट विभिन्नताओं की तह में एक सदृश्यता की गति है जो उनके ’’भारतीय’’ होने को बनाये रखती है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यद्यपि भारतीय चित्राकला को बहुदा राजदरबार, मंदिर और लोककला की श्रेणी में वर्गीकृत किया जाता है परंतु इस प्रकार का विभागीकरण अनुचित है। 16 वीं सदी में मुगल शासन की स्थापना तक भारत के पूर्ववर्ती राजदरबार अलग थलग समाज नहीं थे और शासक और धनाढ्य लोग जैसे साहूकार, व्यापारी और जमीनदार ये सभी चित्राकार के लिए एक समान थे। चित्रों की गुणवत्ता का फर्क उपयोग में लाई गई सामग्री का और दिए गए समय का होता था। और इन दोनों पर कलाकार को दिए जाने वाले पारिश्रमिक का भी होता था जो स्वच्छंद होता था। राजदरबार में चित्राकार रखने का विचार मुगलों के समय से प्रारंभ हुआ और उनके जागीरदार शासकों के द्वारा मुगलों के तरीकों को अपनाया जाता रहा। यह विश्वासपूर्वक कहा जा सकता है कि उर्जा, मौलिकता और गतिशीलता अकबरी चित्राकला के मूल गुण मुगल शिल्पशालाओं एवं अन्य छोटे राजदरबारों में गुजरात एवं भारत के अन्य हिस्सों के पेशेवर घरानांे के चित्राकारों की नियुक्ति करके लाये गए थे जिन्हें प्रारंभिक तौर पर लोक शैली में काम करने के लिए प्रशिक्षित किया गया था।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पश्चिमी भारत की चित्राकारी खासकर गुजरात और दक्षिणी राजस्थान में 12 वीं सदी से मुख्यतया, जैन सिद्धांतों की ख्याति प्राप्त लघुचित्रा शैलियां शुरू हुईं और ये हमारे नजरिये को पर्याप्त तौर पर पुष्ट करतीं हैं। 15 वीं सदी में गुजरात सल्तनत की  और 16 वीं सदी के अंत में मुगल शासन की स्थापना के बाद पश्चिमी भारत में किए गए कामों में कोणीय गुण, चमकीले और भरावपूर्ण काल्पनिक रंग क्षेत्रा एवं पूरी रेखायें बनीं रहीं। उनको तो बिलकुल ही लोककला कहा जा सकता है। इस प्रदेश की दो पांडूलिपि चित्रा देवी और महात्मा इस प्रदर्शनी में हैं। ये दोनों 1485 सदी के हैं और पांडूलिपि शैली में पीपलनेर मालवा, गुजरात के पास बनायं गए थे।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;गुजरात के चित्रों के विभिन्न समूहों में भागवत पुराण के अंकन 16 वीं सदी की शुरूआत और दूसरे, /14-15/, लगभग 1625-50 के हैं, दोनों को ’’लोक’’ कहा जा सकता है। दोनों में, यद्यपि, उन पांडूलिपियों की कुछ आकृतियों में मुगल वस्त्रों का अंकन है परंतु उनको गांव में ही या फिर शहरी केंद्रों में पेशेवर चित्राकारों ने बनाया था तब भी उनकी शैली और आकृति की उर्जा मुगलों के संपर्क के बावजूद बहुत ही कम बदल पाई थी। वे बड़ी संख्या के वर्णनों के अंकन में सक्ष्म रहे होंगे। यही कारण है कि दोनों चित्रों की शैली और चित्राण में आकृति और स्थान की काल्पनिक संवेदना है। यही तरीका कड़कलपतरू में दिखलाई पड़ता है। इसे 1625 ई. में उत्तर पश्चिम में कहीं बनाया गया होगा। उन सब में रंग और बनावट की अद्वितीय समझ जीवांत है, संभवतया गुजरात के रंग और सजावट के प्रेम के कारण।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मध्य भारत केंद्र शैलीगतरूप से वैयक्तिक हैं। रामायण, कृष्णलीला और स्थानीय लोक परंपरायें ग्रामीण स्तर पर भारी प्रेरणा के स्त्रोत् रहे, दोनों प्राश्रयदाता और चित्राकारों के लिए। संयोजन साधारण है, निरूपण परिष्कृितरहित परंतु एकदम सीधे और चमकीले रंग सांकेतिक रूप से काम में लाये गए। मुगल चित्राकारिता में मुगल पहनावे तथा राजदरबारी व्यवहार का स्पष्ट प्रभाव है यद्यपि शासक आत्मिकरूप से हिंदू थे और लोक स्तर पर चित्रा में स्थानीय पहनावों एवं रंगों का चुनाव बचा रहा था।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पहाड़ी या राजपूत दरबारों के चित्रा और उनके पंजाबी पहाड़ी आधीनस्थों के चित्रा भारतीय चित्राकला के गौरवशाली पक्ष हैं। लोककला से उत्पन्न हुई उनकी जीवांत गुणवत्ता पर सकारण विश्वास किया जा सकता है। लगभग 1600 से बसोली उर्जायुक्त शैली और कुल्लू और मंडी के लोक रचना कार्य लगभग 1675 से ने अन्य पहाड़ी चित्राकला केंद्रों के लिए मानक बनाये। राजदरबारी चित्राकला से थोड़ी ही प्रभावित हो ’’बुक आॅफ ओमेंस्’’ के पृष्टों में अंकित 1800 ई. की शुरूआत के दिनों से उस प्रदेश के लोकचित्रों की सुस्पष्ट आदिम विशेषतायें बचीं हुईं हैं। आकृति की सरलता, रंगों का शांत उपयोग, चित्रा विस्तार एवं सहज सृजनशीलता के कल्पनाशील उपयोग, भारतीय लोकचित्राकला के विशेष संयोजनों की तरह देखे जा सकते हैं, सच्ची भावना की अतिसूक्ष्म दुनिया को विनोदशीलता के पुट के साथ प्रगट करते हुए।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;भारत में चित्रात्मक अभिव्यक्ति के तरीकों में से सबसे प्राचीन और महत्वपूर्ण पारंपरिक तरीका धार्मिक, सदाचरण शिक्षण एवं मनोरंजन के लिए उपयोग में लाया जाता था। गुजरात, राजस्थान, बंगाल, उड़ीसा, महाराष्ट्र् और आंध्र प्रदेश में स्थानीय जनश्रुतियों के वर्णन की लम्बी परंपरा रही थी, साथ ही साथ, वर्णनात्मक चित्रों की भी परंपरा रही थी। हमने आंध्र प्रदेश और बंगाल के चित्रों के उदाहरण प्रस्तुत किये हैं और कागज के 15 चित्रों को भी प्रदर्शित किया है जिसका उपयोग तस्वीर दिखलाने वालों के द्वारा किया गया था। उदाहरण के लिए आंध्र के फड़ या कंुडली चित्रा हाथ करघे के कपड़े पर बने हुए, बंगाल के रेखांकन कागज पर किए हुए और महाराष्ट्र् के चित्रा मिलों में बने हुए कागज पर बनाये गए थे।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आंध्र प्रदेश के फड़ चित्रा 1625 से जाने गए जो काफी परिष्कृत शैली के हैं और उन्हें मुश्किल से ’’लोक’’ कहा जा सकेगा। इसका कारण है कि वे ही कलाकार प्रदेश के हिंदू रजवाड़ों के द्वारा नियुक्त किए गए थे। प्रत्येक फड़ या कुंड़ली चित्रा एक खास जाति के पूर्वजों के शोषण के प्रचार की कथा का बखान करते और वे चित्रा केवल उसी जाति के लोगों को दिखलाये जाते थे। अनेक कथायें 8 से 10 मीटर लम्बी और 1 मीटर चैड़ीं होतीं। फड़ चित्रों पर दोनों किनारों पर बांस का दण्डनुमा आधार होता जिस पर इनको लपेटकर रखा जा सके। वे अधिकतर खड़ीं होतीं और आड़े फलकों में बनीं होतीं थीं। उनके कुल प्रभाव में एक व्यापक लयात्मकता होती और एक चमकदार रंग की सुदृढ़ गहरी रेखा लाल रंग के पृष्ठ भाग की घेराबंदी करती। पहनावा, आभूषण और अन्य विवरण दक्षिण भारतीय तर्ज पर होते।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बंगाल और बिहार के फड़ चित्रा अपेक्षाकृत छोटे होते। उनके बनाने के अनेक केंद्र होते थे और उनकी शैली एक जिले से दूसरे जिले में भिन्न होती थी। इसके बाद भी उनमें लयात्मक भाव, ताजगी, सीधापन, रंगों की चमक की परिष्कृत समझ और तार समान रेखाओं का उपयोग होना कायम होता। वे या तो स्थानीय कथा कहते या फिर बंगाल की कृष्ण गौरव की गाथा कहते। दूसरे प्रकार के कुंडली चित्रा बंगाल और बिहार के संथालों के लिए बनाये जाते, उनकी गौरव गाथाओं लिए। चक्षुदान करने वाले लोगों की तस्वीरें भी बनाईं जातीं थीं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;दक्षिणी महाराष्ट्र् के सांवतवाड़ी राज्य के पिंगुली गांव के चित्राकथी बाहरी प्रभावों से कम ही प्रभावित थे /40-50/। यहां के चित्रों की बड़ी श्रेणियों की मुख्य विशेषता थी लड़ाईंयों के दृश्य का अंकन और वे अतिमानवीय शक्तियों से ओतप्रोत होते थे। 19 वीं सदी के दौरान बने इन चित्रों की शैली मौलिक है, इनमें नाटकीय गुणवत्ता और सुदृढ़, गहरे और सपाट रंग के क्षेत्रों को एक सामान्य रेखा से बांधा जाता था। एक ढंग से वे चमड़े की कठपुतलियों का अनुसरण करते थे जिन्हें उसी घर के लोग ही बनाते थे। उन चित्रों की विषय वस्तु का चयन और विभिन्न ब्यौरे मराठा दर्शकों की रुचियों को सुयोग्यरूप से प्रदर्शित करते थे। विषयों का चुनाव अधिकतर हिंदू धार्मिक कथाओं में से किया जाता था।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;तीर्थ स्थानों एवं मंदिरों में बहुदा चित्राकारों की दुकानें होतीं जहां से तीर्थयात्राी यादगार स्वरूप चित्रों को खरीदते। कलकत्ता के कालीघाट मंदिर में, 19 वीं सदी में एक आकर्षक शैली का प्रादुर्भाव हुआ जहां प्रमुख हिंदू देवी देवताओं के साथ प्रसांगिक घटनाओं को साधारण कागज पर चित्रित किया जाता था। फुरती और अनियत ढंग से बनाने में वे विशेष तौर पर मौलिक और गहरा प्रभाव, उर्जा और स्मरणीयता पैदा करते। पानी के यूरोपीय रंगों का उपयोग करते हुए आकृतियां और अन्य रूपांकन में बलाघात् गोलाईंयां परिरेखाओं के भीतर आदर्श भाव के कारण होतीं और उन्हें काली मोटी बाह्य रेखाओं से परिपूर्ण किया जाता था।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पुरी के मंदिर के आसपास और पड़ौसी गांवों में चित्राकार तीर्थ यात्रियों के लिए चित्रा बनाते थे। यद्यपि सबसे ज्यादा सामान्य विषय तीन पंथों की मूर्तियों को कपड़े पर चित्रित करना होता था। कभी कभी चित्राकार ग्राहकों से काम प्राप्त करने के लिए रेखांकन पुस्तिका भी साथ रखते। उड़ीसा के लगभग सभी मौलिक चित्रा ताड़पत्रा पर बनाये और चित्रित किए जाते, तब भी अनेक वैकल्पिक दशाओं में कागज पर भी चित्राकारी होती थी। जो भी हो कागज के चित्रों में सामग्री की भिन्नता के कारण उनकी शैली थोड़ी बदल जाती।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;दक्खिन के विशाल भू भाग में विभिन्न आश्रयदाताओं और परिणामतः चित्राण की भी विभिन्न शैलियां रहीं थीं। उपर चर्चित कुंडली या फड़ चित्रों से अलग परंपरागत चित्राकारी की महान् मौलिकता, उर्जा और विशिष्ट शैली में दक्खिनी राजदरबारों में बनाईं जातीं थीं। दक्षिणी दक्खिन में वानपर्ती हिंदू राज्यों में से एक ऐसा ही केंद्र था। रागमाला श्रृखंला में से इसी स्थान के तीन पृष्ठ जो बहुत ही मौलिक शैली और रंगों की गैर परंपरागतता के हैं, उपयोग में लाये गए हैं। उनके बारे में ध्यान देने योग्य बात यह है कि वे दक्षिण भारतीय कर्नाटक संगीत की भावभंगिमा को चित्रित करते हैं; अन्य रागमाला श्रृखंला उत्तर भारतीय संगीत पर आधारित है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इस छोटे आलेख के अंत में हम पाठकों को बतलाना चाहते हैं कि इस प्रदर्शनी में भारत के अनेक लोकचित्रा प्रदर्शित नहीं किए जा सके हैं। प्रथम, उड़ीसा और गुजरात के अनेक घरों में की गईं भित्तिचित्राकारी और बिहार में मधुबनी, महाराष्ट्र् में वरली और मध्य भारत में बस्तर के वधु कक्ष की दीवालों की भित्तीचित्राकारी को, यद्यपि हमें ज्ञात है, स्वाभाविक तौर पर उनको यहां लाकर प्रदर्शित करना असंभव है। दूसरे, 1900 ई. के पूर्व तक संग्रह करने के काम की परिसीमा है। हाल के मधुबनी एवं वरली के कागज पर किये गए काम हमारे परिक्षेत्रा के बाहर हैं। और ऐसा ही है कि दक्षिण भारत की लोक चित्राकारिता के अच्छे उदाहरण म्युजियम के पास नहीं हैं। उसको वहां पर कांच चित्राकारी तक सीमित किया हुआ है। अन्यथा यह प्रदर्शनी भारत की लोक चित्राकारिता का पूरा प्रतिनिधित्व करती और यह एक अभिवादन होता उन अनजान गुणी चित्राकारों का जिनके कार्य को म्युजियम गौरवांवित करना चाहता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;भारतीय लोक चित्रा प्रदर्शनी, सी एम सी आर्ट गैलरी, नई दिल्ली, मार्च-अप्रेल 1990 के लिए।  जगदीश और कमला मित्तल म्युजियम आॅफ इंडियन आर्ट, हैदराबाद के संग्रह से साभार।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt; संपर्कः जगदीश मिततल, द्वारा नाडजर चिनाय, ट्र्स्टी मंत्राी, जगदीश और कमला मित्तल म्युजियम आॅफ इंडियन आर्ट, 1/2/214/6 गगन महल रोड, हैदराबाद 500059। दूरभाषः 040 763 1561&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3558267468781846487-5330372075656822566?l=itihaasam.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://itihaasam.blogspot.com/feeds/5330372075656822566/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://itihaasam.blogspot.com/2009/01/blog-post_1228.html#comment-form' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3558267468781846487/posts/default/5330372075656822566'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3558267468781846487/posts/default/5330372075656822566'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://itihaasam.blogspot.com/2009/01/blog-post_1228.html' title='भारतीय लोक चित्रकला'/><author><name>अनुनाद सिंह</name><uri>http://www.blogger.com/profile/05634421007709892634</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3558267468781846487.post-7020343885769699139</id><published>2009-01-15T05:23:00.000-08:00</published><updated>2009-01-15T05:24:15.602-08:00</updated><title type='text'>भारतीय चित्राकला ( 16वीं से 19वीं सदी तक )</title><content type='html'>&lt;span style="font-weight: bold;"&gt;आलेख: जगदीश मित्तल&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;गत चालीस वर्ष से अधिक से ’’भारतीय लघुचित्रा’’ भारत और पश्चिम में कला विद्वानों, संग्रहकों, कलाकारों और अन्य लोगों में निरंतर ख्याति पा रहे हैं। उनकी बारीक कारीगरी, भावपूर्ण और दोलायमान रंगों की संयोजना, विभिन्न शैलियां एवं विषय प्रसिद्ध हैं। ये गुण रंग की परत के नीचे के आकर्षण को मंद कर देते हैं। भारतीय ’’लघुचित्रा’’ से उनके ही कलाकारों के अन्य अंकनों को निस्तेजित को होते देखा जाता है और ’’लघुचित्रों’’ की यह एक विशेषता है। सच यह है कि भारतीय लघुचित्रा के कद्रदानों की पहुंच अच्छी रचनाओं तक रही जो अब कुछ सनक सी बन गई है। यद्यपि कुमारस्वामी के लगभग अनजानी कला के दो ’’इंडियन ड्र्ाईग’’ बिनिबंधों - 1910 और 1912 - को प्रदर्शित करने में प्रशंसा तो मिलेगी ही परंतु फिर भी उस कला के महत्व को निरूपित करने के लिए पर्याप्त उदाहरणों का अभाव है। यहां तक कि 1950 के दशक के दौरान, महलों के भंडारगृह और देश के अंग्रेज घरों से लघुचित्रों से बाजार पट गया परंतु उनमें कोई चित्राकारिता नहीं थी क्योंकि वे सब शिल्पशाला के हिस्से थे और उनका संबंध किसी कला पारखी या आश्रयकत्र्ता से नहीं था।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सौभाग्य से 1950 के आखिर में दो कुशाग्र कला व्यापारी - रामगोपाल विजयवर्गीय, जयपुर के और दिल्ली के पी. आर. कपूर ने कलाकार घरानों से हजारों कलाकृतियां प्राप्त कीं जिनमें कुछेक तो बेहद खूबसूरत थीं। विजयवर्गीय ने राजस्थान, गुलेर, कांगड़ा और बसोली से कलाकृतियां खरीदीं थीं। 1949-57 के बीच चांबा, हिमांचल प्रदेश के मुख्य कलाकार घरानों के लोगों से लगभग समूचे जखीरे को प्राप्त करने में मैं भाग्यशाली रहा था। चांबा के इस हिस्से से अलग, यहां प्रदर्शित चित्रा विजयवर्गीय और कपूर द्वारा हासिल किए गए में से ही हैं। न्यूयार्क में एशिया हाउस गैलरी में स्टुअॅट कैरी वाॅल्श द्वारा 1976 में ’’इंडियन ड्र्ाईग एण्ड पेंटेड स्केचेज्’’ की प्रथम प्रदर्शनी में मित्तल संग्रहालय से 16 कृतियां प्रदर्शित कीं और उनमें से 10 यहां इस अभिलेख में प्रदर्शित हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;किसी भी चित्रा के लिए आकृति खींचना आवश्यक है। आकृति या रेखांकन चित्राकार से करीबी रिस्ता कायम करता है और कलाकार के मस्तिष्क की कल्पनाओं के साथ भागीदारी होने लगती है। उर्जा, अभिव्यक्ति और निर्णय जो हम रेखांकन में देखते हैं, वह बहुदा उसी चित्राकार के उसी विषय के अन्य चित्रा में नहीं देख पाते। भारतीय चित्राकारिता पश्चिम के चित्राकारों की रचनाओं से इस मायने में भिन्न होती है कि भावों को चेहरे के माध्यम के बजाय भारतीय चित्राकार मुद्रा और भंगिमा के माध्यम से प्रगट करते हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सीस पेंसिल अथवा चित्रांकनी का रेखांकन में उपयोग भारतीय चित्राकारों को ज्ञात नहीं था। निब का उपयोग मुश्किल से होता था परंतु लोक स्तर पर बांस की कलम का उपयोग कभी कभी किया जाता था। अपने चीनी और जापानी प्रतिपक्षों के समान भारतीय कलाकारों ने सीखने की शुरूआत से ही तूलिका के उपयोग में दक्षता प्राप्त कर ली थी। गिलहरी की पूंछ के बाल से तूलिका बनाई जाती थी। भारतीय कलाकार प्रायः कोयले का उपयोग करते थे और कभी कभी किरमिच या लाल गेरू का भी उपयोग मूल कल्पना के रेखांकन में किया जाता था। ऐसे रेखांकन बाद में विकसित किए जाते या तो उसी पर पुनः रेखांकन द्वारा या फिर सफैदी की पतली परत के लेपन से और उसके बाद आकृति का अंतिम अंकन तूलिका के द्वारा काली स्याही से किया जाता। हाथ से बने कागज के एक ताव अथवा अनेक तावों को एक साथ चिपकाकर, फिर उस पर सफैदी की एक परत तथा गोमेद को घोंटकर चमकाया जाता और तब आकृति अंकन को किया जाता और कभी कभी तो कागज के दोनों ओर भी अंकन किया जाता।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बहुत ही कम कलाकार सीधे रेखांकन का उपयोग करते क्योंकि उनका प्रशिक्षण स्मृति अंकन द्वारा रेखांकन या चित्राण का होता था फिर चाहे वह मानव, पशु, पक्षी, वृक्ष, प्रतीक चिन्ह या अन्य तत्व हो।  सभी की आकृति को स्मृति से ही उतारना होता था। कलाकार जीव अथवा अजीव का अवलोकन कर उनके मूलभूत गुण, विशेषतायंे और मनोभाव या मनोदशा स्मृति में रख  लेता और जब आवश्यकता होती, अपनी स्मृति के भंडार से निकालकर अंकन कर लेता था। इस प्रकार चित्रा की एक ही विषय वस्तु में उतार चढ़ाव या अलगाव हो जाता था और यह इस बात पर आधारित होता था कि कलाकार किस क्षेत्रा, किस काल में और किस शिल्पशाला से प्रशिक्षण के दौरान क्या और कितना सीखा था। वह हिंदू, मुस्लिम, अथवा ब्रिटिश आश्रयदाताओं के लिए कार्य करता और अपने तीक्ष्ण अवलोकन एवं संवेदना की पारिवारिक धरोहर को बनाये रखने के लिए प्रयासरत रहता था। अधिकांश देशों की तरह, कलाकार आम तौर पर उच्च वर्ग से नहीं हुआ करते थे। भारत में राजमिस्त्राी और अन्य कारीगरों के काम के समान ही चित्राकारों के सृजन भी लगभग नाम रहित हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सभी समय और पद्धति के चित्राकार सबसे पहले रेखांकन करते और तब उसे एक चित्रा का स्वरूप देने के लिए उनमें रंग भरते। जो भी हो, मुगल, दक्खिनी राजस्थान और पंजाब की पहाड़ी पद्धतियों के चित्राकार 16 वीं और 19 वीं सदी में चित्राण के उद्देश्य के ही खास प्रेमी होते थे। शासकों, मुखियों और सामान्यजनों के लिए हाथी, घोड़े, शेर और अन्य पशुओं और पक्षियों के चित्रा, जुलूस, लड़ाई एवं राजदरबार के दृश्यों का अंकन, पौराणिक, रोमानी और साहित्यिक विवरण, रागमाला पर आधारित संयोजनायें, बारामाशा और कामोत्जिक दृश्य अंकित किए जाते और उनका उपयोग व्यक्तिगत चित्राकला प्रेम ही था। चित्रों की श्रृखंला बनवाने वालों के लिए भी कार्य किया जाता था। वे सजावटी सामान के लिए आकृतियां गढ़ते। अपने कार्य की प्रौढ़ता के लिए लगातार रेखांकन का अभ्यास करते खासकर लोगों, पशुओं और वस्तुओं के अध्ययन एवं अवलोकन के लिए। लगभग दैवभक्ति के समान ही परिश्रम करते रहते क्योंकि वे गहरे तक जीवन एवं प्रकृति की सभी अभिव्यक्तियों से प्रेम करते थे। कुछ चित्रा, मात्रा चित्राकार के निजी सुख के लिए भी बनाये जाते थे।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मुगल चित्राकार खास घटनाओं एवं खास व्यक्तियों के चित्रा के लिए नियुक्त किए गए थे। वे लगातार नई नई संयोजनायें खोजते और तात्कालिक अवलोकनों को भविष्य में काम आने के लिए अंकन कर लेते थे। जो उन्होंने देखा उसे बारीकी से अंकित करने के लिए साधनों के विकास में भी वे प्रयत्नशीन रहा करते थे। दक्खिन में इसके विपरीत, चित्राकार रंग एवं रेखाओं की सुंदरता को व्यक्त करने के लिए सचेष्ट प्रयासरत रहा करते थे। मुगल और दक्खिन पद्धतियों के कलाकारों के चित्रा और रचनायें उनके प्रभाव में बीकानेर और जयपुर के कलाकारों ने बनाईं जो अद्भुत बारीक जानकारियां, अत्यंत कुशलता और उच्च तकनीक प्रगट करते थे।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;राजस्थान पद्धति के चित्राकारों की विशेषतायें उनकी बारीकियां, सुस्पष्टता और मितव्ययता हैं। रेखा के द्वारा और कभी कभी केवल रंग से चित्राकार भाव की अत्यंत सूक्ष्मतायें प्रगट करते हैं। खासकर कोटा और बूंदी कलाकार 17 वीं सदी के बाद से अपने अन्य राजस्थानी सहयोगियों के मुकाबले अधिक उन्मुक्त रेखांकन करने लगे थे। वे अधिकांश में अवलोकित आकृतियों के अंकन में ज्यादा उन्मुक्त, ज्यादा सूक्ष्म और ज्यादा आनंददाई हैं। कोटा-बंूदी चित्राकार सुस्पष्ट और गहरे तूलिका स्पर्श का उपयोग करते हैं। कभी कभी एक सुनियोजित रेखांकन करने के बजाय वे सहज स्वच्छंद रेखांकन करते और यहां तक कि कागज के एक छोटे टुकड़े पर बेतरतीबी से खींचीं गईं रेखाएं उनकी कल्पनाशीलता को आकार एवं लय की विभिन्नताओं के आनंद को प्रगट करतीं। 17 वीं सदी के बाद से इन कलाकारों ने बड़े फलक पर काम करना शुरू किया क्योंकि उनको राजप्रसादों और मंदिरों में भित्तीचित्रों को अंकन करने के लिए नियुक्त किया जाने लगा था। कोटा चित्राकारों ने जीवन के सभी पक्षों के उन्मुक्त, चुटीले एवं साहसी रेखांकन किए। वे अपने संरक्षकों के साथ शिकार पर भी जाते और उनके द्वारा शिकार स्थल पर ही बनाये गए चित्रा उपलब्ध हैं। संभवतया, आखेट या शेर या हाथी की भिड़ंत के दृश्य जिनमें प्राश्रयदाता की अपेक्षा पशु एवं जंगल के परिदृश्य ज्यादा महत्वपूर्ण हो उठते थे के महान चित्रा इन भ्रमणों के ही परिणाम से उत्पन्न हुए थे। भगत और चोखा 18 वीं सदी के उत्तरार्ध और 19 वीं सदी की शुरूआत में क्रियाशील रहे थे। ये दो विभिन्न शैलियों के चित्राकार थे। मेवाड़ के शालीन देवगढ़ ठिकाने की तुलना में बेहद संवेदनशील रूप से इनके तरल चित्रा मिलते हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पहाड़ी चित्राकारिता जो 17 वीं और 19 वीं सदी में की जाती रही चित्राकारिता की अपेक्षा सौम्य, परिष्कृत, बारीकीमय एवं गीतात्मक हंै। गुलेर और चांबा घरानों की रचनायें मुख्यतया 18 वीं सदी की हैं। ये रचनायें उल्लेखनीय हैं और पहाड़ी चित्राकला की सर्वोत्तम हैं। यद्यपि इन दोनों घरानों की शैलियां बाद की मुगल चित्राकला से निकलीं हुईं हैं परंतु इन शैलियों के मनोभाव अल्हदा ही हैं और वे सुसंस्कृत, समयोचित और गीतात्मक हैं। गुलेर और उससे निकले कांगड़ा के रचनाधर्म का झुकाव मृदुल आदर्शवाद की ओर है। पहाड़ी चित्राकला के उदाहरण भी हैं जिनमें कलाकार की आकांक्षा अपने प्रदेश के लोगों, साधु संतों, और संगीतज्ञों के जमघटों को चित्रित करने की होती थी। ये उदाहरण यद्यपि कम ही हैं परंतु अभिन्नरूप से तीक्ष्ण परंतु संवेदनामय अवलोकन से हैं। 19 वीं सदी से हम ’’अपनी पद्धति’’ के भारतीय चित्रा देखते हैं जो भारत मेें बसे ब्रिटिश निवासियों और पश्चिम के पर्यटक प्रशंसकों के लिए बनाये गए थे। उनमें से अधिकतर रेखा चित्रा हैं। उड़ीसा में ताड़ पत्रा पर चित्राण की बहुसंख्यक पाण्डूलिपियों का उल्लेख करना आवश्यक है। इन्हें नुकीली कलम से गहराई तक रेखायें खींच एवं उनमें काली स्याही रगड़कर बनाया जाता और कभी कभी कुछेक हिस्सों में चित्राण भी किया जाता था। उनकी गुणवत्ता बेहद अच्छी है और किसी भी चित्रा की भांति परिपूर्ण है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मेरे मत में भारतीय चित्राकला की स्वयं की एक परिपूर्ण भाषा है। उसके आनंद को कोई अन्य भाषा प्रगट नहीं कर सकती। एक कलाकार के नाते मैंने उन्हें 1949 में पहली बार ही महान् रचनाओं की तरह पाया। मेरी प्रशंसा उन चित्रों को सहज मन देखने के कारण है बजाय उनके कलाकारों नाम या घरानों, रचना तिथियों अथवा पद्धतियों की जानकारी के। पहले यह योग्यता मुझमें नहीं थी। यह बाद में पैदा हुई थी। इसलिए अब मैं विराम लेता हूं , चुप होता हूं जिससे प्रदर्शित चित्रा आपसे बिना किसी परदे के सीधे सीधे बात कर सकें।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;/भारतीय चित्राकला प्रदर्शनी के लिए लिखा गया एक निबंध। जगदीश और कमला मित्तल म्युजियम आॅफ इंडियन आर्ट, हैदराबाद के संग्रहण से साभार।/&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;संपर्कः जगदीश मिततल, द्वारा नाडजर चिनाय, ट्र्स्टी मंत्राी, जगदीश और कमला मित्तल म्युजियम आॅफ इंडियन आर्ट, 1/2/214/6 गगन महल रोड, हैदराबाद 500059। दूरभाषः 040 763 1561।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3558267468781846487-7020343885769699139?l=itihaasam.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://itihaasam.blogspot.com/feeds/7020343885769699139/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://itihaasam.blogspot.com/2009/01/16-19.html#comment-form' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3558267468781846487/posts/default/7020343885769699139'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3558267468781846487/posts/default/7020343885769699139'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://itihaasam.blogspot.com/2009/01/16-19.html' title='भारतीय चित्राकला ( 16वीं से 19वीं सदी तक )'/><author><name>अनुनाद सिंह</name><uri>http://www.blogger.com/profile/05634421007709892634</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3558267468781846487.post-2652620120574644154</id><published>2009-01-15T05:20:00.000-08:00</published><updated>2009-01-15T05:22:53.141-08:00</updated><title type='text'>भारतीय कला और वास्तुशिल्प में प्रगति</title><content type='html'>&lt;span style="color: rgb(153, 51, 153);"&gt;भारतीय धरोहरों से संबंधित पश्चिमी व्याख्याओं और धारणाओं के लिए चुनौतियां&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;भारतीय कला और वास्तुशिल्प के मूल्यांकनों को पश्चिमी दुनियां में उन्हीं पूर्वाग्रहों और पक्षपातों को सहना पड़ा जिन्होंने भारतीय दर्शन एवं संस्कृति के विश्लेषकों को विषाक्त किया है। औपनिवेशिक धारणा के नमूने ने भारत को ऐसा वर्गीकृत किया गया जो रहस्यवाद के अज्ञान में डूबा हुआ था और जहां सामाजिक जीवन के चहुंओर धर्म का प्रभाव और नियंत्राण फैला होता था। पश्चिम की ’’भव्य’’ पवित्राता के विपरीत, भारत के धार्मिक कार्यकलापों को प्रायः बेतुका और विकृत ठहराया गया था।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यद्यपि पूरे उपमहाद्वीप ने वास्तव में, कला और वास्तुशिल्प की दुनिया में प्रगति के बेमिसाल और निर्बाध्य इतिहास को देखा, तथापि भारत या तो ’’विश्व’’ कला के संकलनों में सप्रयास उपेक्षित रहा या फिर उसका प्रतिनिधित्व बहुत ही सीमित और बहुत ही छोटे उदाहरणों से किया गया। जब भारतीय कला और वास्तुशिल्प के चित्राग्रंथों को प्रकाशित किया गया तो उनकी यह कहकर ’’भारत का समस्त वास्तुशिल्प धार्मिक रहा है’’ जैसे फिकरों के साथ आलोचना शुरू की गई और आगे के विवरण में आम तौर पर यह कथन होता था कि भारतीय कला एवं वास्तुशिल्प पश्चिम की कला और वास्तुशिल्प की उंचाईयों तक कभी भी नहीं पहुंच पाया।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यह कहना कि भारतीय वास्तुशिल्प ’’धार्मिक’’ रहा न केवल प्राचीन भारतीय दर्शन के संबंध में भ्रामक जानकारी को प्रगट करता है वरन् भारत में वास्तुशिल्प संबंधी खोजों के साथ साथ पश्चिम के भी वास्तुशिल्प संबंधी परिदृश्य की अज्ञानता को प्रगट करता है। भारतीय धरोहरों के ये विवरण भ्रामक हैं क्योंकि हरप्पा सभ्यता का शहरी स्वरूप और मौर्यकाल का विश्वव्यापी और धर्मनिरपेक्ष रूप सभी पश्चिमी विद्वानों को जानना चाहिए।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यदि कोई पक्षपाती बनने की कामना करता और पश्चिमी वास्तुशिल्प के अभिलेखों का व्यक्तिपरक समीकरण करता तो वह आसानी से कह उठेगा कि पश्चिम का समस्त वास्तुशिल्प ’’धार्मिक’’ रहा है। वह अपने कथन के समर्थन में ग्रीस और रोमन मंदिरों, मकबरों की मूर्तियों, अनेक भवनों, बैजंटाईन और गाॅथिक चर्चों, पूर्वी मठों और ईसा मसीह के हजारों चित्रों एवं क्रास की ओर इंगित करेगा।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;परंतु ऐसा कथन रोमन काल के साथ न्याय नहीं करेगा क्योंकि कृत्रिम जलसेतू, अखाड़े, महल और निजी निवास भी बनाये गए थे परंतु पुनर्जागरण काल के पूर्व के चर्च और उपलब्ध धार्मिक चित्राकारी क्रिस्चियन काल के ऐतिहासिक आलेख पर भारी पड़ती है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सामान्य तौर पर विश्व भर में धर्मप्रेरित वास्तुशिल्प पृथ्वी के पुरातात्विक आलेख पर भारी पड़ता है क्योंकि धार्मिक स्मारक बहुधा अधिक स्थाई सामग्री से बनाये जाते थे।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color: rgb(153, 51, 153);"&gt;भारत का धर्मनिरपेक्ष वास्तुशिल्प&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;प्राचीन भारत के धर्मनिरपेक्ष वास्तुशिल्प का अधिकांश बच नहीं पाया क्योंकि वह लकड़ी से बनाया गया था। पत्थर भारी और समय साध्य था, वह गरमाता था और खासकर बंद निर्माण के लिए अनुपयोगी था। इसलिए पत्थर का उपयोग उन भवनों को बनाने में किया जाता था जहां खुले में कार्यकलाप आयोजित होते थे। ग्रीक और चीनी यात्रियों की आत्मकथाएं, साहित्य और राज्य दरबारों के इतिहास, प्राचीन मूर्ति अवशेष और गुफा चित्राकारी - सभी इंगित करते हैं कि भारत में धर्मनिरपेक्ष भवनों की कमी नहीं थी, उनमें से अनेक अलंकारों से सज्जित एवं प्राकृतिक रंगों की चित्राकारी से चित्रित थे।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उदाहरण के लिए पर्याप्त साक्ष्य उपलब्ध हैं कि आम प्रवेश दरवाजे जिन्हंे तोरण कहा जाता था अनेक राजाओं के द्वारा संपूर्ण भारत में बनवाये गए थे। उनमें से कुछ इस्लामिक आक्रमणों के दौरान नष्ट कर दिए गए और कुछ को नया रूप देकर शासकों के महल में लगवा दिया गया था। इस पर भी, जैसे तैसे कुछ बचे रह गए और वे ही इस बात के प्रमाण हैं कि भारत में इनके निर्माण की उच्चकोटि की दक्षता उपलब्ध थी। इन तोरणों ने ही प्राचीन एवं मध्यकालीन भारत की बड़ी राजधानियों में प्रवेश करने वालों का स्वागत किया था।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;दिल्ली में, 5 वीं और 6 वीं शताब्दी के गुप्तकालीन अवशेष खास प्रभावी हैं बिलकुल गुजरात के वाडनगर के तोरणों के सदृश्य, जिनमें से एक ही बचा हुआ है। उसका निर्माण काल 9 से 10 वीं शताब्दी के करीब है। 12 से 13 वीं सदी के सोलंकियों की राजधानी में चार ऐसे द्वार हैं जिनमें से प्रत्येक पर आकर्षक नक्काशी की गई है। इसी प्रकार चार सुन्दर तोरण 13 वीं सदी के काकथियों की राजधानी वारंगल में आज भी खड़े हैं। 14 वीं शताब्दी में वारंगल का अधिकांश ढहा दिया गया था परंतु भग्नावशेष वास्तुशिल्प के विशाल सम्मुच्चय होने के संकेत देते हैं। उस सम्मुच्चय में प्रार्थनागृह, राजशाही मंडप और संभवतया आम सभागृह का समावेश है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;/बंगाल के सुलतान के समय तोरण की प्रथा जारी रही। शेरशाह सूरी और मुगलों ने आयातकार आकार को अर्ध गोलाकार या स्तूपाकार या महराबों में बदला था परंतु श्रीरंगम, तामिलनाडू में तोरणों के भव्य एवं विशाल स्वरूप आज भी स्थित हैं। /&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पत्थर और, कभी कभी ईटें, मोहनजोदड़ों की तर्ज पर सीढ़ीदार कुआं एवं धरातल से नीचे स्नानागार अथवा तैरने के तालाब के निर्माण में उपयोग की जातीं थीं। 9 वीं सदी के बाद तो उनका उपयोग ज्यादा ही होने लगा था। मोदेहरा, गुजरात के समान ऐसे कुयें कभी तो मंदिर के समीप बनवाये जाते और कभी कुछ राजसी महलों के समुच्चय में। पटना की रानी के सीढ़ी कुयें के सदृश्य चिताकर्षक प्रतिमाओं की कतार और अदलज के साथ अलंकृत आले तथा सुन्दर झरोखे सहित अनेक कुयें उपलब्ध हैं। राजस्थान में बंूदी शहर में थोड़े कम परंतु कलात्मक और मनभावन उदाहरण उपलब्ध हैं। चैहानों से संबंधित अनेक रूचिपूर्ण निर्माण अजमेर-दिल्ली के इलाकों में पाये गए हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;/अलबरूनी ने इतिहास के अभिलेखों में खासकर सीढ़ीदार कुएं अथवा बावली का वर्णन किया है। बावलियां राजसी एवं जनता, दोनों, के उपयोग के लिए बनवाईं जातीं थीं। उत्तर पश्चिमी भारत में और हरियाणा के फरूखनगर में ऐसे ही कुछ निर्माण जल-व्यवस्थापन योजना के अंग के समान प्रतीत होते हैं।/&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;प्राचीन भारत के विश्वविद्यालयों के भग्नावशेष पर ध्यान दिया जाना आवश्यक है यथा तक्षशिला, नालंदा, विक्रमशिला या सारनाथ। इन विश्वविद्यालयों में गणित, ज्ञानशास्त्रा, तर्कशास्त्रा, प्रकृति विज्ञान और औषधिज्ञान के साथ विभिन्न विषयों पर अध्यापन उपलब्ध होता था। नालंदा तो ’’कालेज कैम्पस’’ की याद ताजा करता है। नालंदा में निवास के साथ साथ अध्यापन के भवन के अवशेष प्राप्त हैं। इस प्रकार से इन ऐतिहासिक स्थलों को ’’धार्मिक’’ बतलाना, स्पष्ट है, भ्रामक होगा।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यद्यपि बड़े तौर पर, भारत के किलों को इस्लामी योगदान का माननेे की प्रथा सी रही है परंतु राजपूत किलों को इस सामान्य रिवाज से अलग ही देखा जाता है। भारत में पहाड़ों पर शताब्दियों पूर्व से बने हुए किलों को चिन्हित किया जा सकता है  जिन्हें इस्लामिक राजाओं ने फतह किया था। /इस प्रकार के किलों के उदाहरण मध्य भारत में कलिंजर तथा अजयगढ़ में अभी भी उपलब्ध हैं, उनमें से अनेक किलों को पहले से ही त्याग दिया गया था।/ बाद के काल में राजपूतों ने किलों में विशाल राज महलों को बनवाना सीखा जिनमें गर्मी से बचाव के तरीके और अधिकतम प्रकाश और वायु की सुनिश्चितता की तकनीक खोजीं गईं। अधिकांश महलों में खूब सजावट की जाती थी। कला एवं सजावट की अंतरदृष्टि का पता इनसे चलता है जिन्हें राजशाही का संरक्षण प्राप्त रहता था।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इसलिए बहुत ही बेतुका है कि पश्चिमी कला मर्मज्ञों ने कैसे भारतीय धरोहरों को धर्म की परिधि में रखने की चेष्टा की थी ? यहां तक कि जब पश्चिमी कला इतिहासकारों ने अपना ध्यान केवल मंदिरों और स्तूपों पर खासकर केंद्रित किया परंतु भयंकर भूल तब की जब अन्य स्मारक और उनके निर्माण की प्रेरणा दोनों को अपने विश्लेषणों से बाहर रखा।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color: rgb(153, 51, 153);"&gt;भारतीय कला के दार्शनिक पहलू&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पश्चिमी धर्माें जिनमें दार्शनिक विषयवस्तु कम और ’’एक ईश्वर’’ का बाध्यकारी विश्वास अधिक है, के विपरीत, भारत के अनेक प्राचीन धर्म एक मायने में धर्म नहीं थे जैसा कि धर्म को आज माना जाने लगा है। भारत में पहले के बौद्ध अनुयायी विशेषकर निरीश्वरवादी थे, पहले के जैन अज्ञेयवादी थे और हिंदूवाद के बडे़ आसमान तले दार्शनिक विभिन्नताओं के लिए खुला स्थान था। उपनिष्दों में ईश्वर को अमूर्त और आत्मिक बताया है। दार्शनिक वर्णन धर्मनिरपेक्ष है और मंथन एवं मनन से आत्मिक परिकल्पनायें उत्सर्ज होतीं हैं न कि उस रहस्योद्घाटन से जिसे न तो चुनौति दी जा सकती है और न ही उनमें समयानुकूल परिवर्तन संभव है। न्यायसूत्रा में बुद्धिवादी और वैज्ञानिक मतों, व्याख्याओं, प्राकृतिक घटनाओं और प्रकृति में घटने वालीं भौतिक प्रविधियों पर अत्याधिक ध्यान दिया गया है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;दर्शन की इस समृद्ध परंपरा ने - बौद्धिक और आत्मिक, दोनों - भारतीय कला और स्थापत्यशिल्प में समुचित स्थान पाया है। स्तूप और मंदिरों में सभी प्रमुख दार्शनिक विचारधाराओं के दृष्टिगोचर चिन्हों पर आधारित गंभीर सांकेतिक भाषा को समाविष्ट किया। यथाः चक्र - समय का घूमने वाला पहिया, और ब्रह्माण्ड में गतिशील लयों का प्रतीक; पद्म - या कमल विश्व सृजन शक्ति का प्रतीक जो पृथ्वी की छाती से प्रगट होता है; अनंत  - सर्प की तरह, जीवन के सबसे महत्वपूर्ण तत्व पानी, शक्ति और असीम समुद्र का प्रतीक जिससे समस्त जीव उत्पन्न हुए, उनका विशिष्टीकरण हुआ, विलीन और पुनः समाहित हुए; स्वास्तिक - सृजन एवं गति के चारों पक्ष का प्रतीक; कलश  - या भरा हुआ गुलदान, सृजन एवं समृद्धि का प्रतीक; कल्पलता  और कल्पवृक्ष - कामना पूरी करने वाली बेला या वृक्ष जो कल्पना और मौलिकता को प्रगट करे; गवाक्ष - तीसरा नेत्रा; मृग - या हिरण सौंदर्य या कामेच्छा का प्रतीक और लिंगम  और योनि - नर और नारी की प्रजनन शक्ति का चिन्ह।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इसी तरह गढ़े गए देवी देवताओं की हस्त मुद्राओं के द्वारा मानवीय भावों को व्यक्त करने के नियम बनाये गए थे। कभी कभी देवी देवताओं के अनेक हाथ बनाये जाते, उर्जा, शक्ति अथवा गति के साथ साथ दिव्य नृत्य को प्रगट करने के लिए। हाथ की विभिन्न मुद्राओं से अनेक भाव एवं गुणों यथा विवेक, शक्ति, उदारता, दयालुता एवं अवधानता को दर्शाने के लिए किया जाता था। बहुबाहु, बहुगुण बोधक माने जाते रहे हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पश्चिमी कला मर्मज्ञ जटिल सांस्कृतिक और दार्शनिक पद्धतियों को जिन्होंने भारत की कलात्मक प्रविधियों को जन्म दिया, अकसर समझ नहीं पाते थे। अनेक विद्वानों के लिए मूर्तियों के चित्राण आदिकाल के आस्थाओं और अंधविश्वासों के मनमाने बेतरतीब प्रतिफलन थे। यह नहीं कहा जा रहा है कि भारतीय आध्यात्मवाद मनमानी बातों और अंधविश्वासों से सदैव मुक्त रहा परंतु मूर्तिशिल्प की सर्वोत्तमता और उसके द्वारा शक्तिशाली दार्शनिक भाव प्रगट करने के लिए चैतन्य एवं सुविज्ञ प्रयास सतत् होते रहे थे।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color: rgb(153, 51, 153);"&gt;धर्मनिरपेक्ष और आध्यात्मिक विलय&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जिस प्रकार दार्शनिक सिद्धांतों के भौतिक स्वरूपों ने आत्मा को संसार से जोड़ा उसी प्रकार भारत के स्तूप और मंदिर मात्रा धार्मिक भवन या स्मारक नहीं थे वरन् सांस्कृतिक कंेद्र भी थे जो आत्मिक एवं संसारी दोनों महत्व के लिए थे। इसलिए स्तूप या मंदिर की मठ या चर्च से तुलना पूरी तरह से नहीं की जा सकती। और, यह वह कारण है कि उनके निर्माण में लौकिक जीवन के अनेक चित्राणों को समावेश किया गया था।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उदाहरण के लिए 1 ली सदी ई. पू. के अमरावती के, 1 ली सदी के सांची या फिर 2 री या 3 री शताब्दी के नगरजूनाकोण्डा के स्तूप को लें । प्रत्येक स्तूप में नक्काशी की अमूल्य संपदा निहित है और ’’बुद्ध’’ के जीवन के दृश्यों को मुख्य चित्रा वीथियों में उकेरा गया है। तब भी, अमरावती के स्तूप में स्पष्ट विषयासिक्ता, फूल और लताओं के कमनीय और लुभावने रूप को कुशलता से चित्रित किया गया है। सांची के तोरण में घुड़सवार सैनिकों का चित्राण, राजशाही जुलूसों, वाणिज्यिकों के कारवां, झरोखे सहित बहु मंजिले महलों, व्यापारियों के परिवार, उपज सहित किसान, पशु और पौधों के साथ अन्य प्राणियों के दुर्लभ और मनोहर चित्राण हैं। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मठों, चर्चों या मस्जिदों की तुलना में, 8 वीं शताब्दी से ही, भारतीय मंदिरों में संगीतज्ञों, नर्तकों, कलाबाजों और प्रेमी युग्लों की प्रतिमाओं के साथ साथ देवी देवताओं के भी चित्राण हैं। 10 वीं सदी के बाद से काम विषयक मतोें के चित्राण की श्ुारूआत हुई। भूवनेश्वर, कोणार्क और खजुराहो एवं पालमपेठ के काकतिया के मंदिरों में कामुकता और यौन समागम को बिना झिझक प्रस्तुत किया जाने लगा। जबलपुर, छत्तीसगढ़ और राजस्थान के मंदिरों में भी काम विषयक चित्राण उपलब्ध हैं। अतिनैतिकतावादी विचार के पश्चिमी कला समीक्षकों को ये चित्राण अचंभित करने वाले और विकृतिमय दिखलाई पड़ सकते हैं। परंतु, भारत के इतिहास के उस काल में मानवीय कामभावना और आत्मा की परिपूर्णता के तांत्रिक मतावलंबियों का जीवन की मुख्य धारा में आना और परिष्कृत होना सिद्ध करता है। काम की इच्छायें आत्मा के कल्याण के मार्ग में रोड़े नहीं ’’मानी गईं’’ वरन् दूसरी ओर, उन्हें आत्म निवृति में एक आवश्यक अंग की तरह से स्वीकार किया गया था। दरअसल, एक अल्हदा ही नैतिक दृष्टिकोण क्रियाशील था। धर्म कामवासना की भूख या फिर कामवासना की तृप्ति पर आधारित नहीं था। मानव समाज के उत्थान और मानसिक स्वास्थ्य संबंधी सभी कार्यों और क्रियाओं की भागीदारी के सहित धर्म दोनों की स्वस्थ और समतावादी स्वीकारोक्ति पर आधारित था।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बहुत मायनों में कोणार्क और खजुराहो के मदिर में अंकित काम संबंधी प्रतिमायें इस प्रकार के सामान्य मतों की ही तार्किक परिणतियां एवं उत्कर्ष थे। बांसुरी और ढोलक वादकों के लयात्मक चित्राण, नर्तकों और कलाबाजों की गतिमय आकृतियां और प्रेमी युगलों के जीवांत और प्रभावशाली विभिन्न अंकन ने भारतीय वास्तुशिल्पीय अंतिम वर्जना को बिखरा दिया। पर्दे के पीछे एकांत के सामान्य मानवीय वैक्तिक एवं सबसे निजी क्रियाओं को जनसामान्य के समक्ष प्रस्तुत कर दिया। अतिआत्मिक शुद्धता के नजरिये से कुछ के लिए यह पराड़मुखी अथवा निम्नस्तरीय चित्राण है और कुछ के लिए उल्लेखनीय प्रगति का संकेत कि समाज कम से कम पाखंडी निर्लज्यता की बेड़ियों से मुक्त हुआ।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उस काल में इसको किस दृष्टि कोण से देखा गया यह महत्वपूर्ण नहीं है। महत्वपूर्ण यह है कि बहुत ही प्रभावशाली तरीके से स्पष्ट किया गया कि भारतीय धर्म और उसकी चिरस्थाई अभिव्यक्तियां संसार त्याग पर आधारित नहीं वरन् मानव की अति आवश्यक अदम्य प्रवृतियों की स्वीकारोक्ति पर आधारित है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जो भी हो, इस्लामी आक्रमणों ने इस संसारी /खासकर काम संबंधी/ और आत्मिक विलयन को बड़ी चुनौतियां पैदा कर दीं। न पहिचाने जाने तक स्मारकों, शिक्षा कंेद्रों और बिहारों को खास निशाना बनाते हुए ध्वस्त किया गया। हस्तलिखित ग्रंथों को जलाया गया। कुछ स्तूपों और मंदिरों को मस्जिदों और मदरसों में परिवर्तित कर दिया गया। इस तरह गंगा के मैदानों में कुछ भी ऐसा नहीं छोड़ा गया कि जो भविष्य को प्रकाशित कर सके। इस्लामी शासनकाल में ध्वंस के डर ने मंदिरों में शिल्पकारी एवं अलंकरण को बड़े पैमाने पर विमुख किया। यद्यपि बनारस जैसे स्थानों में वनस्पातिक सजावट ने इस विमुखता को थोड़ा सा कम किया और महाराष्ट्र् के मंदिरों में रंगों और वास्तुशिल्पी अलंकरणों के साहसपूर्ण और सफल उपयोग के प्रयास किए गये। उत्तरी और मध्य भारत के अधिकांश में, भारत के मंदिर निर्माण के शास्त्राीय वास्तुशिल्प का रिवाज क्रमशः खत्म हो गया था।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जब यूरोपियन दुनियां ने कला एवं वास्तुशिल्प के संसार में नवजागरण का अनुभव करना शुरू किया, भारत में ठीक उसके विपरीत कार्य चल रहा था। नवजागरण के बाद, शहरी क्षेत्रा से यूरोपियन मूर्तिकला को नये नये प्राश्रय प्राप्त मिले यह वह कारण था जिससे यूरोपियन शिल्पकारों की रचना में परिष्कृतियों का समावेश हुआ था। भारत में, इस प्रकार की प्रगति को इस्लामी काली छाया ने रोक दिया था। यूरोपियन क्रिस्चियनकाल के दौरान भारतीय मूर्तिकला की महान संपदा पैदा हुई और खासकर ऐसे समाज में जहां अभी शहरी और ग्रामीण विभाजन पर्याप्तरूप से तेज नहीं हुआ था। यही वजह है कि भारतीय मूर्तिशिल्प प्रकृति के साथ इतना गुथा हुआ है और वह शहरी या विश्वरूपी कम दिखलाई पड़ता है। इसलिए, पश्चिमी आंकलन में भारतीय मूर्तिशिल्प कम प्रशंसनीय रहा था।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;भारत की परंपरागत ललित एवं मूर्तिकला में वैयक्तिक अभिव्यक्तियों का अभाव पश्चिमी समालोचकों को चकरा देता है जो कि भारतीय परंपरा का एक अन्य पहलु है। भारत में व्यक्तिगत अभिव्यंजना के बहुत ही थोड़े से मूर्तिकार हैं। इसलिए शासकों अथवा धनवानों की प्रतिमायें उपलब्ध नहीं हैं। परंतु इसे भारत की कलात्मक विशेषता की तरह से माना जाना चाहिए - अर्थात् खास के बजाय सार्वभौम के लिए प्रयत्न करना, व्यक्ति से समिष्टि की ओर उन्मुख होना। भारत के शासक इतने पागल नहीं थे कि उनकी मृत्यु के बाद, वे खुद की मूर्ति या चित्रा के लिए ही सोचते रहते। इस संबंध में भारत की पसंदगी ग्रीक या मेडीटरेरियन पसंदगी से मेल खाती है जहां अधिकांश प्रतिमायें देव-देवियों के आदर्श स्वरूप होतीं हैं, रोमन बुद्धिमानों के विपरीत जो ज्यादा खोखले थे और केवल अपने ही चित्राण को अधिक महत्व दिया करते थे।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अंत में यह ध्यान देने योग्य है कि भारतीय मूर्तिकला को जानने अथवा उसकी प्रशंसा करने के लिए भारतीय दर्शन का ज्ञान होना सदैव आवश्यक नहीं है क्योंकि भारत की सर्वोत्तम मूर्तिकला अभिव्यंजक दृश्यव्य यथार्थवाद की उंचाईयों से ओतप्रोत है अपेक्षाकृत क्रिस्चियन पूर्व मेडीटरेरियन सभ्यताओं की मूर्तिकला के। यह सोचा जा सकता है कि इस प्रकार से पश्चिम के अपूर्वाग्रही दर्शक को समान आधार पर मूल्यांकन करना आसान होगा। परंतु बहुसंख्यक पश्चिमी कला मर्मज्ञ इन दो परंपराओं के मध्य समानताओं को देखने से परहेज करते हैं। और, जब उन्होंने इस पक्ष पर ध्यान दिया तब उन्होंने एक बहुत ही कमजोर दावा करने की कोशिश की कि भारतीय मूर्तिशिल्प में यथार्थवाद को पश्चिम से ही आयात किया गया होगा। वे इस बात को भूल जाते हैं कि हरप्पा काल से ही भारतीय मूर्तिशिल्प यथार्थवादी रहा है, भारतीय दर्शन के यथार्थवाद ने ही सहजरूप से कलाओं में सौंदर्यशास्त्रा को जन्म दिया और उसी ने मूर्तिशिल्प में यथार्थवादी प्रतिदान का स्थानीय विचार, व्यंजना और सौंदर्य की समाहिति द्वारा परिष्कृत करके अनुमोदन किया।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color: rgb(153, 51, 153);"&gt;भारतीय लघुचित्र&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;भारत में चित्राकारी की परंपरा ऐसे प्राचीन ग्रंथों के साथ बहुत पुरानी है जिनमें रंगों एवं सौंदर्य के सिद्धांतों का विवेचन है। जनजीवन की झलकियां प्रगट करतीं हैं कि घर के सामने के भाग, दरवाजे और ऐसे कमरे जहां अतिथि को ठहराया जाता था की रंगाई करना परिवारजनांे का सामान्य काम था। अजंता, बाघ और सीतनवसल की गुफा चित्राकारी और मंदिरों की चित्राकारी, मानवीय आकृतियों एवं प्रकृति चित्राण से प्रकृति के प्रति अगाध प्रेम का प्रमाण प्रगट 
